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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास

भारत को ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्त करने के लिए अनेक संस्थाएं अनेक व्यक्ति कार्यरत थे।उसी समय एक अंग्रेज अधिकारी द्वारा भारतीयों को ब्रिटिश सत्ता के प्रति निष्ठा,ब्रिटिश साम्राज्य को भारत मे मजबूत करने के उद्देश्य से भारतीय कांग्रेस की स्थापना की गई।

कांग्रेस जो कि आजादी के बाद सत्ता की एकमात्र दावेदार थी। भारत की आजादी में अनेक लोग ओर अनेक स्वायत संगठन कार्यरत थे उसी समय एक अंग्रेज अधिकारी ए ओ ह्यूम द्वारा की गई।कांग्रेस की स्थापना के पीछे उद्देश्य था कि अंग्रेजी पढ़े लिखे भारतीयों में अंग्रेजों के प्रति राज्य भक्ति दृढ़ हो इसका प्रयत्न करना।

कांग्रेस की सदस्यता की प्रथम शर्त थी- "ब्रिटिश क्राउन के प्रति सन्देह से परे वफादारी तथा अंग्रेजी भाषा मे निपुण होना।"

कांग्रेस के उदय के लगभग 20 वर्षों तक कांग्रेस की मनोदशा क्या थी? देश और देश के नागरिको के प्रति और ब्रिटिश सत्ता के प्रति ।

1885 Dec28 को प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष बने ह्यूम के मित्र कलकत्ता के सरकारी वकील व्योमेश चन्द्र बनर्जी जो 1902 में अपनी ईसाई पत्नी के साथ कभी न लौटने के लिए इंग्लैंड चले गए।

दूसरे अधिवेशन के अध्यक्षी भाषण में दादा भाई नोरोज़ी ने कहा कि "अंग्रेजों से हम सभी को लाभ हुआ है और ब्रिटिश राज के कारण ही हम एक जगह पर एकत्र हो पाए हैं।"

तीसरे अधिवेशन में अध्यक्ष बनाया गया बदरुद्दीन तैयब को जिन्होंने मुसलमानों को कांग्रेस से जुड़ने और अंग्रेजी शासन के प्रति वफादार रहने का आव्हान किया।

1889 पांचवें अधिवेशन का अध्यक्ष बना ह्यूम का मित्र वेडरबर्न।इसमे स्वगात समिति की अध्यक्षता कर रहे फिरोजशाह मेहता ने कहा कि कांग्रेस के लोग भारत मे शासन कर रहे अंग्रेजों से अधिक ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार हैं।

इस वफादारी के लिए अगले अधिवेशन में फिरोजशाह मेहता को अध्यक्ष बनाया गया जिसमें उन्होंने अधिक वफादारी पूर्ण भाषण दिया।

1892 के अध्यक्षी भाषण में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने कहा कि "हम एक महान स्वतन्त्र साम्राज्य के नागरिक हैं दुनिया के सर्वोच्च संविधान का हाथ हमारे सर पर है।

देश मे 1896-97 के वर्षों में अकाल और प्लेग महामारी से लगभग 7.5 लाख लोगों की मृत्यु हुई परन्तु कांग्रेस ने उनके लिए एक शब्द नही कहा वरन महारानी विक्टोरिया को हीरक जयंती को शुभकामनाएं भेंट की।

1899 में अध्यक्ष रोमेश चन्द्र दत्त ने कहा कि "शिक्षित भारत ने अपने को ब्रिटिश भारत के साथ व्यवहारिक रूप से एकाकार कर लिए है वे इस शासन को सदैव बनाये रखना चाहते हैं और उसके प्रति वफादार हैं।"

1902 में अध्यक्ष बने सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने कहा कि "हम ब्रिटिश राज्य के स्थायित्व के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के महान संघ में स्थायी रूप से शामिल होने को चिंतित और उत्सुक हैं।

1912 में ह्यूम को श्रधंजलि स्वरूप प्रस्ताव पारित किया कि जो व्यक्ति अंग्रेजी नही जानता उसे कांग्रेस की सदस्यता के योग्य न समझा जाये।

कांग्रेस के इतने लंबे समय तक के अधिवेशनों के भारत की स्वतंत्रता को लेकर कभी विमर्श नही हुआ इसने सदैव भारत की सामान्य जनता तथा क्रांतिकारी नेताओ की उपेक्षा ओर अवेहलना कर अंग्रेज भक्ति का समर्पित भाव से परिचय दिया।

1905 तक लाल बाल पाल के नाम से मशहूर तीनो क्रांतिकारी अपने क्षेत्रों से ऊपर समस्त भारत के लिए अपने ओजस्वी नारों के साथ स्वतंत्रता संघर्ष में अग्रणी बन चुके थे।

इनकी अगुवाई में कांग्रेस का दो दलों में विभाजन हो गया।विभाजन के बाद अंग्रेजी सरकार ने कांग्रेस को अमान्य घोषित कर दिया और गरम दल के समर्थकों को जेल में बंद करना प्रारम्भ कर दिया।

1911 के अधिवेशन में ट्रांसवाल में भारतीयों के लिए संघर्ष कर रहे गांधी जी को तो बधाई प्रेसित की गई लेकिन मांडले जेल में बंद मधुमेह से ग्रसित "बाल गंगाधर तिलक" जी का स्मरण तक न हुआ।

1928 के कलकत्ता अधिवेशन में विरोध के पश्चात गांधी जी के प्रयत्नों से भारत को "डोमिनियन स्टेटस" की मांग का प्रस्ताव पारित हो गया।

1929 के अधिवेशन में नेहरू ने जिस पूर्ण स्वराज की घोषणा की उसका अर्थ उन्होंने डोमिनियन स्टेट के समान बतलाया था।

जबकि उसी अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने पूर्ण स्वराज का अर्थ अंग्रेजों से पूर्ण सम्बन्ध विच्छेद की बात की जिसे गांधी जी ने अस्वीकार कर दिया।

1930 Jan 9 के "यंग इंडिया" में गांधी जी ने लिखा कि कांग्रेस के लिए डोमिनियन स्टेट का अर्थ ही पूर्ण स्वराज है।


वस्तुतः इन सभी सन्दर्भों की विवेचना की जाए तो कतई ये स्वीकार नही हो सकता कि कांग्रेस ने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।

कांग्रेस के अंग्रेज भक्ति के रवैये के कारण कोई भी क्रन्तिकारी इनसे सरोकार नही करता था यदि करता भी था तो केवल नाम मात्र का।