महिपाल प्रथम (988-1038 ई.)- देवपाल के पश्चात् लगभग एक सताब्दी व पाँच दशकों तक कोई शाक्तिशाली राजा पाल-वंश का न हुआ। निरंतर कमजोर शाशकों के कारण पाल-साम्राज्य की स्थिति दुर्बल होती गयी। तब 988 ई.में. विग्रहपाल द्वितीय का पुत्र एवं उत्तराधिकारी महिपाल प्रथम राजगद्दी पर अशीन हुआ। महिपाल ने अपने वंश के खोये हुए गौरव को पुनः अर्जित किया तथा पाल साम्राज्य को शाक्तिशाली बनाया। महिपाल के पूर्व राजाओं ने पाल-साम्राज्य के जिन प्रदेशों को खो दिया था, उसने उन्हें पुनः प्राप्त किया। यद्यपि चोल एवं संभवत: कलचुरि आक्रमण के कारण वह उत्तर भारत की राजनीति में विशेष भाग न ले सका तथापि धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में उसका महत्वपूर्ण योगदान है। उसने महीपुर नमक नगर की स्थापना करायी व सारनाथ में अनेक मठों तथा बौद्ध-मंदिरों का निर्माण कराया। बोध गया व नालंदा में भी उसनें निर्माण कार्य कराया।