मुंडा मानकी प्रथा झारखण्ड के मुण्डा जनजाति की पारम्परिक शासन व्यवस्था है जिससे परम्परागत रूप से मुण्डा लोग शासित होते थे। इस व्यवस्था में सात प्रकार के पदाधिकारी होते थे:- मुण्डा, डाकुआ, मानकी, तहसीलदार, ठाकुर, दीवान, पाण्डेय, बरकंदाज, दरोगा, लाल, मानकी, पाहन, पनभरा (या पुजारा), महतो, भूतखेता आदि।

'मुण्डा' का अर्थ 'गाँँव के मुखिया से होता है तथा जिसमें मानकी कुछ गाँँवों के प्रमुख को कहा जाता है और [1] इनके गाँवो में एक सन्देश वाहक भी नियुक्त किया जाता है जिसे डकुवा (डाकिया) कहा जाता है।

मुंडा मानकी व्यवस्था

यह कोल्हान के जनजातियों की पारंपरिक शासन व्यवस्था थी।

1. मुंडा:- मुंडा गांव का प्रधान होता है इसे प्रशासन लेने का अधिकार है, परती भूमि का भी वह बंदोबस्ती कर सकता है।

2. डाकुआं:- डाकुआ मुंडा का सहायक होता है डाकुआ के द्वारा ही मुंडा गांव वालों को बैठक की सूचना देता है।

3. मानकी:- 15-20 गांव के मुंडाओं के ऊपर एक मानकी होता है। वह पंचायतों का प्रमुख होता है। यह मुंडाओं से लगान वह सुनता था।मुंडाओं के द्वारा विवादों को नहीं समझा पाने की स्थिति में विवाद को मानकी के पास भेजा जाता था।

4. तहसीलदार:- यह मानकी का सहायक होता था, तहसीलदार के माध्यम से ही मुंडाओं सेे मालगुजारी वह सुनता था।

सन्दर्भसंपादित करें

  1. "CM to revive age-old system" [मुख्यमंत्री सदियों पुरानी प्रणाली को पुनर्जीवित करेंगे] (अंग्रेज़ी में). द टेलीग्राफ. २२ जनवरी २००७. मूल से 13 दिसंबर 2013 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि ८ दिसम्बर २०१३.