मेदिनी राय खंगार, (मेदिनी राय से अलग हैं जो पलामू के राजा थे।)

मेदिनी राय खंगार (मृत्यु 1528) चंदेरी राज्य का राजपूत शासक था। वह राणा सांगा के सबसे प्रतिष्ठित सेनानायकों में से एक था।

अपने शुरुआती वर्षों में, मेदिनी राय खंगार ने मालवा के सुल्तान महमूद द्वितीय की सेवा की और उसे अपने शासन को मजबूत करने में मदद की। महमूद ने उसे अपने दरबार में मंत्री नियुक्त कर दिया। मेदिनी राय खंगार ने उत्तरदायित्व के पदों पर हिंदुओ को नियुक्त किया। दरबार में अपना प्रभाव घटते देख कर मालवा के दरबारियों ने उसके विरुद्ध सुल्तान के कान भरे तथा गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह की सहायता से मेदिनी राय को पदच्युत करवा दिया।

विश्वासघात का पता चलने पर, मेदिनी ने चित्तौड़ के राणा सांगा से मदद मांगी और राणा के साथ मिलकर उन्होंने मालवा-गुजरात सेनाओं को हराया और राणा साँगा के अधिपत्य के तहत चेन्देरी सहित पूर्वी मालवा के राजा बन गए। राजपूतों ने महमूद को पकड़ कर अपने सरदारों के संमुख उपस्थित किया। छः महीने बाद राणा सांगा ने वंशानुगत राजपूतोचित दयालुता के कारण महमूद को क्षमा कर दिया तथा मेदिनी राय खंगार की सहमति से उसका राज्य उसे वापस लौटा दिया।

चंदेरी पर कब्जा करने से दिल्ली के शासकों को झटका लगा क्योंकि वे राजपूतों से मालवा पर आक्रमण करने की उम्मीद नहीं कर रहे थे। इसके कारण लोदी साम्राज्य और मेवाड़ साम्राज्य के बीच कई झड़पों और लड़ाईयों की शृंखला शुरू हुई। मेदिनी राय खंगार ने राणा साँगा को इन लड़ाइयों में सक्रिय रूप से मदद की और उन्हें विजयी होने में मदद की। युद्ध के बाद राणा साँगा का प्रभाव आगरा के बाहरी इलाके में एक नदी पिलिया खार तक फैल गया। मेदिनी राय खंगार ने भारत के सुल्तानों के खिलाफ कई अभियानों में राणा साँगा की सहायता की।

सन् 1528 मे मेदिनी राय खंगार और बाबर के बीच चंदेरी का युद्ध लड़ा गया। इसमें बाबर विजयी रहा और मेदिनी राय खंगार को मार दिया गया।

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