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यथार्थवाद बीसवीं शती के तीसरे दशक के आसपास से हिन्दी साहित्य में पाई जाने वाली एक विशेष विचारधारा थी। इसके मूल में कुछ सामाजिक परिवर्तनों का हाथ था। जो परिवर्तन हुआ उसके मूलकारण थे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम, कम्यूनिस्ट आन्दोलन, वैज्ञानिक क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर हुए विस्फोट, विश्व साहित्य में हुए परिवर्तनों का परिचय और आर्य समाज आदि सामाजिक आन्दोलन। यथार्थवादी लेखकों ने समाज के निम्नवर्ग के लोगों के दुखद जीवन का चित्रण किया। उनके उपन्यासों के नायक थे गरीब किसान, भिखमँगे, भंगी, रिक्शा चालक मज़दूर, भारवाही श्रमिक और दलित। इसके पहले कहानी साहित्य में ऐसे उपेक्षित वर्ग को कोई स्थान नहीं था।