रामकृष्ण वर्मा बलवीर (१८५९ - १९०६) हिन्दी साहित्यकार तथा भारत जीवन प्रेस के स्वामी थे। वे भारतेन्दु मण्डल के कवि थे जो पुराने ढर्रे की कविताएँ लिखा करते थे। उन्होने अपने प्रेस से अनेक पुरानी पुस्तकों को छापकर हिन्दी का बहुत उपकार किया अन्यथा उनमें से बहुत सी पुस्तकें नष्ट हो गयीं होतीं।

बाबू रामकृष्ण वर्मा का जन्म बनारस में हुआ था। वे मंचीय कवि थे तथा 'समस्यापूर्ति' में भाग लेते थे।

नाटकलेखन और प्रदर्शनों की दयनीय स्थिति को देखते हुए बांग्ला नाटक 'कृष्णाकुमारी नाटक' (माइकल मधुसूदन दत्त) का अनुवाद (1899) करते हुए रामकृष्ण वर्मा को कहना पड़ा :

जब से श्रीयुत भारतभूषण भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने और विशेषतः विद्वद् शिरोमणि ला. श्रीनिवासदास जी ने इस भारतवर्ष को छोड़ स्वर्गलोक को भूषित किया तब से अभागिनी हिन्दी में कोई भी नाटक उपन्यास अथवा कोई अपूर्व मनोहर ग्रंथ देखने में न आया। नाटकों की जैसी कुछ दुर्दशा इन दिनों है वह केवल वे ही लोग जान सकते हैं जो नाटक के गुण दोष और लक्षणों से अभिज्ञ हैं। इन दिनों यह परिपाटी पड़ गई है कि दो तीन पुरुषों की बातचीत अथवा रङ्गभूमि पर व्यर्थ ही हाथ पैर हिलाने ही को लोग नाटक कह देते हैं। स्वर्गवासी बाबू हरिश्चन्द्र जी ने इन दोषों को दूर करने और लोगों को नाटक के लक्षण और लाभ समझाने के लिए 'नाटक' नामक एक उत्तम ग्रन्थ लिखा था परन्तु आलसी लोग उसे कब देखते हैं।.." (रामकृष्ण वर्मा (अनुवादक) : ‘कृष्णाकुमारी नाटक', भूमिका)

कृतियाँ संपादित करें

बाबू रामकृष्ण वर्मा जी ने बनारस से हिन्दी में 'भारत जीवन' नामक एक पत्रिका निकाली।

गद्य : विरह, नायिका भेद

कविता : रुपगर्विता, प्रोषितपतिका, उत्कंठिता, रूपक

अनुवाद : कृष्णाकुमारी नाटक (माइकल मदुसूदन दत्त)

एकांकी : भारतोद्धार, पद्मावती, वीर नारी, कृष्णकुमार