इसमें एक अंक, 5 पात्रों का विधान, मुख, प्रतिमुख, निर्वहण संधियों का प्रयोग होता है। कैशिकी, भारती, वृत्तियों का निर्वाह होता है। नायिका प्रसिद्द और नायक मूर्ख होता है। विभिन्न प्रकार की प्राकृतों का प्रयोग किया जाता है। सूत्रधार का अभाव रहता है। उदात्त भावों का उत्तरोत्तर विकास किया जाता है। विथ्यंग और कलाएं रहती है। उदाहरण- मेनकाहित। इसके अतिरिक्त भाव प्रकाश में नान्दी के सुश्लिष्ट होने का भी निर्देश है।

संदर्भ- हिंदी साहित्य कोष, भाग-1, ज्ञान मंडल लिमिटेड वाराणसी, पृष्ठ- 556