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वक्रोक्तिजीवितम् कुन्तक द्वारा रचित संस्कृत ग्रन्थ है। यह कृति अधूरी ही उपलब्ध हैं।

कुन्तक वक्रोक्ति को काव्य का 'जीवित' (जीवन, प्राण, आत्मा) मानते हैं। वक्रोक्तिजीवित में वक्रोक्ति को ही काव्य की आत्मा माना गया है जिसका अन्य आचार्यों ने खंडन किया है। पूरे ग्रंथ में वक्रोक्ति के स्वरूप तथा प्रकार का बड़ा ही प्रौढ़ तथा पांडित्यपूर्ण विवेचन है। वक्रोक्ति का अर्थ है वदैग्ध्यभंगीभणिति, अर्थात् सर्वसाधारण द्वारा प्रयुक्त वाक्य से विलक्षण कथनप्रकार।

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