प्राचीन भारत में औपचारिक रूप से वाद-विवाद करने की बड़ी गौरवपूर्ण परम्परा थी। कभी-कभी ये वाद-विवाद राजाओं के संरक्षण में किये जाते थे जिनका उद्देश्य विभिन्न धार्मिक, दार्शनिक, नैतिक विषयों की समीक्षा करना होता था। इससे सम्बन्धित विद्या वादविद्या कहलाती थी। वादविद्या से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थों की रचना हुई थी। इसी प्रकार के वाद-विवादों से ही न्याय (भारतीय तर्कशास्त्र) की भारतीय परम्परा का जन्म हुआ।

चरकसंहिता में वादविद्यासंपादित करें

न्यायसूत्रों में वादविद्यासंपादित करें

सन्दर्भसंपादित करें

इन्हें भी देखेंसंपादित करें