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नर्मदापुरम आदमगढ़ के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की खोज के हुये 100 साल पूरे नर्मदापुरम आदमगढ़ के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों की खोज के हुये 100 साल पूरे लेख आत्‍माराम यादव नर्मदापुर पर होशंगाबाद नामक धुन्ध का घनाकोहरा था वह हटते ही अब नर्मदापुरम आलोकित हो गया। नर्मदापुरम में मानव का उदभ्व और विकास की प्रथम पहचान के रूप में प्रागैतिहासिक चित्रित शैलाश्रय के वंशवृक्ष की पहचान वर्ष 1921 में यहॉ पदस्थ डिप्टी कमिश्नर के द्वारा सूचना देने एवं आग्रह किये जाने पर केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सुपरिण्टेण्डेण्ट पण्डित हीरानन्द शास्त्री द्वारा मनोरंजन घोष से एक-एक चित्र का अवलोकन कर उनका सर्वेक्षण कराया तब उनके द्वारा वर्ष 1922 में पहली बार आदमगढ़ के प्रागैतिहासिक चित्र प्रकाश में आने के बाद वर्ष 2023 में 101 साल पूरे हो गये है। सौ साल पहले की गयी गणना में आदमगढ़ की पहाडियॉ में 18 शैलाश्रय प्राप्त हुये थे जिनमें विभिन्न प्रकार की आकृतियों के 335 शिलाश्रय पाये गये थे तथा तब यह क्षैत्र पहाड़िया क्षेत्र में जमकर पत्थर उत्खनन के लिये सक्रिय था, जबसे यह संज्ञान में आया तब से आज तक देखा जाये तो इन शैलाश्रयों की खोज की शताब्दी वर्ष गुपचुप रूप से निकल गयी जिसकी भनक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को भी नहीं लग सकी। आदमगढ़ के शैलाश्रय आदिम प्रकृति के आदिमानव सभ्यता की शुरूआत के सूचक है और यह माना गया कि आदि मानव कभी यहॉ निवास कर तत्समय के उल्लासमय जीवन के आन्तरिक भावों की अभिव्यक्ति के लिये इन चित्रों के द्वारा अपनी बात कहना या जतलाना चाहते थे। सच मायने में देखा जाये तो ये प्रागैतिहासिक चित्र मानवजाति के प्रारम्भिक जीवन यात्रा की विशद कहानी है जिसमें आदिमानव के उल्लासमय जीवन के आन्तरिक भावों की सफलतम अभिव्यक्ति विभिन्न आकृति, प्रकृति के ज्यामितिक, रेखानुकृति, भावानुसारी (भावप्रधान) शैल चित्रों के रूप में पूर्ण, अर्द्धपूर्ण तथा अपूर्ण अर्थात आधी-अधूरी दिखाई देते है तभी इन शिलाश्रयों को मानव विकास से जोड़ा गया है और विश्व में प्रागैतिहासिक चित्रों के रचयिता भी इन्हीं के वंशधर कहे गये है। आदमगढ़ के शैलाश्रय इस बात की पुष्टि करते है कि नर्मदापुरम जिला प्रागैतिहासिक काल का साक्षी रहा है। डॉक्टर सांकलिया ने आदमगढ़ के लघु-पाषाण अस्त्रों से बने इन शैलचित्रों का रचनाकाल 10000 से लेकर 4000 ई.पूर्व के बीच का माना है, जबकि 14 जून 1959 के धर्मयुग के पृष्ठ 26 में डॉ.वी.एस.वाकणकर तथा उसी अंक में मनोहर लाल मिश्र के प्रकाशित लेख का जिक्र भी आता है, जिसमें श्री मिश्र ने इन शिलाचित्रों के रचनाकाल की समस्या को बखूबी से रखा था और पहाड़िया के चित्रों को दो वर्गो में बॉटते हुये उनके परस्पर बने होने में हजारों वर्षो का अन्तर बतलाया था। पहले वर्ग में एकवर्गीय या बाह्यरेखा से बनी आकृतियॉ थी तो दूसरे में प्राचीर प्रस्तर युग का सम्बन्ध 9 वीं या 10 वीं शताब्दी ई. लगाया गया था। श्री मिश्र ने अपने लेख में दो स्थानों पर तीन कालों से चित्रों का सम्बन्ध करते हुये एक प्राचीन प्रस्तरयुग, दूसरे में नवीन प्रस्तर युग एवं तीसरे में ऐतिहासिक युग का सम्बन्ध बताया है जबकि डॉ. वाकणकर ने इन शैलचत्रों को सात स्तरों में विभाजित किया एवं और शैलाश्रय क्रमांक-10 के हाथी के धुधंले चित्र को सर्वाधिक प्राचीन माना और उसे प्रथम प्रस्तर का निश्चित किया। दूसरे स्तर पर इसी शैलाश्रय के एकदम ऊपर की ओर बने विशाल पशुओं के चित्रों को स्वीकार किया एवं तीसरे स्तर में मानवाकृतियों को चौथे स्तर पर धर्नुधर एवं आखेट दृश्य रखे गये । विगत 40 वर्षो से मेरा आदमगढ़ की पहाडियॉ पर आना जाना रहा है। मुझे स्मरण है कि वर्ष 1985 तक पहाड़ी की उस ओर मजदूर पत्थर तोड़ते ओर ट्रकों में भरने का काम सन् 1995 तक किया करते थे और पहाडियॉ के ऊपर तक अनेक चरवाहें अपने जानवरों को चराने लाया करते थे, तब एक चरवाहे के साथ पहली बार मैंने भी इन शैलाश्रयों को देखा था। तत्समय के बुजुर्ग इस पहाड़िया को महाभारतकाल के समय भीम के द्वारा नर्मदा से विवाह का प्रस्ताव रखने पर नर्मदा द्वारा उनकी धारा को सुबह मुर्गे की बाग देने से पहले रोकने की शर्त पर तैयार हुये और पहली पहाड़ी वान्द्राभान पर अवशेषों के रूप में छोड गये, तथा दूसरी लेकर आते समय मुर्गे की बाग सुनाई देने पर दोनों हाथों की पहाड़ी वहीं छोड गये जिसमें एक आदमगढ़ की पहाड़िया कही गयी दूसरी कुलामढ़ी रोड़ पर आज भी इसका साक्ष्य मानी जाती है। इस क्विदंती के साथ आदमगढ़ पहाडी पर शैलाश्रयों की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिये मैंने पुरातत्व विभाग के अधिकारियों से सम्पर्क किया, परन्तु किसी ने भी मुझे इन शैलाश्रयों से सम्बन्धित प्रमाणिक जानकारी विभाग के पास उपलब्ध न होने का हवाला देकर उपलब्ध नहीं करायी। मेरी रूचि इन शैलाश्रयों के सम्बन्ध में बढ़ती गयी और जो भी शैलाश्रयों से सम्बन्धित आलेख या पुस्तकें पढ़ने को मिली, उसी आधार पर मैं आज यह जानकारी आप सभी के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हॅू तथा वनविभाग के अनुविभागीय अधिकारी शिवकुमार अवस्थी जी का हृदय से आभारी हॅू जिनसे प्राप्त सहयोग व सहायता से नवम्बर 2022 में उनके मार्गदर्शन में सिवनीमालवा के घने जंगलों में बसा ग्राम पिपलिया की पहाड़ी जिसे बोररानी क्रमांक 1 व 2 के शैलाश्रय से पहचान हुई । वहॉ गहरे कत्थई रंग की रेखानुकृति वाले चित्रों के अलावा जानवरों के, योद्धाओं के, नृत्य दृश्य एवं घुडसवारों के चित्र देखने को मिले। इन्हीं घने जंगलों की पहाड़ियों में जहॉ जानवरों के भय से कोई जाने के तैयार नहीं होता तब वनवासियों या वनविभाग के कर्मचारियों के सहयोग से जाया जा सकता है। सिवनीमालवा के बूढ़ीमाई शैलाश्रय को दो क्रमांकों में बॉटा गया है और इसी प्रकार लोधागढ़ जो सिवनीमालवा से 18 किलोमीटर दूरी पर ग्राम पीपलगोटा में है उक्त ग्राम से 15 किलोमीटर दूर पथरीले रास्तों से होकर यहॉ के शैलाश्रयों को देखा जा सकता है, जिसकी ओर पुरातत्व विभाग निष्क्रिय बना हुआ है, यदि यही आलम रहा तो यहॉ की आदम सभ्यता की कहानियॉ किताबों में कैद होकर रह जायेगी। नर्मदापुरम जिले के बोरी अभ्यारण, आदमढ़, पचमढ़ी, सतपुड़ा उद्यान,सहित सिवनीमालवा कें 56 स्थानों पर तत्कालीन समय के पुरातत्व सर्वेक्षण में चिन्हित कर 3546 शैलाश्रय आकृतियों की पहचान की गयी जहॉ मानव के उद्भव इतिहास के प्रमाण में 3546 शैलचित्र पाये गये, किन्तु आज इनमें आधे चित्र भी हम सहेज नहीं सके और सदियों से जो सभी प्रकार के मौसमों को सहकर जीवंत रहे, वे इस समाज को रास नहीं आये। इसके पीछे का कारण आज से चार-पॉच दशक पूर्व फिल्मों में प्रेमियों के अमर रहने के लिये पत्थरों में पेड़ों में अपने नाम उकेरकर अपने प्रेम को अमर करने की मानसिकता एव अगले जन्म में अपने प्रेमी और प्रेमिका को पिछला जन्म याद दिलाकर उन्हें वे पहाड़ी प्रस्तर या प्राचीनतम पेड़ दिखाना था, परिणामस्वरूप एक पीढ़ी इस फिल्मी धारा में बह गयी और उसने देखरेख के अभाव एवं पर्याप्त सुरक्षा न होने पर इस तरह के तमाम शिलाश्रयों पर, उसके आसपास पहाड़ों में अपना और अपनी प्रेमिका का नाम उकेरने के नाम पर लाखों साल के इन चित्रांं को नष्ट किया है, कुछ वर्षो से यह शैलाश्रय राष्ट्रीय धरोहर एवं संरक्षण में होने से बचे हुये है, शेष के अस्तित्व को लेकर किसी के पास कोई जबाव नहीं है। नर्मदापुरम जिले के अनेक स्थानों पर इन शैलाश्रयों का उल्लेख विस्तार से मिलता है जिसमें पचमढ़ी के आसपास फैले अनेक पहाड़-पहाड़ियों, प्रस्तर-शिलाओं आदि में वर्ष 1932 में इन प्रागैतिहासिक चित्रों की जानकारी पहली बार भ्रमण करने निकले डॉ. जी.आर.हन्टर को हुई, श्री हन्टर उस समय एक आयोजन में भाषण देने के लिये आये थे तब उन्होंने वहॉ उपस्थित अंग्रेज अफसर डी.एच.गार्डन को इन शिलाश्रयों की जानकारी दी जिले के सभी शैलाश्रयों की महत्वपूर्ण खोज को प्रेरित किया बाद में गार्डन ने शोध और अध्ययन के बाद इन शैलाश्रयों पर पहली बार सन् 1935 में इण्डियन केव पेन्टिग शीर्षक से विदेशी अखबारों में लिखा जिसके प्रकाशित होने के बाद इंग्लेण्ड सहित भारत के अनेक प्रसिद्ध अखबारों ने इन चित्रों के साथ ’’दी रॉक पेन्टिग्स आफॅ महादेव हिल्स’ नाम से प्रकाशित किया। मिस्टर गार्डन ने सभी संग्रह शैलाश्रयों की पहल कर पुस्तकरूप में सन् 1950 में प्रकाशित कराया। इन शैलाश्रयों की खोज के समय 1922 में आदमगढ़ पहाड़ी में 35 प्राकृतिक, 4 ज्यामितिक, 126 भावानुसारी सहित 165 पूरक चित्रों का उल्लेख मिलता है जबकि 5 प्राकृतिक, 4 ज्यामितिक एवं 19 भावासारी के चित्र अर्धपूरक आधे बने हुये हैं। यहॉ रेखनुकृति के वे चित्र जो रेखाओं से उकेरे गये है उनमें 16 प्राकृतिक , 16 ज्यामितिक एवं 25 भावानुसारी सहित कुल 53 चित्र सहित अलंकृत श्रेणी के 88 चित्र है जिसमें प्राकृतिक 18, ज्यामितिक 22 एवं भावानुसारी 48 है जिन सभी का योग 335 है जिससे आदमगढ़ की पहाड़ी शैलाश्रयों से सम्पन्न थी। आज से 100 साल पूर्व आदमगढ़ के शैलाश्रय 1 में 9 शैलचित्र, शैलाश्रय क्रंमाक-2 में 14, शैलाश्रय क्रमांक-3 में 9, शैलाश्रय क्रमांक-4 में 42, शैलाश्रय क्रमांक-5 में 5, शैलाश्रय क्रमांक-6 में 33, शैलाश्रय क्रमांक-7 में 14, शैलाश्रय क्रमांक-8 में 9, शैलाश्रय क्रमांक-9 में 46, शैलाश्रय क्रमांक-10 में 67, शैलाश्रय क्रमांक-11 में 12, शैलाश्रय क्रमांक-13 में 7, शैलाश्रय क्रमांक-14 में 13, शैलाश्रय क्रमांक-15 में 11, शैलाश्रय क्रमांक-16 में 1, शैलाश्रय क्रमांक-17 में 22, एवं शैलाश्रय क्रमांक-18 में 4 चित्र इस प्रकार कुल 335 शैलचित्रों की गणना की गयी थी। जब इन शैलाश्रयों के सम्बन्ध में जानकारी होने पर मैं भ्रमण पर निकला तो मुझे शैलाश्रय क्रमांक-1 पर कोई चित्र नहीं मिला बल्कि लाल रंग के अस्पष्ट निशान दिखाई दिये वहीं क्रमांक-2 पर एक वृषभ का चित्र के अलावा अस्पष्ट लालरंग की आकृतियॉ दिखी यही स्थिति शैलाश्रय क्रमांक 3,ं 5,13, 14, एवं 15 की दिखी जहॉ कोई भी चित्र दिखाई नहीं दिया, जो नष्ट हो चुके है जबकि शैलाश्रय क्रमांक-,6,7,8,9,10,11,12,17 एवं 18 पर ही विभिन्न आकृतियों के पशु, नृत्य के दृश्य, घुडसवार, हाथी, हिरण, वृषभ, भागते हुये गोल सिंह वाले भेसे, अश्वारोहियों, वन्यजीवों, वन्यजीवन को व्यक्त करने वाले आधे-अधूरे चित्र देखने को मिले। डाक्टर जगदीश गुप्त ने जिले के इन चित्रों की प्रारम्भिक विधियों का उल्लेख कर इन्हें एकाकी अंकन, समूहांकन, आबद्ध अंकन, संश्लेषात्मक अंकन, विश्लेषात्मक अंकन, रूपानुसारी अंकन, भावानुसारी अंकन तथा गतिशील अंकन में बाटॅते हुये उन्हें पॉच शैलियों में विभाजित किया है जिसमें पूरक शैली, अर्द्धपूरक शैली, रेखा शैली,, अलंकृत शैली, क्षेपांकन शैली प्रमुख जिनकी 27 उपशैलियॉ की गयी जबकि यशोधर मठपाल ने इन तीन शैली प्राकृतिक, ज्यामितिक एवं भावानात्मक शैली को 12 उप शैलियों में बॉटा है जबकि डाक्टर वाकणकर ने इन्हें 20 शैलियों में बॉटकर उनका काल और क्रम पर आधारित किया है जिसे आगे रखकर नर्मदापुरम जिले के सभी शैलाश्रयों को विभाजित किया गया है। आदमगढ़ से बाहर निकलकर थोड़ा जिले के भी शैलाश्रयों की चर्चा न कि जाये तो यह बात अधूरी होगी, इसलिये आदमगढ के बाद इन शैलाश्रयों से सम्पन्न क्षैत्रों का यहॉ जिक्र किया जा रह है जिसमें पचमढ़ी में 730 चित्र. पूरक है, जिनमें 209 प्राकृतिक, 13 ज्यामितिक,एवं 508 भावानुसारी है वहीं दूसरी श्रेणी अर्द्धपूरक में की सॅख्या 27 है जिसमें प्राकृतिक 8 एवं भावानुसारी 19 चित्र है। इसके अलावा जो अन्य दो श्रेणियों में रेखाकृति है उसके 192 चित्र है जिसमें 50 प्राकृतिक, 9 ज्यामितिक 133 भावानुकृति के है और अलंकृत चित्रों का योग 100 गिने गये है जिसमें 65 प्राकृति, 3 ज्यामितिक तथा 32 भावानुसारी है इस प्रकार पचमढ़ी क्षैत्र के कुल चित्रों की सॅख्या 1049 है। बोरी अभ्यारण में 414 पूरक, 23 अर्द्धपूरक, 124 रेखांकित तथा 253 अलंकृत सहित कुल 814 चित्र बने है। जिले के सिवनीमालवा में 149 पूरक, रेखांकित 34 और 13 अलंकृत सहित कुल 196 चित्र है। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में 762 पूरक, 14 अर्द्धपूरक,152 रेखाकृति, 224 अलंकृत सहित कुल 1152 चित्र है इसतरह जिले में सभी स्थानों के चित्रों का योग 3546 गिनती की गयी है।

 देश-दुनिया के सामने इन शैलचित्रों की जानकारी पहुॅचने पर विस्तृत खोज के लिये प्रत्येक उन स्थानों पर पहुॅचकर जानकारी एकत्र करने वाले वी.एस.वाकणकर  ने वर्ष 1956-57 में ’’राक शैल्टर्स इन मध्यप्रदेश’’ के नाम से उजागर किया जिसमें होशंगाबाद के समीप आदमगढ़ के चित्रों का परिचय दिया गया वहीं जगदीश गुप्त ने वर्ष 1960 में ’’भारतीय कला के पदचिन्ह’’ में  तथा 1966 में अपनी दूसरी पुस्तक ’’प्रागैतिहासिक भरतीय चित्र कला नामक पुस्तक में इन शैलचित्रों की सभी आवश्यक जानकारी विस्तार से दी गयी है,किन्तु काफी प्रयासों से इस पुस्तक के कुछ अंश देखने को मिले। डॉक्टर पूर्णिमा मसीह के द्वारा नर्मदापुरम जिले के शैलचित्रों के सन्दर्भ में अपनी पुस्तक मध्यप्रदेश की प्रागैतिहासिक चित्रकला का प्रकाशन 1996 में किया गया था जिसमें उन्होंने गागर में सागर भरने का काम किया है, किन्तु यह पुस्तक सरकार ने सहेजने का काम नहीं किया।

जिन स्थानों पर यह शैलाश्रय पाये गये उनमें होशंगाबाद के आदमगढ़, पचमढ़ी क्षैत्र के शैलाश्रय में लश्करियॉ खोह, बाजार केव, निम्बू भोज, इमली खोह, माढ़ादेव, बनियाबेरी, ईशान श्रंग, मान्टेरोजा, छोटे महादेव, बी.डेमकेव, पचमढ़ी, जम्बूद्वीप, खटखटा पुतली लेन, चिल्ड्रेन केव, काईटस क्रेग,रजत प्रपात, मैसी केव, रजत प्रभात, काजरी, नागद्वारी, आगमद्वार, नीमगिरी, चित्रशाला, चुरनागुंडी,भुरकुम लेन, त्रिशूल नाला, झुनकर नाला, शेरगुफा, भीमकाल नाला, देवखला, धापडी, चितराकातरी, डोडलपानी, बेलखंदार, काकोटिया नाला, बोररानी, बूढ़ीमाई, लोधागढ़, शेरनाला, मामाभॉजा, धनाबोई, नीमधान, गजपत्थर, लम्बीझीत, टुन्ड्राआम नाला, आमवाली काप, हवालेन, कनमार, बींदनी पत्थर, कुर्रालेन, भगरा लेन, मिनकापाठा, खड़ाधार, भुरभुरी लेन एवं डोराथी डीप है। जो अव देखरेख व सहेजे न जाने के अभाव में नाममात्र के ही रह गये है जिसमें आदमगढ़ क्षैत्र को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण शैलाश्रय के नाम से भारतसरकार ने अपने आधित्य में रखकर 25 रूपये प्रति व्यक्ति टिकिट की दर से भ्रमण कराया जा रहा है, परन्तु बाहर से आने वाले दर्शकों से इन शैलचित्रों को कोई नुकसान न पहुॅचाये इसकी देखरेख की व्यवस्था नहीं की गयी हैं तथा आदमगढ़ पहाड़ी के इन शैलाश्रयों को सहेजने का काम किया है वैसा काम अन्य स्थानों पर न किये जाने से यह प्रागैतिहासिक आदिम युग की धरोहर नष्ट होने की कगार पर है जिसपर सरकार को सॅख्ती से रोक लगाना चाहिये ताकि आने वाली पीढ़ी को हम हमारे पूर्वजों की याद दिलाती रहे।



<ref name="">आत्‍माराम यादव पीव [[चित्र:[[चित्र:|thumb|right|200px|]]|thumb|right|200px|]]

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