मुख्य मेनू खोलें



== शीर्षक ==[1] 1943 में बंगाल में आए भीषण अकाल के दौरान सड़क के किनारे भूख से तड़पता बच्चा। 72 साल पहले बंगाल (मौजूदा बांग्लादेश, भारत का पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा) ने अकाल का वो भयानक दौर देखा था, जिसमें करीब 30 लाख लोगों ने भूख से तड़पकर अपनी जान दे दी थी। ये द्वितीय विश्वयुद्ध का दौर था। माना जाता है कि उस वक्त अकाल की वजह अनाज के उत्पादन का घटना था, जबकि बंगाल से लगातार अनाज का निर्यात हो रहा था। हालांकि, विशेषज्ञों के तर्क इससे अलग हैं।


                                                            ठिकाना - कैरवाडा
                                                           (अलवर) राजस्थान
                  
                                                              पुरेन्द्र सिंह


कुछ शब्द लेखक के कैरवाडा भोमिया जी की किताब लिखने के पीछे मेरा विचार उस रहस्य ओर इतिहास को सार्वजनिक करने का है जिस अर्ध देव की पुजा अनेको सालो से होती आ रही है। हजारो की सख्या में भक्त आते है, प्रसाद चढ़ाते है और जो भी कुछ मन्नत मागते है वो उनकी पूरी होजाती है, और हर साल इनका गर्मियों के मौसम (पीपल पुणु) मे मेला लगता है और विशाल कुश्ती दगल का आयोजन करवाया जाता हैं। इसके साथ पुरे साल रामायण, सप्ताह, सत्संग, जागरण, दगल और प्रसादी प्रमुख हैं श्री श्री १००८ श्री भोमियाजी महाराज का सम्पूर्ण इतिहास जगाओ (पंडो ) के पास आज भी रखा हुआ है. म


                                                        पुरेन्द्र सिंह


राजपूतों का इतिहास राजपूत भारत का एक क्षत्रिय कुल माना जाता है जो कि 'राजपुत्र' का अपभ्रंश है। राजस्थान को ब्रिटिशकाल में 'राजपुताना' भी कहा गया है। पुराने समय में आर्य जाति में केवल चार वर्णों की व्यवस्था थी। राजपूत काल में प्राचीन वर्ण व्यवस्था समाप्त हो गयी थी तथा वर्ण के स्थान पर कई जातियाँ व उप जातियाँ बन गईं थीं। कवि चंदबरदाई के कथनानुसार राजपूतों की 36 जातियाँ थी। राजपूतों के लिये यह कहा जाता है कि वह केवल राजकुल में ही पैदा हुआ होगा,इसलिये ही राजपूत नाम चला, लेकिन राजा के कुल मे तो कितने ही लोग और जातियां पैदा हुई है सभी को राजपूत कहा जाता,यह राजपूत शब्द राजकुल मे पैदा होने से नही बल्कि राजा जैसा बाना रखने और राजा जैसा धर्म "सर्व जन हिताय,सर्व जन सुखाय" का रखने से राजपूत शब्द की उत्पत्ति हुयी। राजपूत कभी खूंख्वार नही था,उसे केवल रक्षा करनी आती थी,लेकिन समाज के तानो से और समाज की गिरती व्यवस्था को देखने के बाद राजपूत खूंख्वार होना शुरु हुआ है,राजपूत को अपशब्द पसंद नही है। वह कभी किसी भी प्रकार की दुर्वव्यवस्था को पसंद नही करता है। राजपूतों की उत्पत्ति इन राजपूत वंशों की उत्पत्ति के विषय में विद्धानों के दो मत प्रचलित हैं- एक का मानना है कि राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी है, जबकि दूसरे का मानना है कि, राजपूतों की उत्पत्ति भारतीय है। 12वीं शताब्दी के बाद् के उत्तर भारत के इतिहास को टोड ने 'राजपूत काल' भी कहा है। कुछ इतिहासकारों ने प्राचीन काल एवं मध्य काल को 'संधि काल' भी कहा है। इस काल के महत्वपूर्ण राजपूत वंशों में राष्ट्रकूट वंश, चालुक्य वंश, चौहान वंश, चंदेल वंश, परमार वंश एवं गहड़वाल वंश आदि आते हैं। विदेशी उत्पत्ति के समर्थकों में महत्वपूर्ण स्थान 'कर्नल जेम्स टॉड' का है। वे राजपूतों को विदेशी सीथियन जाति की सन्तान मानते हैं। तर्क के समर्थन में टॉड ने दोनों जातियों (राजपूत एवं सीथियन) की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की समानता की बात कही है। उनके अनुसार दोनों में रहन-सहन, वेश-भूषा की समानता, मांसाहार का प्रचलन, रथ के द्वारा युद्ध को संचालित करना, याज्ञिक अनुष्ठानों का प्रचलन, अस्त्र-शस्त्र की पूजा का प्रचलन आदि से यह प्रतीत होता है कि राजपूत सीथियन के ही वंशज थे। विलियम क्रुक ने 'कर्नल जेम्स टॉड' के मत का समर्थन किया है। 'वी.ए. स्मिथ' के अनुसार शक तथा कुषाण जैसी विदेशी जातियां भारत आकर यहां के समाज में पूर्णतः घुल-मिल गयीं। इन देशी एवं विदेशी जातियों के मिश्रण से ही राजपूतों की उत्पत्ति हुई। भारतीय इतिहासकारों में 'ईश्वरी प्रसाद' एवं 'डी.आर. भंडारकर' ने भारतीय समाज में विदेशी मूल के लोगों के सम्मिलित होने को ही राजपूतों की उत्पत्ति का कारण माना है। भण्डारकर, कनिंघम आदि ने इन्हे विदेशी बताया है। । इन तमाम विद्वानों के तर्को के आधार पर निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि, यद्यपि राजपूत क्षत्रियों के वंशज थे, फिर भी उनमें विदेशी रक्त का मिश्रण अवश्य था। अतः वे न तो पूर्णतः विदेशी थे, न तो पूर्णत भारतीय।

राजपूतोँ के वँश

"दस रवि से दस चन्द्र से बारह ऋषिज प्रमाण, चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण, भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान, चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण." अर्थ:-दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का पमाण मिलता है। सूर्य वंश की दस शाखायें:- १.कछवाह २.राठौड ३.बडगूजर ४.सिकरवार ५.सिसोदिया ६.गहलोत ७.गौर ८.गहलबार ९.रेकबार १०.जुनने चन्द्र वंश की दस शाखायें:- १.जादौन, २.भाटी, ३.तोमर, ४.चन्देल, ५.छोंकर, ६.होंड, ७.पुण्डीर, ८.कटैरिया, ९.स्वांगवंश, १०.वैस अग्निवंश की चार शाखायें:- १.चौहान, २.सोलंकी, ३.परिहार, ४.पमार ऋषिवंश की बारह शाखायें:- १.सेंगर, २.दीक्षित३.दायमा४.गौतम५.अनवार (राजा जनक के वंशज)६.विसेन७.करछुल८.हय९.अबकू तबकू १०.कठोक्स ११.द्लेला १२.बुन्देला चौहान वंश की चौबीस शाखायें:- १.हाडा २.खींची ३.सोनीगारा ४.पाविया ५.पुरबिया ६.संचौरा ७.मेलवाल८.भदौरिया ९.निर्वाण १०.मलानी ११.धुरा १२.मडरेवा १३.सनीखेची १४.वारेछा १५.पसेरिया १६.बालेछा १७.रूसिया १८.चांदा१९.निकूम २०.भावर २१.छछेरिया २२.उजवानिया २३.देवडा २४.बनकर कछवाहा (कुशवाहा) वंश कछवाहा (कुशवाहा) वंश सूर्यवंशी राजपूतों की एक शाखा है। कुल मिलाकर बासठ वंशों के प्रमाण ग्रन्थों में मिलते हैं। ग्रन्थों के अनुसार-

              चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण 
              भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण 

(दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का प्रमाण मिलता है। इन्हीं में से एक क्षत्रिय शाखा कछवाहा (कुशवाहा) निकली। यह उत्तर भारत के बहुत से क्षेत्रों में फ़ैली। "कछवाहा मौर्य वंश की एक शाखा है") राजस्थान कछवाहों वंश राजस्थान के इतिहास में बारहवीं शताब्दी से प्रकट हुआ था। सोढदेव का बेटा दुल्हराय का विवाह राजस्थान में मोरागढ़ के शासक रालण सिंह चौहान की पुत्री से हुआ था। रालण सिंह चौहान के राज्य के पड़ौसी दौसा के बड़गुजर राजपूतों ने मोरागढ़ राज्य के पचास गांव अपने अधिकार में कर लिए थे। अत: उन्हें मुक्त कराने के लिए रालण सिंह चौहान ने दुल्हेराय को सहायता हेतु बुलाया और दोनों की संयुक्त सेना ने दौसा पर आक्रमण कर बड़गुजर शासकों को मार भगाया। दौसा विजय के बाद दौसा का राज्य दुल्हेराय के पास रहा। दौसा का राज्य मिलने के बाद दुल्हेराय ने अपने पिता सोढदेव को नरवर से दौसा बुलालिया और अपने पिता सोढदेव जी को विधिवत दौसा का राज्याभिषेक कर दिया गया। इस प्रकार राजस्थान में दुल्हेराय जी ने सर्वप्रथम दौसा में कछवाह राज्य स्थापित कर अपनी राजधानी सर्वप्रथम दौसा स्थापित की। राजस्थान में कछवाह साम्राज्य की नींव डालने के बाद दुल्हेराय जी ने भांडारेज, मांच, गेटोर, झोटवाड़ा आदि स्थान जीत कर अपने राज्य का विस्तार किया। दौसा से इन्होने ढूंढाड क्षेत्र में मॉच गॉव पर अपना अधिकार किया जहॉ पर मीणा जाति का कब्जा था, मॉच (या मॉची) गॉव के पास ही कछवाह राजवंश के राजा दुलहरायजी ने अपनी कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बनबाया । कछवाह राजवंश के राजा दुलहराय जी ने अपने ईष्टदेव भगवान श्री रामचन्द्र जी तथा अपनी कुलदेवीश्री जमवाय माता जी के नाम पर उस मॉच (मॉची) गॉव का नाम बदल कर जमवारामगढ रखा। इस वंश के प्रारम्भिक शासकों में दुल्हराय बडे़ प्रभावशाली थे, जिन्होंने दौसा, रामगढ़, खोह, झोटवाड़ा, गेटोर तथा आमेर को अपने राज्य में सम्मिलित किया था। सोढदेवकी मृत्यु व दुल्हेराय के गद्दी पर बैठने की तिथि माघ शुक्ला सप्तमी (वि.संवत ११५४) है I अधिकतर इतिहासकार दुल्हेराय जी का राजस्थान में शासन काल ११५४ से ११८४ वि०सं० के मध्य मानते है I क्षत्रियों के प्रसिद्ध ३६ राजवंशों में कछवाहा(कुशवाहा) वंश के कश्मीर, राजपुताने (राजस्थान) में अलवर, जयपुर, मध्यप्रदेश में ग्वालियर,मईहर, अमेठी, दार्कोटी आदि राज्य थे। इनके अलावा राज्य, उडीसा मे मोरमंज, ढेकनाल, नीलगिरी, बऊद और महिया राज्य कछवाहो के थे। कई राज्य और एक गांव से लेकर पाँच-पाँच सौ ग्राम समुह तक के ठिकानें , जागीरे और जमींदारीयां थी राजपूताने में कछवाहो की१२ कोटडीया और५३ तडे प्रसिद्ध थीं। आमेर के बाद कछवाहो ने जयपुर शहर बसाया, जयपुर शहर से ७ किमी की दूरी पर कछवाहो का किला आमेर बना है और जयपुर शहर से ३२ कि.मी की दूरी पर ऑधी जाने वाली रोड पर जमवारामगढ है। जमवारामगढ से 5 किमी की दूरी पर कछवाहो की कुलदेवी श्री जमवाय माता जी का मंदिर बना है । इस मंदिर के अंदर तीनमू र्तियॉ विराजमान है, पहली मूर्ति गाय के बछडे के रूप में विराजमान है, दूसरी मूर्ति श्री जमवाय माता जी की है, और तीसरी मूर्ति बुडवाय माता जी की है। श्री जमवाय माता जी के बारे में कहा गया है, कि ये सतयुग में मंगलाय, त्रेता में हडवाय, द्वापर में बुडवाय तथा कलियुग में जमवाय माता जी के नाम से देवी की पूजा - अर्चना होती आ रही है। कछवाहों की उत्पति

वर्तमान कछवाह या कुशवाहा सुयवंशी क्षत्रियों की प्रमुख खाप है । राजपूतों की इस खाप की उत्पति कहाँ से और कैसे हुई ? मान्यता की यह कुल राम के पुत्र कुश से उत्पन्न हौवा। परन्तु शोध खोज से मालूम पडता है की किसी भी प्राचीन शिलालेख या साहित्य में कछवाहा शब्द अंकित नहीं किया गया है। ग्वालियर (कच्छपघाट महिपालदेव का ग्वालियर का सास-बहू मंदिर का शिलालेख वि.स. 1150 ) दूबकुण्ड (कच्छपघाट महाराजाधिराज विक्रम सिंह का दूबकुंड शिलालेख वि.स. 1145) आदि संस्कृत शिलालेखों या दानपत्रों मे इसके लिए कच्छपघात,कच्छपा कच्छपारी आदि नाम अंकित मिलते हैं जी बारहवीं शताब्दी के हैं। इससे पूर्व किसी भी शिलालेख या साहित्य में इस खाप के लिए कुछ भी लिखित रुप से प्राप्य नहीं है । ग्वालियर ओर दूबकुंड पर शासन करने वाली इस जाति के वंशधर ही राजस्थान मे आए और दौसा तथा आमेर आदि क्षेत्र मे अधिकार कर यहाँ के शासक बन बैठे और उन्ही के वंशज कछवाहा, कछावा कहलाने लगे। इससे यह तो सिद्ध है की ग्वालियर के कच्छपघातक ही अपभ्रश राजस्थानी भाषा मे कछवाह या कछावा हुआ।

“कछवाह” शब्द का उल्लेख राजस्थान साहित्य में देखें तो 13 शती के विसलदे रासो (गोड़ चढ़या गज केशरी कचवाह कहूँ निरवाण, कोई सोलंकी वाखला कोई चावड़ा कोई चहुवाण) में मिलता है। 14 वीं शती हम्मीर महाकाव्यम ‘कुत्सवाह’ शब्द का प्रयोग कछवाहों के लिए हुआ है। (सोsन्यदा प्रमदानेत्र पावने योवनश्रित। परिणेतु सुता कत्सवाहस्याssभ्रपूरीमगात: 1182 ॥ इसके बाद के साहित्य मे प्रर्थ्वीराज रासो (13 वीं शती से 16 वीं शती) क्यामखाँ रासो (1691 वि. कछवाहिनजब यां कहयो ऐसों कौन मूछारर, जो इन पटीयन माहीं ते हमको देत निकार॥767॥ कयामखाँ रासो पृ.65) नैणसी री ख्यात (रामचन्द्र रा लव नै कुस हुया,....कुस रा कछवाहा हुआ (नैणसी री ख्यात भाग 1 पृ.293) कछवाहों की खापें निम्न है। देलणोत ,झामावत ,घेलणोत , राल्णोत ,जीवलपोता ,आलणोत (जोगी कछवाहा) , प्रधान कछवाहा , सावंतपोता, खीवाँवात , बिकसीपोता,पीलावत ,भोजराजपोता (राधर का,बीकापोता ,गढ़ के कछवाहा,सावतसीपोता) ,सोमेश्वरपोता,खींवराज पोता, दशरथपोता,बधवाड़ा,जसरापोता, हम्मीरदे का , भाखरोत, सरवनपोता,नपावत,तुग्या कछवाहा, सुजावत कछवाहा, मेहपाणी , उग्रावत , सीधादे कछवाहा, कुंभाणी , बनवीरपोता,हरजी का कछवाहा,वीरमपोता, मेंगलपोता, कुंभावत, भीमपोता या नरवर के कछवाहा, पिचयानोत , खंगारोत,सुल्तानोत, चतुर्भुज, बलभद्रपोत, प्रताप पोता, नाथावत, बाघावत, देवकरणोत , कल्याणोत, रामसिंहहोत, साईंदासोत, रूप सिंहसोत, पूर्णमलोत , बाकावत , राजावत, जगन्नाथोत, सल्देहीपोता, सादुलपोता, सुंदरदासोत , नरुका, मेलका, शेखावत, करणावत , मोकावत , भिलावत, जितावत, बिझाणी, सांगणी, शिवब्रह्मपोता , पीथलपोता, पातलपोता।

वि.स. १६ से २०२० का इतिहास वि.स. १६ (16) में ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) के ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी को १२ (12) घोड़े की जागीर ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में निवास करने के लिए प्रदान की गयी ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी के बेटे ठाकुर साहब राज सिंह १६९० (1690) से ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में निवास करने लगे. ठाकुर साहब शिशराम सिंह

                                                                               ठाकुर साहब राज सिंह

ठाकुर साहब राज सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह , 2. ठाकुर साहब गुमान सिंह , 3. ठाकुर साहब धन सिंह , 4. ठाकुर साहब साहब सिंह, 5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह 1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह - ठाकुर साहब जोरावर सिंह का वंश आगे नही चला. 2. ठाकुर साहब गुमान सिंह - ठाकुर साहब गुमान सिंह के चार लड़के जिनमे देवी सिंह , राम सिंह , अखे सिंह , पंध सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। अखे सिंह जी के चार लड़के जिनमे गोविन्द सिंह, सावंत सिंह, विसल सिंह, सोहल सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। ठाकुर साहब गुमान सिंह के पोते (अखे सिंह के बेटे ) सावंत सिंह के चार बेटे जिनमे बख्तावर सिंह , पिरथी सिंह, मान सिंह,और मोती सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। 3. ठाकुर साहब धन सिंह - ठाकुर साहब धन सिंह का वंश आगे नही चला. 4. ठाकुर साहब साहब सिंह (बड़ी छतरी ओर सीला , भोमिया जी महाराज) - ठाकुर साहब साहब सिंह के दो बेटे धीरज सिंह, मोहन सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे जिनमे गुलाब सिंह, संगराम सिंह, सोहल सिंह, भूप सिंह, सालिम सिंह, नवल सिंह , विसन सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। 1. (ठाकुर साहब धीरज सिंह जी का वंश) (ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे गुलाब सिंह जी का वंश) ठाकुर साहब धीरज सिंह के के बेटे गुलाब सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मगल सिंह, हाकिम सिंह, छीतर सिंह ( छोटी छतरी, भोमियाजी महाराज), रणजीत सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। (ठाकुर साहब गुलाब सिंह के बेटे रणजीत सिंह जी का वंश) गुलाब सिंह के बेटे रणजीत सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मोहन सिंह, सुल्तान सिंह, भीम सिंह (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह), पध सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। रणजीत सिंह के बेटे मोहन सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे जीवन सिंह, नादरा सिंह, भगवंत सिंह, हरेनाथ सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। मोहन सिंह के बेटे भगवंत सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे मलजी, ननुलाल सिंह, किशन सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। (ठाकुर साहब रणजीत सिंह के बेटे भीम सिंह (दुर्जन सिंह) जी का वंश) रणजीत सिंह के बेटे भीम सिंह (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। ठाकुर साहब भीम सिंह (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) के के बेटे सोहल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह के बेटे रघुमान सिंह, बखतावार सिंह, इन्द्र सिंह, कानसिंह, अमृत सिंह, दोलत सिंह , सुजान सिंह , सहजमरण सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। सोहल सिंह के बेटे अमृत सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे हाथी सिंह, फूल सिंह, चमन सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। अमृत सिंह के बड़े बेटे हाथी सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे शिवप्रसाद सिंह, मेहताब सिंह सुगन सिंह, गोविन्द सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। अमृत सिंह के दूसरे नंबर वाले बेटे फूल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सुगन सिंह जी को गोद लिया और अपना वंश सुगन सिंह जी को गोद लेकर बढ़ाया। हाथी सिंह के सबसे बड़े बेटे शिवप्रसाद सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और शिवप्रसाद सिंह ने एक बेटे को जन्म दिया उनका नाम भवर सिंह रखा गया। ठाकुर साहब भवर सिंह को ताजीम की उपाधि भी प्रदान की गयी थी।

ठाकुर साहब भवर सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और तीन बेटे तेज सिंह, उमेद सिंह, केहरि सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

ठाकुर साहब तेज सिंह के दो बेटे हैं किशन सिंह और दिनेश सिंह, ठाकुर साहब उमेद सिंह के दो बेटे हैं महेश सिंह और जितेंद्र सिंह, ठाकुर साहब केहरि सिंह के दो बेटे हैं धर्मेंद्र सिंह और पुरेंद्र सिंह. अभी भी इनका वंश चल रहा है ये ठिकाना - कैरवाड़ा (पालवाड़ा) में निवास कर रहे है.

(ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे संग्राम सिंह जी का वंश) ठाकुर साहब धीरज सिंह के के बेटे संग्राम सिंह जी ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और पदम सिंह जी को गोद लिया, पदम सिंह जी किशन सिंह जी के बेटे थे उनको संग्राम सिंह जी ने गोद लेकर अपना वंश आगे बढ़ाया। इस प्रकार पदम सिंह के नाम से संग्राम सिंह जी का वंश आगे चला। (ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे भूप सिंह जी का वंश) ठाकुर साहब धीरज सिंह के के बेटे भूप सिंह जी ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया। भूप सिंह जी ने बेरीसाल सिंह और सुल्तान सिंह जी के बेटे चपरा सिंह जी को भी गोद लिया। अर्थात भूप सिंह जी ने बेरीसाल सिंह और चपरा सिंह जी को भी गोद लिया। बेरीसाल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटे गंगा सिंह जी, शिवचरन सिंह, सादुल सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। गंगा सिंह के बेटे गोवर्धन सिंह जी, जसवंत सिंह जी, बहादुर सिंह जी, उमराव सिंह जी, माधो सिंह जी, सम्पत सिंह जी ने जन्म लिया लेकिन गंगा सिंह जी के तीन बेटो की आस्मिक मृत्यु हो गयी उनमे से गोवर्धन सिंह जी, जसवंत सिंह जी, बहादुर सिंह जी ये तीन थे जिनकी आस्मिक मृत्यु हो गयी थी। गंगा सिंह जी के तीन बेटो की आस्मिक मृत्यु होने के कारण उन्होंने नाथू सिंह जी के बेटे गनपत सिंह जी को गोद लिया और जतन सिंह जी के बेटे और भूर सिंह जी के बेटे गिरवर सिंह जी को गोद लिया था। इस प्रकार गंगा सिंह जी का वंश आगे चला। शिवचरन सिंह जी के बेटे शिम्भू सिंह जी, माधो सिंह जी ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। शिम्भू सिंह जी के बेटे ग्यान सिंह जी, साधु सिंह जी, चाँद सिंह जी ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। माधो सिंह जी के बेटे सवाई सिंह, किशोर सिंह जी, भवानी सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया।

चपरा सिंह जी के दो बेटो ने जन्म लिया उनमे से केसरी सिंह जी और बने सिंह जी थे इस प्रकार भूप सिंह जी का वंश चपरा सिंह ने बढ़ाया। (ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे विसन सिंह जी का वंश) ठाकुर साहब विसन सिंह जी के तीन बेटो ने जन्म लिया उनमे से जीवन सिंह जी, अर्जुन सिंह जी और चमन सिंह जी और अपना वंश आगे बढ़ाया। जीवन सिंह जी ने गोद लिए केसरी सिंह जी और बने सिंह जी को और अपना वंश आगे बढ़ाया। केसरी सिंह जी और बने सिंह जी दोनों चंदर सिंह जी के बेटे थे जिने जीवन सिंह जी ने गोद ले लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। जीवन सिंह जी के बेटे केसरी सिंह जी ने अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटा शिम्भू सिंह जी ने जन्म लिया। अर्जुन सिंह जी ने अपना वंश आगे बढ़ाया और उनके बेटा हनुत सिंह जी और चंदर सिंह जी जो की गोद गए जीवन सिंह जी के इस प्रकार इनका वंश चला। 2. (ठाकुर साहब मोहन सिंह जी का वंश) ठाकुर साहब मोहन सिंह जी के बेटे माधो सिंह और रघुनाथ सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया।

5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह - ठाकुर साहब संग्राम सिंह के गोद आये सुर्जन सिंह , दुर्जन सिंह, और बक्स सिंह जी, ये तीन बेटे ठाकुर साहब संग्राम सिंह ने गोद लिये थे ठिकाना - कैरवाड़ा के समस्त पिचानोत राजपूत एक ही वंश का हिस्सा है। पिचानोत राजपूत परिवार में कुछ गोद भी आये हैं तो कुछ पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे है सभी पिचानोत राजपूत ठिकाना - कैरवाड़ा के ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी के वंशज माने जाते है और वर्तमान में पिचानोत राजपूत परिवार की सख्या में बढ़ोतरी हुई तो पिचानोत राजपूतो ने अपना निवास ठिकाना कैरवाड़ा में पालवाड़ा, पुराना कैरवाड़ा, भोमिया जी के मंदिर के पास , हवेली और जोहड़ के पास बना लिया है।

भोमिया शब्द यह इतिहास बहुत पुराना है परन्तु उतना ही सच है। यह इतिहास ठिकाना कैरवाड़ा अलवर, राजस्थान का है जोकि एक समय में राजपूताना के नाम से जाना जाता था। वर्तमान मै कैरवाड़ा गाव, मालाखेड़ा तहसील के अलवर जिले से 14 किलोमीटर की दूरी ओर जयपुर से 142 किलोमीटर और दिल्ली से 200 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ हैं। अभी कैरवाड़ा (अलवर) दिल्ली एनसीआर में हैं भोमिया शब्द जागीरदारों के लिए उपयोग किया गया राजस्थान के अंदर सर्वाधिक भोमिया पाए जाते हैं जागीरदारों की मृत्यु के बाद पुरानी देवी देवताओं के दारा उनको देव योनी के अंदर प्रवेश लिया जाता है और उन्हें कलयुग का देवता के रूप में लोगों की समस्या को हल करने के लिए उनकी आत्मा को एक मूर्ति के रूप में इस धरती पर प्रतिष्ठित करते हैं राजस्थान के लगभग हर गांव में कई भोमियाजी है उनके अंदर दैविक शक्ति होती है जिससे वह लोगों की समस्याओं को हल करते हैं वे संपूर्ण देव न होकर अर्द्ध देव कहलाते हैं

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज (ठाकुर साहब साहब सिंह)


श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज (ठाकुर साहब छीतर सिंह)



भौमिया जी का इतिहास जब राजपुताना राज्य में अनेक जगह मुस्लिम आक्रमण होने लगे तब से राज्य में ठिकानों का भी विस्तार होने लगा। उसी ठिकानों के विस्तार में एक ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) भी शामिल है. वर्तमान में ठिकाना धमरेड, राजगढ, अलवर जिले के राजस्थान राज्य में हैं।

ठिकाना धमरेड से वि.स. १६ (16) में ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी को १२ (12) घोड़े की जागीर ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में दी गयी। वर्तमान मै कैरवाड़ा गाव, मालाखेड़ा तहसील के अलवर जिले से 14 किलोमीटर की दूरी ओर जयपुर से 142 किलोमीटर और दिल्ली से 200 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ हैं। अभी कैरवाड़ा (अलवर) दिल्ली एनसीआर में हैं ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी ठिकाना कैरवाड़ा अस्थाई रुप से रहने लगे, और उनके बाद उनके बेटे ठाकुर साहब राज सिंह १६९० (1690) से ठिकाना कैरवाड़ा में स्थाई रूप से निवास करने लगे। उस समय उल्वर राज्य (जिसका वर्तमान नाम अलवर हैं) में मेवात सख्या में बढ़ोतरी होने लगी और समाज में परेशानी होने लगी तो उन जगहों में सुधार के लिए ठिकानों का विस्तार होने लगा जिससे समाज में लोगो की परेशानियो में सुधार होने लगा। ठाकुर साहब राज सिंह के पाँच बेटे उनमे से बेटे जोरावर सिंह, गुमान सिंह, धन सिंह, साहब सिंह, संग्राम सिंह। साहब सिंह शांत स्वभाव के और हमेशा साधु, संन्यासीयो के साथ अपना अधिकांश समय व्यतीत करने लगे साहब सिंह भगवान के भक्ति में खोये रहते थे. साहब सिंह के घर में दो बेटे धीरज सिंह, मोहन सिंह ने जन्म लिए, और साहब सिंह हमेशा भगवान की भक्ति में खोये रहते थे। मानव का जीवन नश्वर होता हैं जिसने धरती पर जन्म लिया हैं उसे एक दिन अपने शरीर को त्याग कर जाना पड़ता हैं और आत्मा हमेशा अमर रहती हैं। वो दिन भी पास आने लगा तो एक दिन साहब सिंह ने अपने दोनों बेटो को पास बुलाया और उनसे कहा की अब मेरा जीवन इतना रहा नहीं हैं और मेरी एक अंतिम इच्छा हैं कि मेरे मरने के बाद मेरे शरीर को अग्नि मत देना मुझे साधु, महात्मा ओ की तरह मिट्टी दे देना, क्योंकि मेने अपना सांसारिक जीवन का बहुत पहले त्याग कर दिया हैं और भगवान की भक्ति मे अपना शरीर का त्याग कर दूंगा. हिन्दू सनातन धर्म में पार्थिव शरीर को दाह संस्कार करने का नियम है। सनातन धर्म में साधु को समाधि और सामान्यजनों का दाह संस्कार किया जाता है। इसके पीछे कई कारण हैं। साधु को समाधि इसलिए दी जाती है क्योंकि ध्यान और साधना से उसका शरीर एक विशेष उर्जा और ओरा लिए हुए होता है इसलिए उसकी शारीरिक ऊर्जा को प्राकृतिक रूप से विसरित होने दिया जाता है जबकि आम व्यक्ति को इसलिए दाह किया जाता है क्योंकि यदि उसकी अपने शरीर के प्रति आसक्ति बची हो तो वह छूट जाए। जब यह बात पुरे परिवार, समाज में आग की तरह फेल गई और परिवार और समाज के लोगों ने साहब सिंह की अंतिम इच्छा को एक सिरे से खारिज कर दिया, और कहते हैं ना विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता है लेकिन आज ठिकाना कैरवाड़ा में समाज का फेसला भी अटल था साहब सिंह ने भगवान की भक्ति करते हुए अपना शरीर का त्याग कर दिया। हिन्दू धर्म के अनुसार साहब सिंह की अर्थी तैयार की गयी परिवार शोक में डूब गया. साहब सिंह की अर्थी को अग्नि देने के लिए समसान में ले आये और सभी समाज के लोगो ने साहब सिंह की बोली गयी बात को भी नजर अन्दाज कर दिया (मेरी एक अंतिम इच्छा हैं कि मेरे मरने के बाद मेरे शरीर को अग्नि मत देना मुझे साधु, महात्मा ओ की तरह मिट्टी दे देना, क्योंकि मेने अपना सांसारिक जीवन का बहुत पहले त्याग कर दिया हैं) किसी को भी उनके द्वारा बोली बात नहीं मानने का दुष्परिणाम का पता नहीं था. साहब सिंह को अग्नि देने के लिए लकडिया लगा दी गयी और पुरे विधि विधान के साथ अग्नि उनके बड़े बेटे धीरज सिंह पास में आगये तभी एक चमत्कार घटना हो गयी वहा उपस्थित सभी समाज और दूसरे समाज से आए लोग डर गए. उस समय एक आकाशवाणी सुनकर वहा उपस्थित सभी समाज और दूसरे समाज से आए लोग हैरान रह गये।

सिला आसमान से आवाज आने लगी मेने आप लोगो को मना किया था की मुझे अग्नि मत देना मुझे मिट्टी में दपना देना और बहुत तेज हवाये चलने लगी आसमान से खून की बारिश होने लगे और उसके कुछ समय बाद फूलो की बारिश होने लगी वह पर खड़े लोग कुछ सोचते और समझते तब तक आसमान से बहुत तेज आवाज के साथ एक सिला ( बहुत बड़ा पत्थर) आकर पड़ा ठाकुर साहब साहब सिंह का शव जमीन में अन्दर चला गया, इस प्रकार से साहब सिंह का शव समस्त लकड़ियों के साथ धरती में समा गया और केवल ऊपर सिला नजर आने लगी उसके कुछ दिन बाद लोगो ने उस सिला की खुदाई शुरु करने लग गए परन्तु उनको सिला का अंतिम छोर नजर नहीं आया तो उन लोगो ने खुदाई रोक दिया चमत्कार हाथरस (उत्तर प्रदेश) के पास कोई सेठ रहता था उसके कोई संतान नहीं थी तो भोमियाजी (साहब सिंह) ने उनको एक सपना दिया की कैरवाड़ा (राजपुताना ) में जाकर वहा राजपूतो का एक समसान घाट हैं वहा पर जाकर मेरा मन्दिर बन जायेगा तो आपके संतान हो जाएगी सेठ कैरवाड़ा में पहुंच गया और अपना सपना गाव के लोगों को बताने लगा और वहा सेठ ने भोमियाजी (साहब सिंह) का मंदिर तैयार करा दिया और उस सेठ को संतान हो गयी और भोमिया जी की मान्यता सभी जगह फैलने लग गयी और दूर दूर से भक्त गण आने लगे तो राजपूत समाज ने वहा राजपूत समसान घाट बंद कर दिया और उस जगह पर बगीचा बना दिया जब सभी की मनोकामना पूर्ण होने लगी तो धीरे - धीरे दिल्ली , हरियाणा , मध्य प्रदेश , उत्तर प्रदेश और भी राज्यों से यहा लोग यहा आने लगे। हर साल यहा श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज का मेला लगता हैं जब फसल कट जाती है तब गर्मियों में पीपल पुणु का मेला भरता है मेले में अनेको दुकाने आती हैं साथ में विशाल कुश्ती ढ़गल भी होता है कुश्ती में भाग लेने अनेको पहलवान आते है पीपल पुणु को अभुज सावा होने के कारण भी हजारो की सख्या में भक्त आते है श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज को प्रसाद चढ़ाते है और कुश्ती एवम मेला का हिस्सा बनते हैं कुछ लोग मन्नत मांगते हुए पेट के बल परिक्रमा लगाते हैं और शादी होने के बाद जोड़े से लोग श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज का ढोक देने एवं प्रसाद चढ़ाने आते हैं साथ में कुछ लोग यहा अपने बच्चे का जडूला उतरवाने भी आते हैं श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की सेवा करने वाले मंदिर के साधु महंत भोलागिरी बताते है की भोमिया जी के प्रसाद रविवार और बृहस्पतिवार के साथ हर महीने की पुणु को चढ़ाया जाता हैं श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की दो छतरी हैं जो सबसे बड़ी छतरी तो ठाकुर साहब साहब सिंह की हैं और छोटी छतरी ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे गुलाब सिंह जी के बेटे छीतर सिंह जी की हैं.




श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज के मेले के फोटो इस प्रकार से है -



श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की ज्वाला




श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज की ज्वाला और दीपक जलते हुए

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज के प्रसाद चढ़ाते पंडित जी।

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज के मेले अपने बच्चे का जडूला उतरवाते हुए लोग।

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज का मेला (हर साल गर्मियों के पीपल पुनु को भरता हैं।)


श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज के मेले में सामान खरीदते पुरुष, महिलाये और बच्चे।

    श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज के मेले में कुश्ती दगल का आयोजन होता हुआ    

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज के मेले में कुश्ती लड़ते हुए पहलवान।

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज के मेले में कुश्ती लड़ते हुए पहलवान।


श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज मन्दिर के साधु श्री भोला गिरी महाराज

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज मन्दिर के पास बने अन्य देवी - देवताओ के चबूतरे ।

श्री श्री १००८ श्री भोमिया जी महाराज मन्दिर के पास बने अन्य देवी - देवताओ के चबूतरे ।

वि.स. १६ से २०२० का इतिहास वि.स. १६ (16) में ठिकाना धमरेड, राजगढ (राजपूताना) के ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी को १२ (12) घोड़े की जागीर ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में निवास करने के लिए प्रदान की गयी. ठाकुर साहब शिशराम सिंह जी के बेटे ठाकुर साहब राज सिंह १६९० (1690) से ठिकाना कैरवाड़ा, अलवर (राजपूताना) में निवास करने लगे

ठाकुर साहब शिशराम सिंह

                                                                               ठाकुर साहब राज सिंह

ठाकुर साहब राज सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब जोरावर सिंह , 2. ठाकुर साहब गुमान सिंह , 3. ठाकुर साहब धन सिंह , 4. ठाकुर साहब साहब सिंह, 5. ठाकुर साहब संग्राम सिंह

                                                              ठाकुर साहब  साहब सिंह  (बड़ी छतरी ओर सीला , भोमिया जी महाराज)

ठाकुर साहब साहब सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब धीरज सिंह, 2. ठाकुर साहब मोहन सिंह ठाकुर साहब धीरज सिंह ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब गुलाब सिंह, 2. ठाकुर साहब संगराम सिंह, 3. ठाकुर साहब सोहल सिंह, 4. ठाकुर साहब भूप सिंह, 5. ठाकुर साहब सालिम सिंह, 6. ठाकुर साहब नवल सिंह , 7. ठाकुर साहब विसन सिंह. ठाकुर साहब गुलाब सिंह

ठाकुर साहब धीरज सिंह के बेटे गुलाब सिंह जी के चार बेटे 1. मगल सिंह, 2. हाकिम सिंह, 3. छीतर सिंह ( छोटी छतरी, भोमियाजी महाराज), 4. रणजीत सिंह. ठाकुर साहब रणजीत सिंह गुलाब सिंह के बेटे रणजीत सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और चार बेटे मोहन सिंह, सुल्तान सिंह, भीम सिंह (दुर्जन सिंह), पध सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। ठाकुर साहब भीम सिंह (दुर्जन सिंह)

रणजीत सिंह के बेटे भीम सिंह (दुसरा नाम - दुर्जन सिंह) ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया और सोहल सिंह ने जन्म लिया और अपना वंश आगे बढ़ाया। ठाकुर साहब भीम सिंह (दुर्जन सिंह) के के बेटे सोहल सिंह ने भी अपना वंश आगे बढ़ाया

                                                                                ठाकुर साहब  सोहल सिंह

ठाकुर साहब सोहल सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब रघुमान सिंह, 2. ठाकुर साहब बखतावार सिंह, 3. ठाकुर साहब इन्द्र सिंह, 4. ठाकुर साहब कानसिंह, 5. ठाकुर साहब अमृत सिंह, 6. ठाकुर साहब दोलत सिंह , 7. ठाकुर साहब सुजान सिंह , 8. ठाकुर साहब सहजमरण सिंह.

 ठाकुर साहब  अमृत सिंह

ठाकुर साहब अमृत सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब हाथी सिंह, 2. ठाकुर साहब फूल सिंह, . 3. ठाकुर साहब चमन सिंह. ठाकुर साहब हाथी सिंह ठाकुर साहब हाथी सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब शिवप्रसाद सिंह, 2. ठाकुर साहब मेहताब सिंह, 3. ठाकुर साहब सुगन सिंह, 4. ठाकुर साहब गोविन्द सिंह. ठाकुर साहब शिवप्रसाद सिंह ठाकुर साहब भॅवर सिंह ठाकुर साहब भॅवर सिंह के बेटे 1. ठाकुर साहब तेज सिंह, 2. ठाकुर साहब उमेद सिंह , 3. ठाकुर साहब केहरि सिंह.

ठाकुर साहब तेज सिंह के दो बेटे हैं किशन सिंह और दिनेश सिंह, ठाकुर साहब उमेद सिंह के दो बेटे हैं महेश सिंह और जितेंद्र सिंह, ठाकुर साहब केहरि सिंह के दो बेटे हैं धर्मेंद्र सिंह और पुरेंद्र सिंह.

  1. https://www.bhaskar.com/news/INT-bengal-famine-of-1943-three-million-people-died-from-starvation-5012271-PHO.html