उत्तर प्रदेश का लोक नाट्य "नौटंकी" लोकरंजन का एक सशक्त माध्यम रहा है, किंतु कालांतर में इसमें फूहड़ता और अश्लीलता के समाहित होने से सभ्रांत परिवार के लोग इससे दूर होते गए और नौटंकी को हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। विनोद रस्तोगी जी, जिनका बचपन त्रिमोहन जी के नगाड़े की गूंज के बीच बीता और फिर जो श्री कृष्ण पहलवान के सानिध्य में आए, ने इस रोग ग्रस्त लोक नाट्य के पुनरोत्थान का बीड़ा उठाया और पारंपरिक नौटंकियों से हटकर सामाजिक समस्याओं और विषयों पर नौटंकी लिखी और उसे मंच तक पहुंचाया। रस्तोगी जी का जन्म 12 मई 1923 को फर्रुखाबाद जिले के शमसाबाद कस्बे में एक व्यापारी परिवार में हुआ था, प्रारंभिक शिक्षा शमसाबाद में प्राप्त करने के उपरांत ये फर्रुखाबाद, कन्नौज और फिर कानपुर गए। कन्नौज में ही नौटंकी के बादशाह त्रिमोहन जी के संपर्क में आए और फिर कानपुर में श्री कृष्ण पहलवान को निकट से देखने और समझने का अवसर प्राप्त हुआ। रस्तोगी जी की लेखन, निर्देशन तथा अभिनय प्रतिभा से प्रभावित होकर आकाशवाणी के तत्कालीन महानिदेशक श्री जगदीश चंद्र माथुर ने उन्हें 1960 में आकाशवाणी के इलाहाबाद केंद्र पर असिस्टेंट ड्रामा प्रोड्यूसर के रूप में नियुक्त किया, और फिर वो ड्रामा प्रोड्यूसर के पद पर आसीन हुए और 1982 में इसी पद से अवकाश ग्रहण किया। श्री रस्तोगी की प्रतिभा को दिल्ली तथा अन्य केंद्र भी सम्मान देते थे। रस्तोगी जी आकाशवाणी के सबसे लम्बे श्रृंखला नाटक "मुंशी इतवारी लाल" के प्रोड्यूसर होने के साथ-साथ मुख्य अभिनेता भी थे। आकाशवाणी के ड्रामा प्रोड्यूसर रहते हुए रस्तोगी जी ने नौटंकी के उत्थान के लिए अथक प्रयास किया और विभिन्न विषयों पर 1 घंटे से लेकर 15 मिनट तक की नौटंकी लिखी और रेडियो के माध्यम से प्रस्तुत की। उन्हें संगीतकार के रूप में साथ मिला श्री गौरी शंकर का तथा नगाड़े पर मोहम्मद करीम हुआ करते थे। गौरी शंकर जी का स्थानांतरण लखनऊ हो जाने के बाद उनके शिष्य उदय चंद्र परदेसी ने मोर्चा सम्हाला और आज तक निस्वार्थ भाव से नौटंकी उत्थान में लगे हैं। क्योंकि अब आकाशवाणी नौटंकी करने लगा था, इसलिए शहर के जाने-माने नाटक के कलाकार इस विधा से जुड़े जिनमें प्रमुख हैं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से उत्तीर्ण श्री मंजुल वर्मा, श्री पालोक बसु (जो इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज के रूप में सेवानिवृत्त हुए), श्री राम चंद्र गुप्त, श्री अजय मुखर्जी, श्री अभिलाष नारायण, श्री अश्विनी अग्रवाल और न जाने कितने। इस आंदोलन से प्रभावित होकर श्री युक्ति भद्र दीक्षित तथा श्री राजेंद्र तिवारी ने भी कई सामाजिक और धार्मिक नौटंकियों का लेखन किया। रस्तोगी जी के प्रयास से दूरदर्शन दिल्ली पर 1975 में पहली बार नौटंकी का प्रस्ताव हुआ और पूरी टीम इलाहाबाद आकाशवाणी की थी। नौटंकी थी "नई लहर" छोटे-बड़े आलेखों को मिलाकर रस्तोगी जी ने लगभग 50 नौटंकियां लिखी और आकाशवाणी के माध्यम से देश के विभिन्न राज्यों में भ्रमण कर-कर के मंचन किया। रस्तोगी जी के देहावसान के बाद उनके सुपुत्र श्री आलोक रस्तोगी ने विनोद रस्तोगी जी के शिष्यों के सहयोग से एक सांस्कृतिक संस्था की रचना की जिसे "विनोद रस्तोगी स्मृति संस्थान" के नाम से पूरे भारतवर्ष में जाना जाता है। इस नाट्य दल के मुख्य संचालकों में श्री आलोक रस्तोगी के अतिरिक्त श्री अभिलाष नारायण, श्री अजय मुखर्जी एवं श्री उदय चंद्र परदेसी के प्रयासों से नौटंकी पर लगातार कार्य हो रहा है तथा अपने 18 सालों के छोटे कार्यकाल में संस्थान ने लगभग 35 नौटंकियां और अन्य लोकनाट्य शैलियों के नाटकों के 250 से अधिक मंचन किए हैं और लगातार करते आ रहे हैं जिनमें प्रमुख हैं - नत्थाराम शर्मा गौड़ की नौटंकी "लैला मजनू", श्री कृष्ण पहलवान की "इंदल हरण", आतमजीत सिंह की "ये कैसा इंसाफ", मुद्राराक्षस की "आला अफसर" विनोद रस्तोगी की "आई भोर सुहानी", "भगीरथ के बेटे", 'तोता मैना", "कहानी घर-घर की", "बंटवारे की आग", "नई लहर", "खेल-खेल में", "तमाशा जारी है", "लोरिक मजरी", "कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा" आदि तथा श्री राजेंद्र तिवारी के "नारद मान-मर्दन" और "पाताल विजय" कालांतर में श्री अतुल यदुवंशी ने भी अपनी संस्था "स्वर्ग रंगमंडल" से नौटंकी को जीवित रखने का प्रयास किया तथा रस्तोगी जी की नौटंकी "बंटवारे की आग" लेकर लाहौर (पाकिस्तान) तक गए। इसके अतिरिक्त संस्थान समय-समय पर नौटंकी निर्देशक आतमजीत सिंह को आमंत्रित कर उनके निर्देशन का लाभ उठाती है और नौटंकी तथा लोक नाट्य समारोहों का आयोजन करती रहती है जिसमें पारंपरिक तथा नई नौटंकी का समावेश रहता है। इलाहाबाद के वयोवृद्ध नगाड़ा वादक श्री फूलचंद भी इसी संस्थान से जुड़े हैं। इसके अलावा संस्थान समय-समय पर "संगीत नाटक अकादमी अवार्डी" व "राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली" के प्रसिद्ध रंग निर्देशकों को आमंत्रित कर प्रयागराज में उनके निर्देशन में नौटंकियों व नाटकों का मंचन करती रही है। जिनमें प्रमुख हैं - श्री सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ (भूतपूर्व निदेशक भारतेन्दु नाट्य अकादमी व संगीत नाटक अकादमी अवार्डी), सत्यव्रत राउत (संगीत नाटक अकादमी अवार्डी), अमिताभ श्रीवास्तव (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय), आतमजीत सिंह (उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी अवार्डी) आदि।

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