"फकीर मोहन सेनापति" के अवतरणों में अंतर

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वास्तव जगत् के कर्मक्षेत्र में ओड़िआ साहित्य के फकीरमोहन एवं हिन्दी साहित्य के प्रेमचन्द - ये दोनों प्रसिद्ध कथाकार परस्पर तुलनीय़ हैं । इनकी कहानियों में तत्कालीन समाज में अनुभूत भारतकी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थनीतिक और सांस्कृतिक अवस्थाओं का सम्यग् रूपायन किया गया है । सामाजिक द्वन्द्व का समाधान, न्याय-अन्याय-विचार, आदर्शवाद, नैतिकता, परस्पर सद्‍भाव प्रतिष्ठा आदि दोनों कहानीकारों का अभीष्ट है । भारतीय भावधारा दोनों की रचना में परिप्लुत है । पाश्चात्य शिक्षा-सभ्यता के प्रति व्यंग्य और कटाक्ष सहित स्वकीय भाषा-साहित्य के प्रति गभीर अनुराग दोनों में अनुभूत होता है । दोनों गाँव में जन्मे थे निम्न मध्यवित्त परिवार में । दुःख- जञ्जाल संघर्षों से भरा था दोनों का जीवन । तत्कालीन सामाजिक स्थिति में व्यापक थे अनेक तत्त्व, जैसे ग्रामीण जीवन में आई जातिप्रथा, धनी-गरीब का भेदभाव, नारी-जाति प्रति अत्याचार और शोषण, बाल्यविधवा समस्या, कुसंस्कार, अन्धविश्वास आदि । इन सबका निराकरण हेतु दोनों का सारस्वत प्रयास अदम्य रहा । किसानों की दुर्दशा दूर करने दोनों की लेखनी तत्पर रही । पुञ्जिपतियों की शोषणक्रिया से किसानों की मुक्ति के लिये उनका सारस्वत उद्यम जारी रहा । प्रेमचन्द का किसान होरी और फकीरमोहन का भगिआ - इन दोनों में अनेक समानता परिलक्षित होती है । भारतीय साहित्य-जगत्‌‍ में फकीरमोहन एवं प्रेमचन्द - ये दोनों स्वाधीनचेता महान् कथाकार वास्तव में चिरस्मरणीय एवं अमर हैं । (फकीरमोहन -जन्म १८४३, निधन १९१८, रचनासृष्टि १८९७ । प्रेमचन्द - जन्म १८८०, निधन १९३६, रचना १९०५ के आसपास ) ।
 
द्रष्टव्य : व्यासकवि फकीरमोहन सेनपति (लेख : डॉ।डॉ हरेकृष्ण मेहेर):
http://www.srijangatha.com/?pagename=hastakshar_16jun2k10
 
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