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भारतीय बैंकिग प्रणाली में वाणिज्यिक बैंकों की अपनी अलग पहचान होने के सात ही उनका महत्व विशेष माना जा सकता है। बैंकिंग प्रणाली की 'रीढ़' की हड्डी इसको कहा जा सकता है। ये बैंक अपने पूर्ण अंश पत्रों के विक्रय, जनता से प्राप्त जमा सुरक्षित कोष, अन्य बैंकों तथा केन्द्रीय बैंक से ऋण लेकर प्राप्त करते हैं और सरकारी प्रतिभूतियों, विनिमय पत्रों, बाड़ों, तैयार माल अथवा अन्य प्रकार की तरल या चल सम्पत्ति की जमानत पर ऋण प्रदान करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक का इन पर नियंत्रण रहता है। राष्ट्रीयकरण से पूर्व इनका उद्देश्य तथा बैंकिग प्रणाली थोड़ी भिन्न प्रकार की थी किन्तु प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण के साथ ही इनकी कार्य प्रणाली तथा अंतर्गत परिचालन की दशा एव दिशा में आमूलाग्र परिवर्तन हुए हैं। इस परिवर्तन के पीछे बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मूल उद्देश्य निहित है। अत: भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के प्रमुख वाणिज्यिक बैंको के राष्ट्रीयकरण की घटना युगप्रवर्तक मानी जा सकती है। बैंक राष्ट्रीयकरण के साथ ही भारतवर्ष की सामाजिक तथा आर्थिक विकास की दिशा उन्नत करने वाले एक नए पर्व की शुरूआत हुई है। १९ जुलाई १९६९ को देश के ५० करोड़ रुपये से अधिक जमा राशि वाले प्रमुख चौदह अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण के साथ ही इस नए विकास पर्व का श्रीगणेश हुआ। इसी के साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली मात्र लेन-देन, जमा या ऋण के माध्यम से केवल लाभ अर्जित करने वाला उद्योग ही न रहकर भारतीय समाज के गरीब, दलित तबकों के सामाजिक एवं आर्थिक पुनरुत्थान और आर्थिक रूप में उन्हें ऊंचा उठाने का एक सशक्त माध्यम बन गया। बैंक राष्ट्रीयकरण की सूत्रधार सौदामिनी श्रीमती इंदिरा गांधी को पूरा यकीन था कि यह बैंकिंग उद्योग राष्ट्र के सर्वागीण विकास एवं पुनरुत्थान की दिशा में तेजी लायेगा। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के ऐतिहासिक पर्व की शुरूआत करते समय श्रीमती इंदिराजी ने कहा था कि "बैंकिंग प्रणाली जैसी संस्था, जो हजारों -लाखों लोगों तक पहुंचती है और जिसे लाखों लोगों तक पहुंचाना चाहिए, के पीछे आवश्यक रूप से कोई बड़ा सामाजिक उद्देश्य होना चाहिए जिससे वह प्रेरित हो और इन क्षेत्रों को चाहिए कि वह राष्ट्रीय प्राथमिकताओं तथा उद्देश्यों को पूरा करने में अपना योगदान दें। " इस विश्वास को सार्थक करने की प्रक्रिया में ही २०० करोड़ रुपये से अधिक जमा राशि वाले और छ: बैंकों का राष्ट्रीयकरण १५ अप्रैल १९८० को कर दिया गया।
 
 
==बैंक राष्ट्रीयकरण के उदेश्य==
 
(ऊ) देश के बीमार उद्योगों को पुनरूज्जीवित करके नए लघु-स्तरीय उद्योगों के नव निर्माण को बढ़ावा देना भी बैंकों के राष्ट्रीयकरण का एक उद्देश्य था। बीमार उद्योगों के कारण बेरोजगारी की समस्या में वृद्धि होकर आर्थिक मंदी फैलने का यह भी एक कारण था अत: ऐसे उद्योगों को आर्थिक सहायता देकर पुनरूज्जीवित करना आवश्यक था। इसके साथ ही लघु-स्तरीय उद्योगों की संख्या पर्याप्त नहीं थी जिससे कस्बाई क्षेत्रों की प्रगति में तेजी नही आ पा रही थी और ऐसे उद्यमी हमेशा विदेश की ओर आंखें लगाकर बैठे हुए होते थे। अत: देश की प्रगति के लिए लघु-स्तरीय उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना भी अत्यंत जरूरी था जोकि आर्थिक सहायता के बगैर असंभव-सा प्रतीत होता था। अत: बैंकों द्वारा आर्थिक नियोजन के लिए उनपर सरकार का स्वामित्य होना एक आवश्यक बात हो गई थी। इस प्रकार अनेक सामाजिक तथा आर्थिक उद्देश्यों के कारण बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया जिससे कि कमजोर एवं उपेक्षित वर्गों की उन्नति के साथ समाज की और प्रकारांतर से राष्ट्र की प्रगति हो।
 
 
==बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद==
[[श्रेणी:भारतीय बैंक व्यवस्था]]
[[श्रेणी:भारत का आर्थिक इतिहास]]
[[श्रेणी:उत्तम लेख]]
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