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[[चिकित्साशास्त्र]] के क्षेत्र में नाना प्रकार के रोगों के विभिन्न कारणों को वैज्ञानिक विवेचन '''हेतुकी''' अथवा '''हेतुविज्ञान''' (Etiology) कहा जाता है।
 
== परिचय ==
मनुष्य को अपनी रक्षा, वृद्धि तथा विकास के लिए विरोधी परिस्थिति से निरतर संघर्ष करना पड़ता है। प्रतिकूल परिस्थिति से निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। प्रतिकूल परिस्थिति को अनुकूल बनाने की चेष्टा में यदि मनुष्य देह विफल होने लगती है, तो वह स्वयं अपने अंग प्रत्यंगों की रक्षा हेतु उनकी रचना तथा क्रिया में आवश्यक हेर-फेर कर विरोधी परिस्थिति से यथासंभव सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करती है, किंतु जब परिस्थिति की विकटता देह की सहन अथवा समंजन शक्ति से अधिक प्रबल, या वेगवती हो जाती है तो प्रस्थापित सामंजस्य में उलट फेर हो जाता है, जिसके फलस्वरूप विरोधी परिस्थिति का दुष्प्रभाव देह के ऊतकों को विकृत कर पीड़ाकारी लक्षणों से युक्त रोग विशेष को प्रकट करता है।
 
सौ-डेढ़ सौ वर्ष पूर्व संसार में जीवाणुजन्य संक्रामक रोगों का प्राधान्य इतना अधिक था कि अन्य कायिक अथवा क्रियागत रोगों की ओर वास्तविक ध्यान अकृष्ट नहीं हो सका। विकसित और समृद्ध देशों में संक्रामक रोगों का सफल नियंत्रण हो जाने पर, अन्य रोगों की रोकथाम का प्रयास संतोषपूर्ण ढंग से हो रहा है और अब वृद्धावस्था के रोगों की समस्या पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जीवन की विषम जटिलता के कारण मानसिक रोगों, औद्योगिकरण के कारण व्यावसायिक रोगों और मशीनों द्वारा दुर्घटनाओं की संख्या अपेक्षाकृत बढ़ रही है, जिनपर ध्यान देना आवश्यक हो गया है। भारत में संक्रामक रोगों की कमी अवश्य हुई है, किंतु उनका पूरा नियंत्रण नहीं हो पाया है। यहाँ कीट, वायु, जल तथा भोजन द्वारा प्रसारित संक्रामक रोगों की प्रधानता के साथ कुपोषणजनित विकार और बालरोगों का बाहुल्य है।
 
== बाहरी कड़ियाँ ==
 
[[श्रेणी:विज्ञान दर्शन]]
[[ja:原因療法]]
[[krc:Этиология]]
[[ne:रोग हेतुविज्ञानहेतु विज्ञान]]
[[nl:Etiologie]]
[[nn:Etiologi]]