"अष्टावक्र (महाकाव्य)" के अवतरणों में अंतर

छो
अष्ट सर्ग
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छो (अष्ट सर्ग)
इस काव्य के नायक अष्टावक्र अपने शरीर के आठों अंगों से विकलांग हैं। महाकाव्य अष्टावक्र ऋषि की संकट से लेकर सफलता से होते हुए धन्यता तक की यात्रा प्रस्तुत करता है। महाकवि स्वयं दो मास की अल्पायु से प्रज्ञाचक्षु हैं, और उनके अनुसार इस महाकाव्य में विकलांगों की समस्त समस्याओं के समाधान सूत्र इस महाकाव्य में प्रस्तुत हैं। उनके अनुसार महाकाव्य के आठ सर्गों में विकलांगों की आठ मनोवृत्तियों के विश्लेषण हैं।<ref name="ashtavakra_purovak">रामभद्राचार्य २०१०, पृष्ठ क-ग।</ref>
 
==कथावस्तु==
 
===आठ सर्ग===
 
# '''सम्भव'''
# '''संक्रान्ति'''
# '''समस्या'''
# '''संकट'''
# '''संकल्प'''
# '''साधना'''
# '''सम्भावना'''
# '''समाधान'''
 
==टिप्पणियाँ==
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