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तिब्बत से हिमाली मार्ग का नियन्त्रण के लिए हुवा बिबाद और उस पश्चात का युद्ध मे [[चीन]] तिब्बत के सहायता के लिए आनेके बाद नेपाल पिछे हट गया। नेपाल का सीमा नजदिक का छोटा-छोटा राज्यौं को हडप्ने के कारण से शुरु हुवा [[ब्रिटिस इस्ट इण्डिया कम्पनि]]के साथ दुश्मनीका कारण लेकिन रक्तरंजित [[एङ्गलो-नेपाल युद्ध (१८१४–१६)]] ( हो गया, जिसमे नेपाल अपनी दो तिहाई भूभाग खो दिया लेकिन अपनी सार्वभौमसत्ता और स्वतन्त्रता कायम रखा। भारत वर्ष मै यही एक खण्ड है जो कभी भी कोही बाहरी सामन्तौं के अधीन मै नही आया। बेलायत बेलायत से लड्ने पस्चिममे सतलज से पुर्वमे टिष्टा नदी तक फैला हुवा [[बिशाल नेपाल]] सुगौली सन्धीके बाद पस्चिममे माहाकाली और मेची नदीयों के बिच सिमट गया लेकीन अपनी स्वाधिनतको बचाए रखना नेपाल सफल राहा, बाद मे अंग्रेजोने १८२२ मे मेची नदी व राप्तीनदी के बिचका तराइ का हिस्सा नेपालको वापस किया उसी तरह १८६० मे राणा प्रधानमन्त्री जंगवाहदुर से खुसहोकर अंग्रेजोने राप्तीनदी से माहाकाली नदी के विचका तराईका थोडा और हिस्सा नेपालको लौटाया ।लेकिन सुगौली सन्धीके बाद नेपाल ने बहुत बडा जमिनका हिस्सा गँवा दिया यह क्षेत्र अभी [[उत्तराञ्चल]] राज्य और [[हिमाञ्चल प्रदेश]] और पञ्जाबी पहाडी राज्य मै सम्मिलित है। पूर्व मै [[दार्जीलिङ]] और उसके आसपासका नेपाली मूल के लोगों का भूमि (जो अब पश्चिम बंगाल मे है) भी ब्रिटिस इन्डिया के अधीन मे हो गया तथा नेपाल का[[सिक्किम]] के उपरका प्रभाव और शक्ति भी नेपाल को त्यागना पडा।
 
[[राज परिवार]] व भारदारोके विच गुटबन्दिकि बजहसे युद्धके बाद अस्थायित्व कायम हुवा। शन् १८४६मा शासन कररही रानीकी सेनानायक [[जङ्गबहादुर राणा]]को पदच्युत करने षडयन्त्रकी खुलासा होनेसे [[कोतपर्व]] नामका नरसंहार हुवा। हतियारधारी सेना व रानीकेप्रति वफादार भाइ-भारदाररोकेविच मारकाट चलनेसे देशके सयौँ राजखलाक, भारदारलोग व दुसरे रजवाडो का हत्याहुवा। जङ्गबहादुरकी जितके बाद [[राणा खानदान]] उन्होने सुरुकिया व [[राणा शासन]] लागु किया। राजाको नाममात्रमे सिमित किया व प्रधानमन्त्री पदको सक्तिशाली वंशानुगत किया गया। राणाशासक पूर्णनिष्ठाके साथ ब्रिटिसके पक्षमे रहतेथे व ब्रिटिसशासकको १८५७की [[सेपोई रेबेल्योन]] (प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम), व बादमे दोनो [[विश्व युद्ध]]सहयोग कियाथा। शन् १९२३मे [[संयुक्त अधिराज्य]] व नेपाल विच आधिकारिक रुपमे मित्रताकी सम्झौतामे हस्ताक्षर हुवा, जिसमे नेपलकी स्वतन्त्रताको संयुक्त अधिराज्यने स्विकार किया । व साउदथ एसियाइ मुलुक का पहला नेपाली राजदुतावास ब्रिटेनकी राजधानी लंडनमे खुलगया ।
 
१९४० दशककी उत्तरार्धमे लोकतन्त्र-समर्थित आन्दोलनोकी उदय होनेलगा व राजनैतिक पार्टियां राणा शासनके बिरुद्धमे होगए। उसीसमय चीन १९५०मे तिब्बत कब्जा किया जिसकी बजहसे बढ्ती हुइ सैनिक गतिविधि को टाल्नेके लिए भारत नेपालकी स्थायित्व पर चाख बढ्ने लगा । फलस्वरुप राजा [[त्रिभूवन]]को भारतने समर्थन किया १९५१ मा शत्ता लेनेमे सहयोग किया, नयाँ सरकार निर्माण होगया, जिसमा जादा आन्दोलनकारी [[नेपाली कङ्ग्रेस पार्टि]]के लोगोकी सहभगिता थि। राजा व सरकारके विच वर्षौँकी शक्ति खिचातानिके पश्चात, १९५९मे [[राजा महेन्द्र]]ने लोकतान्त्रिक अभ्याँस अन्त्य किया व "निर्दलिय" [[पञ्चायत]] व्यवस्था लागु करके राज किया। शन् १९८९की "जनआन्दोलन"ने राजतन्त्रको संबैधानिक सुधार करने व बहुदलिय संसद बनाने का वातवरणा बनगया सन १९९०मा [[कृष्णप्रशाद भट्टराई]] अन्तरिम सरकारके प्रधानमन्त्री बनगए, नयाँ संविधानका निर्माण हुवा [[राजा बीरेन्द्र]] ने १९९० मे नेपालके इतिहासमे दुसरा प्रजातन्त्रीक बहुदलीय संबिधान जारी किया <ref name=Nepal_Timeline>{{cite web | title= Timeline: Nepal | work=[[BBC News]] | url=http://news.bbc.co.uk/1/hi/world/south_asia/country_profiles/1166516.stm| accessmonthday=September 29 | accessyear=2005 }}</ref> व अन्तरीम सरकारने संसदका लिए प्रजातन्त्रीक चुनाव करवाया। नेपाली कङ्ग्रेसलने राष्ट्रकी दुसरी प्रजातन्त्रीक चुनावमे बहुमत ल्यायी व [[गिरिजाप्रशाद कोइराला]] प्रधानमन्त्री बने।
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