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'''''भृङ्गदूतम्''''' ([[2004]]), वस्तुतः ''भौंरा दूत'', [[जगद्गुरु रामभद्राचार्य]] ([[1950]]-) द्वारा रचित दूतकाव्य शैली की [[संस्कृत]] खण्ढकाव्यखण्डकाव्य है। काव्य में दो भागों में विभाजित मन्दक्रान्ता छंद के 501५०१ श्लोक है। [[रामायण]] के [[किष्किन्धाकाण्ढकिष्किन्धाकाण्ड]] केमें संदर्भवर्षा ऋतु में निर्धारित, कविता किष्किन्धा में स्थित प्रवर्षण पहाड़पर्वत पर बरसातचार केमहीने मौसमबिताते काहुए चार[[राम]] महीनेद्वारा बिताकर[[लंका]] राममें [[रावण]] द्वारा बंदी बनाई गई [[सीता]] को एक भौंराभौंरे के माध्यम से भेजाभेजे गए संदेश का वर्णन करती है, जो की [[लंका]] में [[रावण]] द्वारा बंदी हुई है।
 
कविता की एक प्रतिलिपि, स्वयं कवि द्वारा स्वयंमेवरचित "गुञ्जन" नामक हिन्दी टिप्पणीटीका के साथ, [[जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय]], [[चित्रकूट]], [[उत्तर प्रदेश]] द्वारा प्रकाशित की गई थी। पुस्तक 30३० अगस्त, 2004२००४ को रिलीज़विमोचित की गई थी।<ref>रामभद्राचार्य 2004</ref>
 
==सन्दर्भ==
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