"निघंटु" के अवतरणों में अंतर

229 बैट्स् जोड़े गए ,  9 वर्ष पहले
निघंटु के पाँच अध्याय हैं। प्रारंभ के तीन अध्यायों में "नैघंटुक" शब्दों का संग्रह है। चतुर्थ अध्याय में "नैगम" शब्द और पंचम अध्याय में "दैवत" शब्द एकत्रित किए गए हैं। प्रत्येक अध्याय में विभागद्योतक खंड हैं। पहले तीन अध्यायों में सजातीय शब्दों का चयन किया गया है। यह नियम चतुर्थ और पंचम अध्यायों में नहीं है।
 
===प्रथम अध्याय===
'''प्रथम अध्याय''' के खंडों में नाम और धातु इस प्रकार हैं : 1. पृथ्वी के 21, 2. हिरण्य के 15, 3. अंतरिक्ष के 16, 4. दिव् और आदित्य के समान छह 5. रश्मि के 15, 6. दिशा के 8 7. रात्रि के 23, 8. उषा के 16, 9. अह: (दिन) के 13,10. मेघ के 30, 11. वाक् के 57, 12. उदक के 100, 13. नदी के 37; 14. अश्व के 26, 15. विशिष्ट अश्व के 10, 6 सुख के 20, 7 रूप के 16, 8 प्रशंस्य (प्रशंसनीय) के दस, 9 प्रज्ञा के 11, 10 सत्य के छह, 11 पश्य (देखना) धातु के आठ, 12 समस्त पदसंग्रहार्थ नौ, 13 उपमा वाचक 12, 14 अर्च (पूर्जार्थक) धातु के 44, 15 मेधावी के 24, 16 स्तोता के 13, 17. यज्ञ के 15, 18. ऋत्विक के आठ, 19. यांचा (मांगना) धातु के 17, 20. दान धातु के दस, 21. परिस्रव (विनम्र प्रार्थना) धातु के चार, 22. स्वप (सोना) धातु के दो, 23. कूप के 14, 24. स्तेन (चोर) के 14, 25. विर्णीत और अंतर्हित के छ:, 26. दूर के पाँच, 27 पुराण (प्राचीनी) के छ, 28 नव (नवीन) के छ, 29. दो दो करके अर्थवाले 26, और 30 वें खंड में द्यावापृथिवी के 24 ना कहे हैं। उपर्युक्त अध्यायों में पर्यायवाचक शब्दों का संग्रह किया है। यहाँ नैघंटुक कांड समाप्त होता है। इस अध्याय में पदसंख्या 410 है। पूरे नैघंटुक कांड के पदों की संख्या 1340 है।
'''द्वितीयप्रथम अध्याय''' के खंडों में नाम और धातु निम्नांकितइस रूपप्रकार मेंहैं हैं।:
 
1. पृथ्वी के 21,
'''द्वितीय अध्याय''' के खंडों में नाम और धातु निम्नांकित रूप में हैं।
 
2. हिरण्य के 15,
 
3. अंतरिक्ष के 16,
 
4. दिव् और आदित्य के समान छह
 
5. रश्मि के 15,
 
6. दिशा के 8
 
7. रात्रि के 23,
 
8. उषा के 16,
 
9. अह: (दिन) के 13,
 
10. मेघ के 30,
 
11. वाक् के 57,
 
12. उदक के 100,
 
13. नदी के 37,
 
14. अश्व के 26,
 
15. विशिष्ट अश्व के 10,
 
6 सुख के 20,
 
7 रूप के 16,
 
8 प्रशंस्य (प्रशंसनीय) के दस,
 
9 प्रज्ञा के 11,
 
10 सत्य के छह,
 
11 पश्य (देखना) धातु के आठ,
 
12 समस्त पदसंग्रहार्थ नौ,
 
13 उपमा वाचक 12,
 
14 अर्च (पूर्जार्थक) धातु के 44,
 
15 मेधावी के 24,
 
16 स्तोता के 13,
 
17. यज्ञ के 15,
 
18. ऋत्विक के आठ,
 
19. यांचा (मांगना) धातु के 17,
 
20. दान धातु के दस,
 
21. परिस्रव (विनम्र प्रार्थना) धातु के चार,
 
22. स्वप (सोना) धातु के दो,
 
23. कूप के 14,
 
24. स्तेन (चोर) के 14,
 
25. विर्णीत और अंतर्हित के छ:,
 
26. दूर के पाँच,
 
27 पुराण (प्राचीन) के छ,
 
28 नव (नवीन) के छ,
 
29. दो दो करके अर्थवाले 26, और
 
30 वें खंड में द्यावापृथिवी के 24 ना कहे हैं।
 
उपर्युक्त अध्यायों में पर्यायवाचक शब्दों का संग्रह किया है। यहाँ नैघंटुक कांड समाप्त होता है। इस अध्याय में पदसंख्या 410 है। पूरे नैघंटुक कांड के पदों की संख्या 1340 है।
 
===द्वितीय अध्याय===
द्वितीय अध्याय के खंडों में नाम और धातु निम्नांकित रूप में हैं।
1. कर्म के 26,
 
इस अध्याय के पदों की संख्या 516 है।
 
'''===तृतीय अध्याय''' के खंडों में नाम और धातु इस प्रकार हैं : ===
तृतीय अध्याय के खंडों में नाम और धातु इस प्रकार हैं :
 
1. बहु (अधिक) के 12,
इन शब्दों के प्रकृति प्रत्यय ज्ञान के पदों की संख्या 279 है।
 
===चतुर्थ अध्याय===
'''चतुर्थ अध्याय''' को 'नैगम कांड' कहा है। इस अध्याय में एक शब्द अनेकार्थ वाचक है। 16 ज्वल् धातु के 11 और 17 ज्वलन के 11 नाम कहे है। इस अध्याय में पदसंख्या 414 है।
 
===पंचम अध्याय===
'''पंचम अध्याय''' में मुख्य रूप से देवताओं का वर्णन है। इसे दैवतकांड कहते हैं। इसमें छह खंड हैं। इन खंडों में क्रमश: 3, 13, 36, 32, और 31 पद हैं। ये सभी पद देवतावाचक हैं। इस अध्याय की पदसंख्या 151 है।
 
पाँचों अध्यायों के पदों की संख्या का योग 1770 होता है। प्रत्येक अध्याय के अंत में खडों के प्रारंभिक शब्दों का संकलन किया है। इस निघंटु पर यास्क रचित निर्वचन है, जिसका नाम '''[[निरुक्त]]''' है।