"ऍक्स किरण" के अवतरणों में अंतर

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==एक्सरे उत्पादन के उपकरण==
{{मुख्य|एक्स किरण नलिका}}
 
==एक्सरे के गुण==
ऊर्जा या तो कणों के साथ अथवा तरंगों के साथ संयुक्त रहती है। किसी उद्गम से ऊर्जा का विसर्जन होता हो तो इस ऊर्जा का अस्तित्व साधारणत: विद्युच्चंबुकीय तरंगों की (ध्वनि के लिए वायु के तरंगों की) तीव्रता में, अथवा इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान, आयन इत्यादि कणों की गतिज ऊर्जा के रूप में, व्यक्त होता है। तरंग और कण के स्वरूप भिन्न होते हैं; इसलिए इनको साधारणत: भिन्न वर्गो में रखा जाता है। किंतु अनेक प्रयोगों के फलों से यह स्पष्ट हो गया है कि इन वर्गों का बंधन तरंगों में कणों के गुण हैं और, विलोमत: कणों में भी तरंगों के गुण हैं। इस द्वैत रूप का प्रारंभ प्लांक के उष्माविकिरण के सिद्धांत से प्रारंभ हुआ। एक्सरे के गुण भी इस द्वैत रूप के अपवाद नहीं हैं। एक्सरे के कतिपय गुण तरंगों के हैं तथा कतिपय गुण कणों के भी हैं। पहले हम तरंगीय गुणों पर विचार करेंगे।
 
प्रारंभिक प्रयोगों के फलों से यह स्पष्ट था कि एक्सरे और प्रकाश के गुणों में साम्य है। एक्सरे तथा प्रकाश की किरणों का दिक्‌ (स्पेस) में सरल रेखाओं में प्रचारण होता है। प्रकाश के समान एक्सरे की तीव्रता भी दूरी के वर्ग की प्रतिलोमानुपाती होती है। फोटो पट्टिका पर होनेवाली क्रिया तथा गैस में किए गए आयनीकरण के गुणों में भी दोनों में साम्य है। 1905 ई. में माक्स ने प्रयोग द्वारा यह प्रमाणित किया कि एक्सरे का वेग प्रकाश का वेग के समान–अर्थात 3×10° सें.मी.प्रति सेंकड–है। वैद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्रों में एक्सरे (प्रकाश के समान) अप्रभावित रहते हैं। इन सब गुणों से यह स्पष्ट था कि एक्सरे आवेशित कण नहीं, प्रकाश के समान विद्युच्चुंबकीय प्रकृति के हैं। भेद केवल तरंगदैर्घ्यो में हो सकता है। हागा, विंड्ट, वाल्टेर, पोल, सोमरफ़ेल्ड इत्यादि वैज्ञानिकों के प्रयोगों से यह अनुमान किया जा सकता था कि एक्सरे का तरंगदैर्घ्य 1×10-8 से.मी. के निकट है। किंतु प्रथम निर्णयात्मक फल लावे, फ्रीडरिश तथा क्निपिंग के प्रयोगों से प्राप्त हुआ और एक्सरे की तरंगदैर्घ्य प्रमाणित हुई। इस प्रयोग के पश्चात्‌ एक्सरे की तरंगप्रकृति सुस्पष्ट करने के तथा उसके संबंध में अन्य परिणामों के प्रायोगिक फल प्राप्त करने के तथा उसके संबंध में अन्य परिमाणों के प्रायोगिक फल प्राप्त करने के अनेक प्रयत्न हुए। एक्सरे का तरंगदैर्घ्य प्रकाश के तरंगदैर्घ्य से बहुत कम (प्राय: एक सहस्रांश्) होने के कारण जिन प्रयोगों द्वारा प्रकाश का तरंगदैर्घ्य सरलता से मापा जा सकता है, वैसे प्रयोग एक्सरे के लिए करने में अनेक कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैं। किंतु वर्तमान काल में प्रकाशको के प्रयोगों के समान एक्सरे का व्यतिकरण (इंटरफ़ियरेंस), विवर्तन (डफ्ऱैिक्शन), ध्रुवण (पोलैराइज़ेशन) इत्यादि गुण सुस्पष्ट करने के प्रयोग सफल हुए हैं और एक्सरे के तरंगदैर्घ्य उतनी ही यर्थाथता से ज्ञात हुए हैं जितनी से प्रकाशीय तरंगों के ज्ञात हुए थे। जिन प्रयोगों से एक्सरे की तरंगप्रकृति प्रमाणित होती है उनमें से कुछ नीचे दिए जा रहे हैं-
 
===एक्सरे का व्यतिकरण===
{{मुख्य|एक्स किरण व्यतिकरण}}
 
===एक्सरे का अपवर्तन===
{{मुख्य|एक्स किरण अपवर्तन}}
 
===एक्सरे का विवर्तन===
{{मुख्य|एक्स किरण विवर्तन}}
 
==एक्सरे का वर्णक्रम और परमाणुओं की संरचना==
 
===एक्सरे और मणिभ===
एक्सरे से मणिभ संरचना जानने में विशेष सहायता मिलती है (देखें, [[एक्सरे और मणिभ संरचना]])।
 
===एक्सरे के अन्य उपयोग===
एक्सरे के विशिष्ट गुणों के कारण उनका उपयोग विस्तृत रूप से विज्ञान की अनेक शाखाओं तथा विभिन्न उद्योगों में होता आ रहा है। उद्योगों में, विशेषत: निर्माण तथा निर्मित पदार्थो के गुणों के नियंत्रण में, एक्सरे का बहुत उपयोग होता है। निर्मित पदार्थो की अंतस्य त्रुटियाँ एक्सरे फोटोग्राफों द्वारा सरलता से ज्ञात की जा सकती हैं। विमान तथा उसी प्रकार के साधनों के यंत्रों में अति तीव्र वेग तथा चरम भौतिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता हैं; ऐसे यंत्रों के निर्माण में प्रत्येक अवयव अंतर्बाह्य निर्दोष तथा यथार्थ होना चाहिए। ऐसे प्रत्येक अवयव की परीक्षा एक्सरे से की जाती है और सदोष अवयवों का त्याग किया जाता है। धातु एक्सरे का अवशोषण करते हैं, अत: धातुओं के अंतर्भागों की परीक्षा के लिए मृदु एक्सरे अनुपयुक्त होते हैं। विशाल आकार के धात्वीय पदार्थो के लिए अत्युच्च विभव के एक्सरे की आवश्यकता होती है।
 
[[धातु विज्ञान]] तथा धातुगवेषणा में एक्सरे अत्यंत उपयोगी हैं। धातु भी मणिभीय होते हैं, किंतु इनके मणिभ सूक्ष्म होते हैं और वे यथेच्छ प्रकार से स्थापित रहते हैं, अत: धातुओं की लावे-प्रतिमा में सामान्यत: संकेंद्र वर्तुल रहते हैं। प्रत्येक वर्तुल एक समान तीव्रता का होता है, किंतु किसी भौतिक क्रिया से कणों के आकारों में वृद्धि हो जाने पर इन वर्तुलों में बिंदु भी आते हैं। अत: एक्सरे व्याभंग द्वारा इसका ठीक ठीक पता चल जाता है कि धात्वीय मणिभों के कण किस प्रकार के हैं और उनका आकार आदि कैसा है। इस ज्ञान का धातुविज्ञान में अत्यंत महत्व है। धातु के पदार्थ बनाने के समय उष्मा के कारण उनमें अंतर्विकृति आ जाती है। धातु को मोड़ने से भी उसमें अंतर्विकृति हो जाती है। ऐसी विकृतियों का विश्लेषण एक्सरे से हो सकता है। इस प्रकार विशिष्ट गुणों से युक्त निर्दोष धातु प्राप्त करने में एक्सरे का विशेष उपयोग होता है।
 
एक्सरे के अन्य उपयोगों में एक्सरे सूक्ष्मदर्शी उल्लेखनीय है। एक्सरे के तरंगदैर्घ्य प्रकाश के तरंगदैर्घ्यो से सूक्ष्म होते हैं, अत: एक्सरे सूक्ष्मदर्शी को प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से अधिक प्रभावशाली होना चाहिए। 1948 में एक्सरे को केंद्रित करने के कर्कपैट्रिक के प्रयत्न अंशत: सफल हुए। इस रीति से तथा अन्य रीतियों से प्रतिबिंब का आवर्धन करने के प्रयत्न अब प्रायोगिक अवस्था पार कर चुके हैं और अनेक निर्माताओं द्वारा निर्मित कई प्रकार के एक्सरे सूक्ष्मदर्शी सुलभ हैं।
 
प्रकाश सूक्ष्मदर्शी से जिन बातों का पता नहीं चल पाता उनका ज्ञान सरलतापूर्वक एक्सरे सूक्ष्मदर्शी से हो जाता है।
 
==संदर्भ ग्रंथ==
* ए. एच. कॉम्पटन तथा एलीसन : एक्सरे इन्‌ थ्योरी ऐंड एक्स्पेरिमेंट (डी. ह्वान नोस्ट्रांग कंपनी, न्यूयॉर्क, 1935); * स्प्राऊल : एक्सरेज़ इन प्रैक्टिस (मैक्‌-ग्रॉ हिल कंपनी, न्यूयार्क, 1946);
* जॉर्ज एल. क्लार्क : ऐप्लाएड एक्सरेज़ (मैक-ग्रॉ हिल कंपनी, न्यूयार्क, 1955);
* ए. लिखती तथा डब्ल्यू. मिंडर : रंटजन फिज़ीक (स्प्रिंगर-फरलाग, विएना, 1955);
* रंटजन स्ट्राहलेन; (हैंडबुक डेर फिज़ीक, 30 भाग, स्प्रिंगर फरलाग, बर्लिन, 1957)
 
==संदर्भ==