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'''दक्ष प्रजापति''' को अन्य प्रजापतियों के समान [[ब्रह्मा]] जी ने अपने मानस पुत्र के रूप में रचा था। दक्ष प्रजापति का विवाह [[स्वयंभुव मनु]] की तृतीय कन्या [[प्रसूति]] के साथ हुआ था। दक्ष प्रजापति की पत्नी [[प्रसूति]] ने सोलह कन्याओं को जन्म दिया जिनमें से स्वाहा नामक एक कन्या का [[अग्नि]] का साथ, सुधा नामक एक कन्या का पितृगण के साथ, [[सती]] नामक एक कन्या का भगवान शंकर के साथ, और शेष तेरह कन्याओं का [[धर्म]] के साथ विवाह हुआ। धर्म की पत्नियों के नाम थे - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, द्वी और मूर्ति।
 
दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें द्वेषवश उन्होंने अपने जामाता भगवान [[शंकर]] और अपनी पुत्री [[सती]] को निमन्त्रित नहीं किया। [[शंकर]] जी के समझाने के बाद भी [[सती]] अपने पिता उस यज्ञ बिना बुलाये ही चली गईं। यज्ञस्थल में दक्ष प्रजापति ने [[सती]] और [[शंकर]] जी का घोर निरादर किया। अपमान न सह पाने के कारण [[सती]] ने तत्काल यज्ञस्थल में ही योगाग्नि से स्वयं को भस्म कर दिया। [[सती]] की मृत्यु का समाचार पाकर भगवान [[शंकर]] ने [[वीरभद्र]] के द्वारा उस यज्ञ का विध्वंश करा दिया। [[वीरभद्र]] ने दक्ष प्रजापति का सिर भी काट डाला। बाद में [[ब्रह्मा]] जी की प्रार्थना करने पर भगवान [[शंकर]] ने दक्ष प्रजापति को उसके सिर के बदले में बकरे का सिर प्रदान कर उसके यज्ञ को सम्पन्न करवाया।