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==इतिहास==
 
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राधा-श्याम गोप और गोपियो की होली]]
होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका<ref>{{cite book |last=आप्टे |first= वामन शिवराम|title= संस्कृत हिन्दी कोश|year= 1969 |publisher= मोतीलाल बनारसीदास|location= दिल्ली, पटना, वाराणसी भारत|id= |page= ११८१|editor: वामन शिवराम आप्टे|accessday= 3|accessmonth=मार्च| accessyear=2008}}</ref> नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे [[वसंतोत्सव]] और काम-महोत्सव भी कहा गया है।
 
 
इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। [[विजयनगर]] की राजधानी [[हंपी]] के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की [[अहमदनगर]] की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की [[मेवाड़]] की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। [[बूंदी जिला|बूंदी]] से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।<ref name="history">{{cite web |url=http://www.holifestival.org/history-of-holi.html|title= History of Holi|accessmonthday=[[3 मार्च]]|accessyear=[[2008]]|format= एचटीएमएल|publisher= होलीफेस्टिवल.ऑर्ग|language=अँग्रेज़ी}}</ref>
[[चित्र:Holi2.jpg|thumb|right|280px|
राधा-श्याम गोप और गोपियो की होली]]
 
==कहानियाँ==
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