"हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन" के अवतरणों में अंतर

इन दोनों नेताओं के गिरफ्तार हो जाने से 'बिस्मिल' के कन्धों पर पूरी पार्टी का उत्तरदायित्व आ गया। पार्टी के कार्य हेतु धन की आवश्यकता तो पहले से ही थी किन्तु अब और बढ गयी थी। कहीं से भी धन प्राप्त होता न देख ७ मार्च १९२५ को [[बिचपुरी]] तथा २४ मई १९२५ को द्वारकापुर में दो डकैतियाँ डालीं परन्तु उनमें कुछ विशेष धन हाथ न आया। उल्टे इन दोनों डकैतियों में एक-एक व्यक्ति भी मौके पर मारा गया। इससे बिस्मिल को अपार कष्ट हुआ। आखिरकार उन्होंने यह निश्चय किया कि अब केवल सरकारी खजाना ही लूटेंगे और मियाँ की जूती निकालकर मियाँ की ही चाँद पर ठोंकेंगे।
 
अन्ततोगत्वा [[शाहजहाँपुर]] में बिस्मिल के घर पर हुई एक आपातकालीन बैठक में अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनी। इस योजनानुसार ९ अगस्त १९२५ को [[लखनऊ]] जिले के [[काकोरी]] रेलवे स्टेशन के आगे '''आठ डाउन [[सहारनपुर]]-[[लखनऊ]] पैसेन्जर ट्रेन''' को चेन खींच कर रोक लिया और उसमें रखा हुआ सरकारी खजाना लूट कर सभी दस के दस क्रान्तिकारी एक के साथ एक कदम मिलाते हुए नौ दो ग्यारह हो गये। अंग्रेज सरकार ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन के कुल ४० क्रान्तिकारियों को पूरे हिन्दुस्तान में स्थान-स्थान पर छापा मारकर गिरफ्तार किया और उन सबको लखनऊ लाकर [[काकोरी काण्ड]] को साजिश करार दिया और राम प्रसाद 'बिस्मिल' व अन्य सभी एच०आर०ए० सदस्यों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया। अठारह महीने तक चले इस ऐतिहासिक मुकदमें में [[राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी]], पण्डित [[राम प्रसाद बिस्मिल]], [[अशफाक उल्ला खाँ]] तथा ठाकुर [[रोशन सिंह]] को [[फाँसी]] सजा दी गयी जबकि १६ अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम ४ वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम आजीवन कारावास तक का दण्ड दिया गया। सभी प्रमुख क्रान्तिकारियों पर एक साथ हुए इस वज्राघात ने ऐसोसिएशन को तहस-नहस कर दिया।
 
इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने झूठी-सच्ची गवाहियाँ इकट्ठी की और एक सोची समझी रणनीति के तहत दल के सरगना पण्डित राम प्रसाद 'बिस्मिल' व अन्य सभी एच०आर०ए० सदस्यों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया। लगभग अठारह महीने तक चले इस ऐतिहासिक मुकदमें में [[राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी]], पण्डित [[राम प्रसाद बिस्मिल]], [[अशफाक उल्ला खाँ]] तथा ठाकुर [[रोशन सिंह]] को [[फाँसी]] सजा दी गयी जबकि १६ अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम ४ वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम आजीवन कारावास तक का दण्ड दिया गया। सभी प्रमुख क्रान्तिकारियों पर एक साथ हुए इस वज्राघात ने ऐसोसिएशन को तहस-नहस कर दिया।
 
==सन्दर्भ==
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