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==परिचय==
साधारण व्यक्ति को यीस्ट से वस्तु का बोध होता हैं कि जिसे बनाने वाले गूँधे [[आटा|आटे]] में डालकर, उसे उठने और स्पंजी बनाने के लिये छोड़ देते हैं । ऐसे स्पंजी आटें ही स्पंजी पावरोटी बनती हैं । ऐसे यीस्ट साधारणतया टिकिये के रूप में बाजारों में बिकतें हैं । ऐसे यीस्ट से बड़े सूक्ष्म एककोशिक पादप रहते हैं । ये ही वास्तविक यीस्ट, या सैकैरोमाइसीजसाक्खारोमीकेस् (saccharomyces ), है । यीस्ट वस्तुत: एक वर्ग का पादप हैं । यह कवकों (fungus) से समानता रखता हैं ।
 
यीस्ट वायु में सर्वत्र प्रचुरता से पाया जाता हैं । यह उष्णता, आर्द्रता और आहार के अभाव में जीवित रह सकता हैं और इसकी कार्यशीलता बनी रहती हैं । पर 100 डिग्री से0 पर आर्द्र ऊष्मा से यह नष्ट हो जाता हें । यह किणवन उत्पन्न करता हैं । इसी से इसका व्यवहार पावरोटी, सुरा या बीअर आदि बनाने में हजारों वर्षां से चला आ रहा हें, यद्यिप ऐसा होने के कारण का पता पहले पहल कगनार्ड डेलातूर (1771- 1857 ई0 ) ने ही लगाया था । उन्होंनें ही सिद्ध किया था कि यीस्ट सजीव पादप हैं, जो मुकुलन (buddinng) प्रक्रिया से बढ़ता हैं । कार्बनिक पदार्थो, विशेषत: स्टार्च और शर्कराओं में, यीस्ट से किणवन होता हैं । यीस्ट कोशिकाओं की वृद्धि के साथ साथ उनसे एंजाइम बनते हैं । ये एजाइम डायास्टेस, इंवर्टेंस (Æinvertase) और जाइमेस (zymase) हैं । डायास्टेस स्टार्च को विघटित करता, इनवर्टेस ईक्षुशर्करा को ग्लूकोस और फ्रुक्टोस में परिणत करता और जाइमेस ग्लुकोस और फ्रक्टोस शर्कराओं को ऐल्कोहॉल और कार्बन डाइऑक्साइड में परिणत करता हैं । ये सब प्रक्रियाएँ उपयुक्त अवस्था ( उपयुक्त [[आर्द्रता]] और [[ताप]] ) में संपन्न होती हैं । किणवन का उपयुक्त ताप 25 डिग्री - 30 डिग्री सें0 हैं ।
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