"भारत छोड़ो आन्दोलन और बिहार" के अवतरणों में अंतर

सम्पादन सारांश रहित
सियाराम-ब्रह्मचारी दल- बिहार में गुप्त क्रान्तिकारी आन्दोलन का नेतृत्व सियाराम-ब्रह्मचारी दल ने स्थापित किया था । इसके क्रान्तिकारी दल के कार्यक्रम की चार बातें मुख्य थीं- धन संचय, शस्त्र संचय, शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण तथा सरकार का प्रतिरोध करने के लिए जनसंगठन बनाना । सियाराम-ब्रह्मचारी दल का प्रभाव भागलपुर, मुंगेर, किशनगंज, बलिया, सुल्तानगंज, पूर्णिया आदि जिलों में था । सियाराम सिंह सुल्तानगंज के तिलकपुर गांव के निवासी थी और ब्रह्मचारी थाना बिहपुर के नन्ह्कार गांव के रहने वाले , इन्ही दोनों के नाम पर क्रांतिकारी दस्ते का नामकरण हुआ | क्रान्तिकारी आन्दोलन में हिंसा और पुलिस दमन के अनगिनत उदाहरण मिलते हैं ।
 
तारापुर गोलीकांड :- मुंगेर जिले के तारापुर थाना में तिरंगा फहराते हुए 60 क्रांतिकारी शहीद हुए थे :-| 15 फरवरी 1932 की दोपहर सैकड़ों आजादी के दीवाने मुंगेर जिला के तारापुर थाने पर तिरंगा लहराने निकल पड़े | उन अमर सेनानियों ने हाथों में राष्ट्रीय झंडा और होठों पर वंदे मातरम ,भारत माता की जय नारों की गूंज लिए हँसते-हँसते गोलियाँ खाई थी | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े गोलीकांड में देशभक्त पहले से लाठी-गोली खाने को तैयार हो कर घर से निकले थे | 50 से अधिक सपूतों की शहादत के बाद स्थानीय थाना भवन पर तिरंगा लहराया |
आजादी मिलने के बाद से हर साल 15 फरवरी को स्थानीय जागरूक नागरिकों के द्वारा तारापुर दिवस मनाया जाता है। जालियावाला बाग से भी बड़ी घटना थी तारापुर गोलीकांड । सैकड़ों लोगों ने धावक दल को अंग्रेजों के थाने पर झंडा फहराने का जिम्मा दिया था। और उनका मनोबल बढ़ाने के लिए जनता खड़ी होकर भारतमाता की जय, वंदे मातरम्.आदि का जयघोष कर रहे थे । भारत माँ के वीर बेटों के ऊपर अंग्रेजों के कलक्टर ई ओली एवं एसपी डब्ल्यू फ्लैग के नेतृत्व में गोलियां दागी गयी थी । गोली चल रही थी लेकिन कोई भाग नहीं रहा था । लोग डटे हुए थे | इस गोलीकांड के बाद कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर हर साल देश में 15 फरवरी को तारापुर दिवस मनाने का निर्णय लिया था।
घटना के बाद अंग्रेजों ने शहीदों का शव वाहनों में लाद कर सुलतानगंज की गंगा नदी में बहा दिया था । शहीद सपूतों में से केवल 13 की ही पहचान हो पाई थी । ज्ञात शहीदों में विश्वनाथ सिंह (छत्रहार), महिपाल सिंह (रामचुआ), शीतल (असरगंज), सुकुल सोनार (तारापुर), संता पासी (तारापुर), झोंटी झा (सतखरिया), सिंहेश्वर राजहंस (बिहमा), बदरी मंडल (धनपुरा), वसंत धानुक (लौढि़या), रामेश्वर मंडल (पड़भाड़ा), गैबी सिंह (महेशपुर), अशर्फी मंडल (कष्टीकरी) तथा चंडी महतो (चोरगांव) थे । 31 अज्ञात शव भी मिले थे, जिनकी पहचान नहीं हो पायी थी । और कुछ शव तो गंगा की गोद में समा गए थे |
बेनामी उपयोगकर्ता