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हिंदी भाषा और नागरी अक्षरों में पहला कोश पादरी एम. टी. एडम ने तैयार किया जो 1829 ई. में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ। उसके बाद ऐसे अनेक कोश प्रस्तुत हुए जिनमें हिंदी शब्दों के अर्थ अंगरेजी में अथवा अँगरेजी शब्दों के अर्थ हिंदी में होते थे। ऐसे कोश प्रस्तुत करने वालों में एम. डब्ल्यू. फैलन, जे. टी. प्लाट्स, और जे. डी. वेट के नाम विशेष उल्लेखनीय है। मुंशी राधेलाल पहले भारतीय थे जिन्होंने 1873 ई. में कोश प्रस्तुत किया। 1880 ई. में सैयद जामिल अली जलाल का गुलशने फैज नामक कोश प्रकाशित हुआ जो फारसी लिपि में था पर उसमें अधिकांश शब्द हिंदी के थे। 1892 ई. में बांकीपुर (पटना) से बाबा बैजूदास का विवेक कोश निकला। तदुपरांत हिंदी के छोटे छोटे अनेक कोश निकले।
 
====[[हिन्दी शब्दसागर]]====
इस शती के आरंभ में [[काशी नागरीप्रचारिणी सभा]] ने हिंदी के ऐसे कोश के प्रकाशन की आवश्यकता का अनुभव किया जिसमे हिंदी के पुराने पद्य और नए गद्य दोनों में व्यवहृत होने वाले समस्त शब्दों का समावेश हो और 1904 में वह इस ओर अग्रसर हुई तथा उसने दस खंडों में हिंदी शब्दसागर नाम से बृहत् कोश प्रकाशित किया। पूर्ववर्ती अधिकांश कोशों की भाँति यह कोश किसी एक व्यक्ति द्वारा निर्मित न होकर भाषा और साहित्य के मर्मज्ञ अनेक सुधीजनों द्वारा तैयार किया गया था। इसमें ग्रंथों और व्यवहारप्रयुक्त भाषा और बोलियों के प्राय: समस्त उपलब्ध सामान्य और विशेष शब्द संगृहीत किए गए हैं। इसमें अर्थनिर्धारण के लिये व्याख्यात्मक पद्धति अपनाई गई है।