"ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस" के अवतरणों में अंतर

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ऑक्सफोर्ड द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में अंतर्राष्ट्रीय मानक पुस्तक संख्या होती है जो 0-19 से शुरू होती है जो प्रेस को आईएसबीएन सिस्टम में दो-अंकीय पहचान संख्या वाले कई छोटे-छोटे प्रकाशकों में से एक बनाती है. आतंरिक समझौते द्वारा व्यक्तिगत संस्करण संख्या का पहला अंक (0-19- के बाद) एक विशेष प्रभाग का संकेत दे सकता है, उदाहरण के लिए: संगीत के लिए 3 (आईएसएमएन को परिभाषित करने से पहले); न्यूयॉर्क कार्यालय के लिए 5; क्लेयरेंडन प्रेस प्रकाशनों के लिए 8.
[[Fileचित्र:Oxford University Press.jpg|thumb|250px|वाल्टन स्ट्रीट पर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस.]]
 
==प्रारंभिक इतिहास==
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से जुड़ा पहला प्रिंटर थियोडेरिक रूड था. विलियम काक्सटन के एक व्यवसायिक सहयोगी रूड संभवतः एक नए उद्यम के रूप में अपनी लकड़ी की प्रिंटिंग प्रेस को कोलोन से ऑक्सफोर्ड लेकर आये थे, और लगभग 1480 और 1483 के बीच शहर में काम किया था. 1478 में ऑक्सफोर्ड में छापी गई पहली पुस्तक, रुफिनस के ''एक्स्पोजिशियो इन सिम्बोलम एपोस्टोलोरम'' के एक संस्करण को एक अन्य बेनाम प्रिंटर द्वारा छापा गया था. यह बात सब को मालूम है कि इसे रोमन अंकों में गलती से "1468" के रूप में दिनांकित किया गया था जो जाहिर तौर पर काक्सटन से पहले का समय है. रूड की छपाई में जॉन एंकिविल का ''कम्पेंडियम टोटियस ग्रामाटिका'' शामिल था जिसने [[लातिन भाषा|लैटिन]] [[व्याकरण|व्याकरण]] की पढ़ाई के लिए नए मानक स्थापित किए.<ref> बार्कर पी. 4; कार्टर पीपी. 7-11</ref>
 
रूड के बाद विश्वविद्यालय से जुड़ी छपाई लगभग आधी सदी तक छिटपुट रूप में होती रही. रिकॉर्ड या जीवंत कार्य बस कुछ गिने-चुने रूपों में हैं और ऑक्सफोर्ड की छपाई को 1580 के दशक तक कोई मजबूत आधार नहीं मिला था: इसने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रयासों का अनुसरण किया जिसने 1534 में अपने प्रेस का लाइसेंस प्राप्त किया था. क्राउन (राजा) और स्टेशनर्स कंपनी द्वारा [[लंदन|लन्दन]] के बाहर छपाई करने पर लगाई गई बाध्यताओं के प्रतिक्रियास्वरुप ऑक्सफोर्ड ने विश्वविद्यालय में प्रेस चलाने का औपचारिक अधिकार प्राप्त करने के लिए एलिजाबेथ प्रथम से याचना की. चांसलर रॉबर्ट डूडले, अर्ल ऑफ लीसेस्टर ने ऑक्सफोर्ड के मामले की वकालत की. प्रिंटर जोसेफ बार्न्स द्वारा काम शुरू करने के बाद से कुछ शाही अनुमति प्राप्त की गई और स्टार चैंबर के हुक्मनामे में 1586 में "यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड" में प्रेस के कानूनी वजूद का उल्लेख किया गया.<ref> कार्टर पीपी. 17-22</ref>
इस व्यवसाय को केवल एक डेलीगेट विलियम ब्लैकस्टोन के हस्तक्षेप द्वारा बचाया गया. प्रेस की अराजक स्थिति से नाराज होकर और वाइस चांसलर जॉर्ज हडेसफोर्ड से दुश्मनी मोल लेकर ब्लैकस्टोन ने छापेखाने की बारीकी से जांच करवाई लेकिन इसके उलझनग्रस्त संगठन और धूर्त प्रक्रियाओं के निष्कर्ष के रूप में उन्हें अपने सहयोगियों के केवल "उदास और तिरस्कारपूर्ण चुप्पी" या "ज्यादा से ज्यादा निस्तेज उदासीनता" का सामना करना पड़ा. गुस्से में आकर ब्लैकस्टोन ने मई 1757 में हडेसफोर्ड के उत्तराधिकारी थॉमस रंडोल्फ को लिखे गए एक लंबे पत्र को प्रकाशित करके विश्वविद्यालय को अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए मजबूर किया. यहाँ, ब्लैकस्टोन ने प्रेस को एक जन्मजात संस्था के रूप में प्रस्तुत किया जिसने "एक आलस भरी गुमनामी... रोबदार यांत्रिकी के एक घोसले में समय बिताते हुए" छात्रवृत्ति की सेवा करने के सभी झूठे दिखावे को छोड़ दिया था. इन शर्मनाक मामलों से छुटकारा पाने के लिए ब्लैकस्टोन ने अंधाधुंध सुधार की मांग की जो डेलीगेटों की शक्तियों और दायित्वों को सख्ती से स्थापित करेगा, आधिकारिक रूप से उनके विचारों और कार्यप्रणाली को रिकॉर्ड करेगा और छापेखाने को एक कुशल आधार प्रदान करेगा.<ref> आई.जी. फिलिप, ''विलियम ब्लैकस्टोन एंड दी रिफोर्म ऑफ दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस'' , (ऑक्सफोर्ड, 1957) पीपी. 45-72</ref> बहरहाल, रंडोल्फ ने इस दस्तावेज को नज़रअंदाज कर दिया और तब तक परिवर्तन शुरू नहीं हुआ जब तक ब्लैकस्टोन ने कानूनी कार्रवाई करने की धमकी नहीं दी. विश्वविद्यालय ने 1760 तक ब्लैकस्टोन के सभी सुधारों को अपनाने की दिशा में कदम उठाया था.<ref> कार्टर, चैप्टर 21</ref>
 
18वीं शताब्दी के अंतिम दौर तक प्रेस ने और अधिक ध्यान आकर्षित कर लिया था. आरंभिक कॉपीराइट क़ानून ने स्टेशनर्स को कमजोर बनाना शुरू कर दिया था और विश्वविद्यालय को अनुभवी प्रिंटरों (मुद्रकों) को अपना बाइबल कार्य पट्टे पर देने में कष्ट होने लगा. जब अमेरिकी स्वाधीनता युद्ध ने ऑक्सफोर्ड को इसके बाइबल के महत्वपूर्ण बाजार से वंचित कर दिया तब यह पट्टा बहुत जोखिम भरा प्रस्ताव बन गया और डेलीगेटों को उन लोगों को प्रेस के शेयरों की पेशकश करने के लिए मजबूर किया गया जो "पारस्परिक लाभ के लिए व्यापार की देखभाल कर सके और परेशानियों को प्रबंधित" कर सके. अड़तालीस शेयरों को जारी किया गया जिसके साथ विश्वविद्यालय के पास एक नियंत्रक हिस्सा था.<ref> सटक्लिफ पी. XXV</ref> उसी समय जेरेमियाह मार्कलैंड और पीटर एल्म्सले की रचनाओं के साथ-साथ उन्नीसवीं सदी के आरंभिक दौर में मुख्यभूमि [[यूरोप|यूरोप]] के कई शिक्षाविदों द्वारा सम्पादित ग्रंथों से पारंपरिक छात्रवृत्ति में नई जान आई - जिनमें शायद अगस्त इमानुएल बेकर और कार्ल विल्हेल्म डिंडोर्फ़ सबसे प्रमुख थे. दोनों ने 50 सालों तक एक डेलीगेट के रूप में काम करने वाले [[यूनानी भाषा|यूनानी]] विद्वान थॉमस गैस्फोर्ड के आमंत्रण पर संस्करणों को तैयार किया. उनके समय में विकासशील प्रेस ने [[लंदन|लन्दन]] में वितरकों की स्थापना की और ऑक्सफोर्ड में इसी उद्देश्य से टुर्ल स्ट्रीट में पुस्तकविक्रेता जोसेफ पार्कर को नियुक्त किया. पार्कर ने भी प्रेस में अपने शेयर खरीद लिए.<ref> बार्कर पीपी. 36-9, 41. सटक्लिफ पी. 16</ref>
 
इस विस्तार ने प्रेस को क्लेयरेंडन भवन से बाहर धकेल दिया. 1825 में डेलीगेटों (प्रतिनिधियों) ने वोर्सेस्टर कॉलेज से जमीन ख़रीदा. डैनियल रॉबर्टसन और एडवर्ड बलोर द्वारा निर्मित योजनाओं के आधार पर इमारतों का निर्माण किया गया और 1830 में प्रेस को वहां स्थानांतरित कर दिया गया.<ref> बार्कर पी. 41. सटक्लिफ पीपी. 4-5</ref> ऑक्सफोर्ड सिटी सेंटर से उत्तर पश्चिम में वॉल्टन स्ट्रीट और ग्रेट क्लेयरेंडन स्ट्रीट के कोने में स्थित यह साइट इक्कीसवीं सदी में ओयूपी के मुख्य कार्यालय के रूप में बरक़रार है.
प्राइस ने समान रूप से ओयूपी को इसके खुद के अधिकार में प्रकाशन की तरफ स्थानांतरित किया. 1863 में पार्कर के साथ प्रेस का रिश्ता खत्म हो गया और 1870 में कुछ बाइबल रचनाओं के लिए लन्दन में एक छोटे से जिल्दसाजीखाना को ख़रीदा गया.<ref> सटक्लिफ पीपी 16, 19. 37</ref> मैकमिलन का अनुबंध 1880 में समाप्त हो गया और उसे फिर से नवीकृत नहीं किया गया. इस समय तक, लन्दन के पैटर्नोस्टर रो में बाइबल के भण्डारण के लिए ऑक्सफोर्ड का एक गोदाम भी था और 1880 में इसके प्रबंधक हेनरी फ्राउड को विश्वविद्यालय के प्रकाशक का औपचारिक ख़िताब दिया गया. फ्राउड को पुस्तक व्यापार से न कि विश्वविद्यालय से फायदा हुआ और वे कई लोगों के लिए एक पहेली बनकर रह गए. ऑक्सफोर्ड के स्टाफ मैगजीन "द क्लेयरेंडनियन" के एक मृत्युलेख के अनुसार "यहाँ ऑक्सफोर्ड में हममें से कुछ लोगों के पास ही उनका व्यक्तिगत ज्ञान था".<ref> दी क्लेयरेंडूनियन, 4, संख्या 32, 1927, पी. 47</ref> उसके बावजूद, व्यवसाय में पुस्तकों की नई लाइनों को शामिल करके, 1881 में [[नया नियम|न्यू टेस्टामेंट]] के संशोधित संस्करण के विशाल प्रकाशन की अध्यक्षता करके<ref> सटक्लिफ पीपी. 48-53</ref> और 1896 में ब्रिटेन के बाहर [[नया यॉर्क|न्यूयॉर्क]] में प्रेस का पहला कार्यालय स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर फ्राउड ओयूपी के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन गए.<ref> सटक्लिफ पीपी. 89-91</ref>
 
प्राइस ने ओयूपी को रूपांतरित किया. 1884 में जब वे सचिव के पद से रिटायर हुए तब डेलीगेटों ने व्यवसाय के अंतिम शेयरों को वापस खरीद लिया.<ref> सटक्लिफ पी. 64</ref> पेपर मिल, छापेखाने, जिल्दखाना और गोदाम सहित प्रेस पर अब पूरी तरह से विश्वविद्यालय का स्वामित्व था. स्कूली किताबों और आधुनिक विद्वानों के ग्रंथों जैसे [[जेम्स क्लर्क माक्सवेल|जेम्स क्लेर्क मैक्सवेल]] के [[मैक्सवेल के समीकरण|''ए ट्रीटाइज़ ऑन इलेक्ट्रिसिटी एण्ड मैग्नेटिज्म'' ]] (1873) के शामिल होने से इसका उत्पादन बढ़ गया था जो [[ऐल्बर्ट आइनस्टाइन|आइंस्टीन]] के विचार का मूल सिद्धांत साबित हुआ.<ref> बार्कर पी. 48</ref> इसकी परंपरा और कार्य की गुणवत्ता को छोड़े बिना इसे सरलतापूर्वक स्थापित करके प्राइस ने ओयूपी को एक सतर्क और आधुनिक प्रकाशक के रूप में परिवर्तित करना शुरू कर दिया. 1879 में उन्होंने प्रकाशन का काम भी अपने हाथ में ले लिया जिसके फलस्वरूप वह प्रक्रिया अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई अर्थात् विशाल परियोजना का आगमन हुआ जो ''ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी'' (ओईडी) बना.<ref> सटक्लिफ पीपी. 53-8</ref>
 
जेम्स मुर्रे और फिलोलॉजिकल सोसाइटी द्वारा ऑक्सफोर्ड को प्रदान किया गया "न्यू इंगलिश डिक्शनरी" एक शानदार शैक्षिक और देशभक्ति का काम था. लंबी बातचीत के फलस्वरूप एक औपचारिक अनुबंध की स्थापना हुई. मुर्रे को एक रचना को सम्पादित करना था जिसमें लगभग 10 साल का समय लगने वाला था और जिसकी लागत लगभग 9000 पाउंड थी.<ref> सटक्लिफ पीपी. 56-7</ref> दोनों आंकड़े बहुत ज्यादा आशावादी लग रहे थे. यह डिक्शनरी 1884 में मुद्रित रूप में दिखाई देने लगी लेकिन पहला संस्करण मुर्रे की मौत के 13 साल बाद 1928 तक पूरा नहीं हुआ जिसकी लागत लगभग 375000 पाउंड थी.<ref> साइमन विनचेस्टर, ''दी मीनिंग ऑफ एवरीथिंग - दी स्टोरी ऑफ़ दी ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी'' (ऑक्सफोर्ड, 2003)</ref> यह विशाल वित्तीय बोझ और इसके निहितार्थ प्राइस के उत्तरिधिकारियों के कंधे पर आ गया.
फ्राउड को कोई शक नहीं था कि लन्दन में प्रेस का व्यवसाय काफी हद तक बढ़ गया था और बिक्री के आरम्भ के साथ अनुबंध पर नियुक्त किया गया था. सात साल बाद विश्वविद्यालय के प्रकाशक के रूप में फ्राउड एक छाप के रूप में अपने खुद के नाम के साथ-साथ 'ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस' का इस्तेमाल कर रहे थे. यह शैली हाल के दिनों तक कायम थी और प्रेस के लन्दन कार्यालयों से दो प्रकार के छापों की उत्पत्ति हो रही थी. 'विश्वविद्यालय के प्रकाशक' के नाम से जाने जाने वाले अंतिम व्यक्ति जॉन गिल्बर्ट न्यूटन ब्राउन थे जो अपने सहकर्मियों के बीच 'ब्रुनो' के नाम से जाने जाते थे. छापों के द्वारा गर्भित भेद सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण थे. कमीशन (उनके लेखकों द्वारा या किसी पढ़े-लिखे व्यक्तियों के समूह द्वारा भुगतान) पर लन्दन द्वारा जारी किए जाने वाले पुस्तकों की शैली पर 'हेनरी फ्राउड' या 'हम्फ्री मिलफोर्ड' की छाप थी जिस पर ओयूपी का कोई उल्लेख नहीं था मानो प्रकाशक उन्हें अपने आप जारी कर रहे थे जबकि विश्वविद्यालय के शीर्षक के अधीन प्रकाशकों द्वारा जारी किए जाने वाले पुस्तकों पर 'ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस' की छाप थी. इन दोनों श्रेणियों को ज्यादातर लन्दन द्वारा नियंत्रित किया जाता था जबकि ऑक्सफोर्ड (व्यावहारिक दृष्टि से सचिव) क्लेयरेंडन प्रेस पुस्तकों की देखभाल करता था. कमीशन किताबों का मकसद लन्दन व्यवसाय के ऊपरी खर्चों को वित्तपोषित करने के लिए कामधेनु गाय की तरह काम करना था क्योंकि प्रेस ने इस प्रयोजन के लिए अलग से किसी संसाधन की व्यवस्था नहीं की थी. फिर भी फ्राउड विशेष रूप से इस बात पर ध्यान देते थे कि उनके द्वारा प्रकाशित सभी कमीशन पुस्तकों को प्रतिनिधियों का अनुमोदन प्राप्त हो. यह विद्वानों या पुराविदों के प्रेसों के लिए कोई असामान्य व्यवस्था नहीं थी.{{citation needed|date=December 2010}}
 
प्राइस ने तुरंत बाइबल के संशोधित संस्करण के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के साथ संयुक्त रूप से निकटवर्ती प्रकाशन के लिए फ्राउड को प्रधानता दी जिसके इस हद तक एक 'बेस्टसेलर' होने की सम्भावना थी जिसे मांग के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए प्रेस के सभी संसाधनों को काम में लगाने की जरूरत पड़ती. यह 1611 के प्राधिकृत संस्करण को अधिक्रमित करते हुए सबसे पुराने मूल यूनानी और हिब्रू संस्करणों से बाइबल ग्रन्थ का एक सम्पूर्ण पुनरानुवाद था. फ्राउड की एजेंसी को ठीक समय पर संशोधित संस्करण के लिए स्थापित किया गया जिसे 17 मई 1881 को प्रकाशित किया गया और प्रकाशन से पहले और तब से एक खतरनाक दर पर इसकी एक मिलियन प्रतियों की बिक्री हुई हालांकि अत्यधिक उत्पादन की वजह से अंत में लाभ में कमी आ गई.{{citation needed|date=December 2010}} हालांकि फ्राउड किसी भी तरह से एक ऑक्सफोर्ड व्यक्ति नहीं थे और ऐसा होने का कोई सामाजिक मिथ्याभिमान नहीं था लेकिन फिर भी वह एक अच्छे व्यवसायी थे जो सतर्कता और उद्यम के बीच के जादूई संतुलन को प्रभावित करने में सक्षम थे. उनके मन में बहुत पहले से ही प्रेस के विदेशी व्यापार को सबसे पहले यूरोप में और उसके बाद लगातार अमेरिका, कनाडा, भारत और अफ्रीका में उन्नत बनाने का विचार हिलोर मार रहा था. अमेरिकी शाखा के साथ-साथ [[एडिनबरा|एडिनबर्ग]], [[टोरंटो|टोरंटो]] और [[मेलबॉर्न|मेलबोर्न]] में डिपो स्थापित करने का एकमात्र श्रेय काफी हद तक उन्हीं पर था. फ्राउड ने लेखकों से निपटने, जिल्दसाजी, वितरण और विज्ञापन सहित ओयूपी की छाप वाली किताबों के लिए अधिकांश प्रचालन तंत्रों को नियंत्रित किया और केवल संपादकीय कार्य और छपाई की देखरेख का काम ऑक्सफोर्ड द्वारा किया गया.{{citation needed|date=December 2010}}
 
फ्राउड ऑक्सफोर्ड को नियमित रूप से पैसे भेजते थे लेकिन उन्होंने निजी तौर पर महसूस किया कि इस व्यवसाय की पूंजी काफी कम थी और अगर इसे एक वाणिज्यिक आधार नहीं मिला तो यह बहुत जल्द विश्वविद्यालय के संशाधनों को खाली कर देगा. उन्हें खुद एक निर्धारित सीमा तक व्यवसाय में पैसों का निवेश करने की अधिकार था लेकिन पारिवारिक परेशानियों की वजह से वे ऐसा नहीं कर पा रहे थे. इसलिए विदेशी बिक्री में उनकी रुचि जगी क्योंकि 1880 और 1890 के दशकों तक भारत में पैसा बनाने का अवसर था जबकि यूरपीय पुस्तक बाजार मंदी की मार झेल रहा था. लेकिन प्रेस के फैसले से फ्राउड की दूरी का मतलब था कि जब तक कोई प्रतिनिधि उनकी तरफदारी नहीं करता तब तक वे इस नीति को प्रभावित करने में असमर्थ थे. फ्राउड ने अपना ज्यादातर समय प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए जनादेश के तहत काम करने में बिताया. 1905 में पेंशन के लिए आवेदन करते समय उन्होंने तत्कालीन वाइस चांसलर जे. आर. मैग्राथ को लिखा कि बाइबल वेयरहाउस के प्रबंधक के रूप में उनके सात साल के कार्यकाल में लन्दन व्यवसाय की बिक्री का औसत लगभग 20000 पाउंड और लाभ का परिमाण 1887 पाउंड प्रति वर्ष था. 1905 तक प्रकाशक के रूप में उनके प्रबंधन के तहत बिक्री का परिमाण 200000 पाउंड प्रति वर्ष पहुँच गया था और उनके 29 साल के कार्यकाल में लाभ के परिमाण का औसत 8242 प्रति वर्ष पहुँच गया था.
===विदेशी व्यापार का विकास ===
 
मिलफोर्ड ने लगभग तुरंत विदेशी व्यापार की जिम्मेदारी ले ली और 1906 तक उन्होंने होडर एण्ड स्टफटन के साथ संयुक्त रूप से भारत और सुदूर पूर्व में एक यात्री को भेजने की योजना बनाना शुरू कर दिया. एन. ग्रेडन (प्रथम नाम अज्ञात) को सबसे पहले 1907 में और उसके बाद 1908 में यात्री के रूप में भेजा गया जब उन्होंने विशेष रूप से भारत, जलडमरूमध्य और सुदूर पूर्व में ओयूपी का प्रतिनिधित्व किया. 1909 में उनकी जगह ए. एच. कोब को रखा गया और 1910 में कोब ने अर्द्ध स्थायी रूप से भारत में ठहरने वाले एक यात्रा प्रबंधक के रूप में कार्य किया. 1911 में ई. वी. रियू को ट्रांस-साइबेरियन रेलवे के माध्यम से पूर्व एशिया भेजा गया जिन्होंने [[चीन|चीन]] और [[रूस|रूस]] में कई साहसिक कारनामे किए और उसके बाद वे भारत के दक्षिण में आए और पूरे भारत के शिक्षाविदों और अधिकारियों से मिलने में साल का अधिकांश समय बिताया. 1912 में वह फिर से [[मुम्बई|बम्बई]] पहुंचे जिसे अब मुंबई के नाम से जाना जाता है. वहां उन्होंने डॉकसाइड क्षेत्र में कार्यालय किराए पर लिया और पहला विदेशी ब्रांच स्थापित किया.
 
1914 में [[यूरोप|यूरोप]] उथलपुथल में डूबा हुआ था. युद्ध की वजह से सबसे पहले कागज़ में कमी और शिपिंग में नुकसान और गड़बड़ी होने लगी और उसके बाद कर्मचारियों की संख्या में बहुत कमी हो गई क्योंकि उन्हें मैदान में सेवा करने के लिए बुला लिया गया. भारतीय शाखा के अग्रदूतों में से दो अग्रदूतों सहित कई कर्मचारी लड़ाई में मारे गए. मजे की बात यह है कि 1914 से 1917 तक बिक्री अच्छी थी और सिर्फ युद्ध के अंतिम समय में हालत सचमुच जरूरत से ज्यादा खराब हो गई.
 
कमी से राहत मिलने के बजाय 1920 के दशक में सामग्रियों और श्रम की कीमतें आकाश छूने लगी. खास तौर पर कागज़ मिलना मुश्किल हो गया था और उसे व्यापारिक कंपनियों के माध्यम से दक्षिण अमेरिका से मंगाना पड़ता था. 1920 के दशक के अंतिम दौर में अर्थव्यवस्था और बाजारों की हालत में धीरे-धीरे सुधार होने लगा. 1928 में प्रेस में छपी सामग्रियों को लन्दन, एडिनबर्ग, [[ग्लासगो|ग्लासगो]], लीप्ज़िग, टोरंटो, मेलबोर्न, [[केपटाउन|केप टाउन]], बम्बई, कलकत्ता, मद्रास और शंघाई में पढ़ा जाता था. इनमें से सभी पूर्ण विकसित शाखाएं नहीं थीं: लीप्ज़िग में एक डिपो था जिसे एच. बोहून बीट द्वारा चलाया जाता था और कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में शहरों में छोटे-छोटे क्रियाशील डिपो और कंपनियों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के साथ-साथ प्रेस के स्टॉक को बेचने के लिए ग्रामीण स्थिरता की जानकारी रखने वाले शैक्षिक प्रतिनिधियों की एक सेना थी जिनकी एजेंसियों पर प्रेस का कब्ज़ा था जिनमें अक्सर काल्पनिक और हल्की-फुल्की पठनीय सामग्रियां शामिल थीं. भारत में बम्बई, मद्रास और कलकत्ता के शाखा डिपो बड़े स्टॉक सूची के साथ प्रतिष्ठानों को प्रभावित कर रहे थे क्योंकि प्रेसिडेंसियां खुद बड़ी बाजार थीं और वहां शैक्षिक प्रतिनिधि ज्यादातर दूरस्थ व्यापार से निपटते थे. 1929 की मंदी ने अमेरिकास के मुनाफे को धीरे-धीरे खत्म कर दिया और भारत अन्य दिर्ष्टि से एक निराशाजनक तस्वीर का 'एक उज्जवल स्थान' बन गया. बम्बई अफ्रिकास के वितरण और ऑस्ट्रेलेशिया की प्रगतिशील बिक्री का केन्द्र बिंदु था और तीन प्रमुख डिपो पर प्रशिक्षित व्यक्ति बाद में अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के अग्रगामी शाखाओं में स्थानांतरित हो गए.<ref> मिलफोर्ड का लेटरबुक</ref>
 
प्रेस ने [[द्वितीय विश्वयुद्ध|द्वितीय विश्वयुद्ध]] में [[प्रथम विश्वयुद्ध|प्रथम विश्वयुद्ध]] की तरह अनुभव किया, फर्क सिर्फ इतना था कि मिलफोर्ड अब रिटायर होने वाले थे और उन्हें 'युवा व्यक्तियों के गमन से नफरत थी'. इस बार लन्दन में होने वाला हवाई आक्रमण बहुत ज्यादा खतरनाक था और लन्दन व्यवसाय को अस्थायी रूप से ऑक्सफोर्ड स्थानांतरित कर दिया गया था. अब अत्यंत अस्वस्थ हो चुके और कई व्यक्तिगत शोकों में डूबे मिलफोर्ड ने युद्ध के अंत तक रूकने और व्यवसाय को चलाते रहने पर जोर दिया. पहले की तरह सभी चीजों की आपूर्ति कम थी लेकिन यू-नाव संकट ने शिपिंग को दोगुना अनिश्चित बना दिया और पत्र पुस्तिकाएं समुद्र में खो चुके खेपों के मातमी रिकॉर्ड से भरे हुए हैं. कभी-कभी किसी लेखक के साथ-साथ दुनिया के युद्ध के मैदानों में अब विखर चुके कर्मचारियों के भी लापता या मृत होने की खबर दी जाएगी. डोरा, क्षेत्र रक्षा अधिनियम, को आयुध निर्माण के लिए सभी गैर जरूरी धातु को समर्पित करने की जरूरत थी और कई कीमती इलेक्ट्रोटाइप प्लेटों को सरकार के आदेश पर पिघला दिया गया.
 
युद्ध के अंत के साथ मिलफोर्ड की जगह जियोफ्री कम्बरलेग ने ले ली. इस दौरान साम्राज्य के विभाजन के बावजूद एकीकरण और युद्ध के बाद राष्ट्रमंडल का पुनर्गठन देखने को मिला. ब्रिटिश काउंसिल जैसे संस्थानों के साथ मिलकर ओयूपी ने शिक्षा बाजार में खुद को स्थिति को फिर से मजबूत करना शुरू कर दिया. अपनी पुस्तक ''मूविंग द सेंटर: द स्ट्रगल फॉर कल्चरल फ्रीडम'' में न्गुगी वा थियोंगो ने दर्ज किया है कि किस तरह अफ्रीका के ऑक्सफोर्ड पाठकों ने अपनी विशाल आंग्ल-केंद्रित विश्वदृष्टि से उन्हें केन्या के एक बच्चे की तरह प्रभावित किया.<ref> नगुगी वा थिओंगो, वान्ग्यू वा गोरो और नगुगी वा थिओंगो द्वारा गिकुयु से अनुवादित '''मूविंग दी सेंटर: दी स्ट्रगल फॉर कल्चर फ्रीडम'' ' में 'इम्पीरीअलिज़म ऑफ लैंग्वेज', (लंदन: कर्रे, 1993), पी. 34.</ref> उसके बाद से यह प्रेस दुनिया भर में फैलने वाले विद्वान और सन्दर्भ पुस्तक बाजार के सबसे बड़े खिलाड़ियों में से एक के रूप में उभर गया है.
 
====दक्षिणी अफ्रीका====
यूके में प्रकाशित ओयूपी शीर्षकों के लिए एक वितरण एजेंट के रूप में कुछ समय काम करने के बाद 1960 के दशक में ओयूपी दक्षिणी अफ्रीका ने स्थानीय लेखकों और आम पाठकों के साथ-साथ स्कूलों और विश्वविद्यालयों के लिए भी प्रकाशन करना शुरू कर दिया. इसके कार्यक्षेत्र में बोत्सवाना, लेसोथो, स्वाजीलैंड और नामीबिया के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका भी शामिल है जो पाँचों में से सबसे बड़ा बाजार है.<br />
ओयूपी दक्षिणी अफ्रीका अब दक्षिण अफ्रीका के तीन सबसे बड़े शैक्षिक प्रकाशकों में से एक है और यह पाठ्य पुस्तकों, शब्दकोशों, एटलस और स्कूलों की पूरक सामग्रियों और विश्वविद्यालयों के लिए पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशन पर अपना ध्यान केंद्रित करती है. इसके लेखक समूहों में काफी हद तक स्थानीय लेखक शामिल हैं और विदेशों में पढ़ने वाले दक्षिण अफ्रीकियों के लिए छात्रवृत्तियों की सहायता के लिए 2008 में इसने [http://www.mandelarhodes.org मंडेला रोड्स फाउन्डेशन] के साथ पार्टनरशिप की.
 
बीसवीं सड़ी से पहले ऑक्सफोर्ड के प्रेस में कभी-कभार संगीत की कोई रचना या संगीत विद्या से सम्बन्धी कोई किताब छपती थी. इसने 1899 में ''द याटेंडन हाइमनल'' भी प्रकाशित किया था और पर्सी डियरमर और उस समय काफी हद तक अज्ञात राल्फ वौघन विलियम्स के संपादकत्व में 1906 में प्रकाशित ''द इंग्लिश हाइमनल'' का पहला संस्करण अधिक महत्वपूर्ण था. सर विलियम हेनरी हैडो के कई खंडों वाली ''ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ म्यूजिक'' 1901 और 1905 के बीच दिखाई दी. हालांकि इस तरह संगीत प्रकाशन उद्यम बहुत कम थे: "उन्नीसवीं सदी में ऑक्सफोर्ड में इस विचार को महत्व नहीं दिया जाता था कि संगीत किसी अर्थ में शैक्षिक हो सकती है"<ref name="Sutcliffe p. 210"> सटक्लिफ पी. 210</ref> और कुछ प्रतिनिधि या पूर्व प्रकाशक खुद संगीत से संबंधित थे या उनकी पृष्ठभूमि काफी हद तक संगीत से संबंधित थी.
 
हालांकि लंदन कार्यालय में मिलफोर्ड ने संगीत का मजा लिया था और खास तौर पर चर्च और गिरिजाघर के संगीतकारों की दुनिया के साथ उनका संबंध था. 1921 में मिलफोर्ड ने ह्यूबर्ट जे. फॉस को मूल रूप से शैक्षिक प्रबंधक वी. एच. कॉलिंस के एक सहायक के रूप में काम पर रखा था. उस काम में फॉस ने अपनी ऊर्जा और कल्पना का परिचय दिया. हालांकि सटक्लिफ के अनुसार एक साधारण संगीतकार और प्रतिभाशाली पियानोवादक के रूप में फॉस "की रुचि खास तौर से शिक्षा में नहीं थी; संगीत में उनकी गहरी रुचि थी.<ref name="Sutcliffe p. 210"></ref> उसके बाद बहुत जल्द जब फॉस ने मिलफोर्ड को रेडियो पर अक्सर बजाई जाने वाली रचनाओं के संगीतकारों पर जाने-माने संगीतज्ञों के निबन्धों के समूह को प्रकाशित करने की योजना के बारे में बताया तब मिलफोर्ड ने शायद इसे शिक्षा की तुलना में संगीत से कम संबंधित माना होगा. उस विचार प्रक्रिया का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड मौजूदा नहीं है जिसके द्वारा प्रेस ने संगीत के प्रकाशन के क्षेत्र में कदम रखा होगा. फॉस की मौजूदगी और उनका ज्ञान, योग्यता, उत्साह और कल्पना शायद मिलफोर्ड के दिमाग में एक साथ कई असंबंधित गतिविधियों को जन्म देने वाले उत्प्रेरक का काम किया होगा जिसने विदेशी शाखाओं की स्थापना की तरह एक अन्य नए उद्यम को जन्म दिया होगा.<ref name="Hinnells p. 6"> हिनेल्स पी. 6</ref>
 
हो सकता है कि मिलफोर्ड को पूरी तरह यह बात समझ में नहीं आई होगी कि वह क्या कर रहे थे. 1973 में संगीत विभाग द्वारा पचासवीं सालगिरह पर प्रकाशित पुस्तिका से पता चलता है कि ओयूपी को "संगीत व्यापार का कोई ज्ञान नहीं था और उसके संगीत दुकानों में अपनी रचनाओं को बेचने के लिए कोई प्रतिनिधि भी नहीं था और ऐसा लगता है कि उसे इस बात का भी इल्म नहीं था कि शीट संगीत पुस्तकों से किसी भी तरह से एक अलग चीज थी."<ref> ऑक्सफोर्ड पी. 4</ref> हालांकि मिलफोर्ड ने जानबूझकर या अनजाने में तीन कदम उठाए जिससे ओयूपी ने एक प्रमुख कार्य का शुभारंभ किया. उन्होंने एंग्लो-फ्रेंच म्यूजिक कंपनी और इसके सभी केन्द्रों, संबंधित वस्तुओं और संसाधनों को खरीद लिया. उन्होंने संगीत के लिए एक पूर्णकालिक बिक्री प्रबंधक के रूप में नोर्मैन पीटरकिन नामक एक संयमी मशहूर संगीतज्ञ को काम पर रख लिया. और 1923 में उन्होंने एक अलग प्रभाव संगीत विभाग की स्थापना की जिसके कार्यालय आमेन हाउस में थे और जिसके पहले संगीत संपादक फॉस थे. उसके बाद सामान्य समर्थन के अलावा मिलफोर्ड ने फॉस को बड़े पैमाने पर उनके अपने उपकरणों के हवाले कर दिया.<ref> सटक्लिफ पी. 211</ref>
 
फॉस ने इसका जवाब अविश्वसनीय ऊर्जा के साथ दिया. उन्होंने "सबसे कम संभावित समय में सबसे बड़ी संभावित सूची" का निर्माण किया<ref name="Oxford p. 6"> ऑक्सफोर्ड पी. 6</ref> और लगभग 200 शीर्षक प्रति वर्ष की दर से उसमें शीर्षकों शामिल करना शुरू कर दिया; आठ साल बाद उस सूची में 1750 शीर्षक थे. विभाग की स्थापना के वर्ष में फॉस ने "क्सोफोर्ड कोरल सॉंग्स" श्रृंखला शीर्षक के तहत सस्ती लेकिन अच्छी तरह से सम्पादित और मुद्रित समवेत रचनाओं की एक श्रृंखला का निर्माण करना शुरू कर दिया. डब्ल्यू. जी. व्हिटटेकर के सामान्य संपादकत्व में यह श्रृंखला पुस्तक रूप में या अध्ययन के बजाय संगीत के प्रकाशन के लिए ओयूपी की पहली वचनबद्धता थी. इस श्रृंखला योजना का विस्तार करके इसी तरह की सस्ती लेकिन उच्च गुणवत्ता वाली "ऑक्सफोर्ड चर्च म्यूजिक" और "ट्यूडर चर्च म्यूजिक" (कार्नेगी यूके ट्रस्ट से अपने हाथों में लिया गया) को शामिल किया गया; इनमें से सभी श्रृंखलाएं आज भी जारी हैं. वास्तव में फॉस द्वारा मिलफोर्ड के सामने प्रकाशन हेतु प्रस्तुत निबन्धों की योजना 1927 में ''हेरिटेज ऑफ म्यूजिक'' के रूप में दिखाई दी (अगले तीस सालों में दो और खंड दिखाई दिए होंगे). इसी तरह पर्सी स्कोल्स की ''लिस्नर्स गाइड टू म्यूजिक'' (वास्तव में 1919 में प्रकाशित) को आम जनता को सुनाने के लिए संगीत प्रशंसा पर आधारित पुस्तकों की एक श्रृंखला में से पहली श्रृंखला के रूप में नए विभाग में प्रस्तुत किया गया था.<ref name="Hinnells p. 6"></ref> ब्रॉडकास्ट और रिकॉर्डेड संगीत के विकास के साथ तालमेल बैठने के लिए
ओयूपी के लिए डिजाइन किए गए स्कोल्स के निरंतर कार्यों और पत्रकारिता संगीत आलोचना के क्षेत्र में उनके अन्य कार्यों को बाद में ''ऑक्सफोर्ड कम्पैनियन टू म्यूजिक'' में व्यापक रूप से एकीकृत और सारगर्भित किया होगा.
 
शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फॉस को शायद उन रचनाओं के नए संगीतकारों की तलाश करने की आदत थी जिन रचनाओं को वह विशिष्ट रूप से अंग्रेज़ी संगीत की मान्यता देते थे जो जनता को अधिक प्रिय थी. इस एकाग्रता के फलस्वरूप ओयूपी को दो पारस्परिक सुदृढ़ लाभ प्राप्त हुआ: संभावित प्रतिस्पर्धियों के कब्जे से बचे रहने वाले संगीत प्रकाशन के क्षेत्र में प्रवेश करने का एक मौका और संगीत प्रदर्शन एवं निर्माण के लिए एक शाखा जिसे अब तक खुद अंग्रेजों द्वारा काफी हद तक नजरअंदाज किया जा रहा था. हिनेल्स के प्रस्ताव एके मुताबिक काफी हद तक अज्ञात वाणिज्यिक संभावनाओं वाले संगीत के क्षेत्र में संगीत विभाग का आरंभिक "छात्रवृत्ति एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मिश्रण" इसकी सांस्कृतिक परोपकार (प्रेस की शैक्षिक पृष्ठभूमि को देखते हुए) की भावना और "जर्मन मुख्यधारा के बाहर राष्ट्रीय संगीत" को बढ़ावा देने की इच्छा से प्रेरित था.<ref> हिनेल्स पी. 8</ref>
 
इसका नतीजा यह हुआ कि फॉस ने सक्रिय रूप से इस कार्य को बढ़ावा देना शुरू कर दिया और राल्फ वौघन विलियम्स, विलियम वॉल्टन, कॉन्स्टन्ट लैम्बर्ट, एलन रॉस्थोर्न, पीटर वॉरलॉक (फिलिप हेसेलटीन), एडमंड रुब्ब्रा और अन्य अंग्रेज़ी संगीतकारों के संगीत के प्रकाशन की इच्छा प्रकट की. जिस सन्दर्भ में प्रेस को "आधुनिक संगीत के इतिहास के सबसे टिकाऊ सज्जन समझौता"<ref name="Oxford p. 6"></ref> कहा गया उस सन्दर्भ में फॉस ने ऐसी किसी भी संगीत के प्रकाशन की गारंटी दी जिसे वौघन विलियम्स उन्हें प्रदान करना चाहेंगे. इसके अलावा, फॉस ने ओयूपी के केवल संगीत के प्रकाशन और जीवंत प्रदर्शन के अधिकारों को ही नहीं बल्कि रिकॉर्डिंग और ब्रॉडकास्ट के "यांत्रिक" अधिकारों को भी सुरक्षित करने की दिशा में कदम उठाया. यह बात पूरी तरह से स्पष्ट नहीं थी कि उस समय यह सब कितना महत्वपूर्ण साबित हुआ होगा. दरअसल फॉस, ओयूपी और कई संगीतकारों ने पहले परफॉमिंग राईट सोसाइटी में शामिल होने या उसका समर्थन करने से इनकार कर दिया था क्योंकि उन्हें डर था कि नई मीडिया के क्षेत्र में होने वाले इस तरह के प्रदर्शन पर इसकी फीस का बुरा असर पड़ेगा. बाद के वर्षों में देखा गया कि इसके विपरीत इस तरह के संगीत, संगीत प्रकाशन के पारंपरिक स्थलों की तुलना में अधिक आकर्षित साबित हुए.<ref> हिनेल्स पी. 18-19; 1936 में ओयूपी शामिल हो गए.</ref>
 
संगीत की पेशकश के परिमाण और विस्तार की दृष्टि से और संगीतज्ञों और आम जनता दोनों के दिलों में इसकी प्रतिष्ठा की दृष्टि से संगीत के विभाग ने चाहे जैसा भी विकास किया हो, 1930 के दशक में आखिरकार वित्तीय प्रतिफल का सवाल सबसे प्रमुख था. लन्दन प्रकाशक के रूप में मिलफोर्ड ने संगीत विभाग के निर्माण और विकास के वर्षों में इसे अपना पूरा सहयोग दिया था. हालांकि उन पर लगातार होने वाले खर्चों से चिंतित ऑक्सफोर्ड के प्रतिनिधियों का दबाव बढ़ने लगा जो उन्हें एक लाभहीन उद्यम लग रहा था. उनके दृष्टि में आमेन हाउस का संचालन शैक्षिक दृष्टि से सम्मान योग्य और वित्तीय दृष्टि से लाभकारी था. लन्दन कार्यालय "शिक्षा को बढ़ावा देने के खर्च के लिए क्लेयरेंडन प्रेस के लिए पैसा कमाने के स्रोत के रूप में बना रहा."<ref> सटक्लिफ पी. 168</ref> इसके अलावा, ओयूपी अपने पुस्तक प्रकाशनों को अल्पकालीन परियोजनाएं मानता था: प्रकाशित होने के कुछ वर्षों के भीतर न बिकने वाली किसी भी पुस्तक को बाजार से वापस मंगवा लिया जाता था (अनियोजित या छिपे आय के रूप में दिखाने के लिए हालांकि वास्तव में उन्हें बाद में बेच दिया जाता था). इसके विपरीत, प्रदर्शन के लिए संगीत पर संगीत विभाग का दबाव अपेक्षाकृत दीर्घकालीन और निरंतर था जो खास तौर इसका कारण यह था कि इससे होने वाला आय बार-बार के प्रसारण या रिकॉर्डिंग से प्राप्त होता था और इसलिए क्योंकि यह नए और आगामी संगीतज्ञों के साथ अपने रिश्ते को बनाने में लगा हुआ था. प्रतिनिधिगण फॉस के नजरिए से सहमत नहीं थे: "मुझे अभी भी यही लगता है कि यह शब्द 'नुकसान' एक झूठा शब्द है: क्या यह वास्तव में पूंजी का निवेश नहीं है?" यह वाक्य फॉस ने 1934 में मिलफोर्ड को लिखा था.<ref> हिनेल्स पी. 17</ref>
 
इस प्रकार 1939 तक संगीत विभाग में किसी भी वर्ष कोई मुनाफा नहीं दिखाई दिया.<ref name="Sutcliffe p. 212"> सटक्लिफ पी. 212</ref> तब तक मंदी के आर्थिक दबाव के साथ-साथ खर्च को कम करने के अंदरूनी दबाव और संभवतः ऑक्सफोर्ड के मूल निकाय की शैक्षिक पृष्ठभूमि ने एक साथ मिलकर ओयूपी के प्राथमिक संगीत व्यवसाय को जन्म दिया जिसकी प्रकाशन रचनाओं का मुख्य आधार औपचारिक संगीत शिक्षा और संगीत प्रशंसा थी जो एक तरह से प्रसारण और रिकॉर्डिंग का ही एक एक असर था.<ref name="Sutcliffe p. 212"></ref> यह ब्रिटिश स्कूलों की संगीत शिक्षा की सहायक सामग्रियों की बढ़ती मांग के साथ अच्छी तरह से मेल खा रहा था जो 1930 के दशक में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी सुधारों का परिणाम था.<ref> हैडो द्वारा विभिन्न कमीशंस की अध्यक्षता के तहत</ref> प्रेस ने नए संगीतज्ञों और उनके संगीत की तलाश करने और उन्हें प्रकाशित करने का काम बंद नहीं किया लेकिन व्यवसाय का स्वरुप बदल गया था. व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित और आर्थिक बाधाओं और (युद्ध के लंबा खींचने के कारण) कागज़ की कमी से तंग आकर और द ब्लिट्ज से बचने के लिए लन्दन के सभी कार्य-संचालन तंत्रों को ऑक्सफोर्ड स्थानांतरित किए जाने से बहुत ज्यादा नाराज होकर, फॉस ने 1941 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह पीटरकिन को रखा गया.<ref> हिनेल्स पी. 34</ref>
 
==महत्वपूर्ण श्रृंखलाएं और शीर्षक==
==संदर्भग्रन्थ==
* हैरी कार्टर, ''ए हिस्ट्री ऑफ दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस'' , (ऑक्सफोर्ड: क्लेयरेंडन प्रेस, 1975).
* रिमी बी. चटर्जी, ''एम्पायर्स ऑफ दी माइंड: ए हिस्ट्री ऑफ दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इन इंडिया ड्यूरिंग दी राज'' (न्यू डेल्ही: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2006).
* डंकन हिनेल्स, ''एन एक्स्ट्राऑर्डिनरी परफोरमेंस: ह्यूबर्ट फॉस एंड दी अर्ली इयर्स ऑफ म्यूज़िक पब्लिशिंग एट दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,'' (ऑक्सफोर्ड: ओयूपी [आईएसबीएन 978-0-19-323200-6], 1998).
* ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस म्यूज़िक डिपार्टमेंट, ''ऑक्सफोर्ड म्यूज़िक: दी फस्ट फिफ्टी इयर्स '23-'73,'' (लंदन: ओयूपी, 1973).
* पीटर सटक्लिफ, ''दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस: एन इन्फोर्मल हिस्ट्री'' , (ऑक्सफोर्ड: क्लेयरेंडन प्रेस [आईएसबीएन 0-19-951084-9], 1978).
* पीटर सटक्लिफ, ''एन इन्फोर्मल हिस्ट्री ऑफ दी ओयूपी'' (ऑक्सफोर्ड: ओयूपी, 1972).
 
==अग्रिम पठन==
* [http://books.google.com/books?id=ym0AAAAAYAAJ&amp;printsec=titlepage#PPA70,M2 1903 इलस्ट्रेटेड आर्टिकल ''दी मोस्ट फेमस प्रेस इन दी वर्ल्डप्रेस'' ]
 
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[[af:Oxford University Press]]
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