"कुंतक": अवतरणों में अंतर

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कुन्तक अभिधा की सर्वातिशायिनी सत्ता स्वीकार करने वाले आचार्य थे। परंतु यह अभिधा संकीर्ण आद्या शब्दवृत्ति नहीं है। अभिधा के व्यापक क्षेत्र के भीतर लक्षणा और व्यंजना का भी अंतर्भाव पूर्ण रूप से हो जाता है। वाचक शब्द द्योतक तथा व्यंजक उभय प्रकार के शब्दों का उपलक्षण है। दोनों में समान धर्म अर्थप्रतीतिकारिता है। इसी प्रकार प्रत्येयत्व (ज्ञेयत्व) धर्म के सादृश्य से द्योत्य और व्यंग्य अर्थ भी उपचारदृष्ट्या वाच्य कहे जा सकते हैं।
 
उनकी एकमात्र रचना [[वक्रोक्तिजीवित]] है जो अधूरी ही उपलब्ध हैं। [[वक्रोक्ति अलंकार|वक्रोक्ति]] को वे [[काव्य]] का 'जीवित' (जीवन, प्राण) मानते हैं। वक्रोक्तिजीवित में वक्रोक्ति को ही काव्य की आत्मा माना गया है जिसका और आचार्यों ने खंडन किया है । पूरे ग्रंथ में वक्रोक्ति के स्वरूप तथा प्रकार का बड़ा ही प्रौढ़ तथा पांडित्यपूर्ण विवेचन है। वक्रोक्ति का अर्थ है वदैग्ध्यभंगीभणिति (सर्वसाधारण द्वारा प्रयुक्त वाक्य से विलक्षण कथनप्रकार)
 
'''वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यभंगीभणितिरुच्यते'''। (वक्रोक्तिजीवित 1.10)
 
==इन्हें भी देखें==
* [[वक्रोक्तिजीवित]]
* [[महिम भट्ट]]
* [[वक्रोक्ति सिद्धान्त]]
 
==सन्दर्भ ग्रन्थ==
* आचार्य विश्वेश्वर: हिंदी वक्रोक्ति जीवित, दिल्ली, 1957;
* बलदेव उपाध्याय : भारतीय साहित्यशास्त्र, भाग 2, काशी, सं. 2012;
* सुशीलकुमार दे: वक्रोक्तिजीवित का संस्करण तथा ग्रंथ की भूमिका, कलकत्ता
 
==बाहरी कड़ियाँ==
74,334

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