"इलेक्ट्रान विवर्तन" के अवतरणों में अंतर

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जब इलेक्ट्रानों की संकीर्ण किरणावलि (बीम) को किसी मणिभ (क्रिस्टल) के पृष्ठ से टकराने दिया जाता है तब उन इलेक्ट्रानों का व्याभंग ठीक उसी प्रकार से होता है जैसे एक्स-किरणों (एक्स-रेज़) की किरणावालि का। इस घटना को '''इलेक्ट्रान विवर्तन''' (इलेक्ट्रान-डिफ़्रैक्शन)। कहते हैं और यह मणिभ विश्लेषण, अर्थात् मणिभ की सरंचना के अध्ययन की एक शक्तिशाली रीति है।
 
== इतिहास ==
1927 ई. में डेविसन और जरमर ने [[इलेक्ट्रान बंदूक]] द्वारा उत्पादित इलेक्ट्रान किरणावलि को निकल के एक बड़े तथा एक एकल [[मणिभ]] से टकराने दिया तो उन्होंने देखा कि भिन्न-भिन्न विभवों (पोटेंशियलों) द्वारा त्वरित इलेक्ट्रान किरणावलियों का विवर्तन भिन्न-भिन्न दिशाओं में हुआ (इलेक्ट्रान बंदूक इलेक्ट्रानों की प्रबल और फोकस की हुई किरणावलि उत्पन्न करने की एक युक्ति है)। एक्स-किरणों की तरह जब उन्होंने इन इलेक्ट्रानों के तरंगदैर्ध्यो को समीकरण :<math> m \lambda = 2 d \sin \theta \,</math> के आधार पर निकाला (जहाँ d = मणिभ में परमाणुओं की क्रमागत परतों के बीच की दूरी; θ = रश्मियों का आपात-कोण, अर्थात् वह कोण जो आनेवाली रश्मियाँ मणिभ के तल से बनाती हैं; m = वर्णक्रम का क्रम (ऑर्डर); λ = तरंगदैर्ध्य ), तब उन्हें ज्ञात हुआ कि इन तरंगदैर्ध्यों दै के मूल्य ठीक उतने ही निकलते हैं जितने डी ब्रोगली का समीकरण :<math>\lambda=\frac{h}{p} \,</math> देता है। यहाँ '''h''' प्लैंक का नियतांक है, p इलेक्ट्रान का [[संवेग]]। यह प्रथम प्रयोग था जिसने इलेक्ट्रानों के उन तरंगीय गुणों को सिद्ध किया जिनकी भविष्यवाणी एल.डी.ब्रोगली ने 1924 ई. में गणित के सिद्धांतों के आधार पर की थी।
 
ठोस पदार्थो के परीक्षणों में 10<sup>-6</sup> सें.मी. वाली पतली पन्नियों को इलेक्ट्रान किरणावलि के मार्ग में इस प्रकार रखा जाता है कि इलेक्ट्रान उनको पार कर दूसरी ओर निकल जायँ और जो अधिक मोटी होती है उनको इस प्रकार स्थापित किया जाता है कि इलेक्ट्रान उनकी सतह से टकराकर बहुत छोटे कोण (लगभग 2 अंश) पर परावर्तित (रिफ़्लेक्टेड) हो जाएँ। इन परीक्षणों ने मणिभ के अंदर परमाणुओं के क्रम पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। लोह, ताम्र, वंग जैसी धातुओं की चमकीली सतहों से प्राप्त इलेक्ट्रान-विवर्तन-आकृतियों के अध्ययन से यह महत्वपूर्ण तथ्य निकलता है कि इनके पृष्ठ पर अमणिभ धातु या उनके आक्साइड की महीन तह होती है। इलेक्ट्रान विवर्तन वृत्तों का अत्यंत धुधँलापन यह प्रकट करता है कि वे परावर्तन द्वारा ऐसे पृष्ठ से प्राप्त हुए हैं जो अमणिभ या लगभग अमणिभ था। इलेक्ट्रान विवर्तन-विधि बहुत से गैसीय अवस्था में रहनेवाले पदार्थो के अध्ययन में भी बहुत लाभप्रद हुई है। इसमें जो रीति अपनाई गई है वह इस प्रकार है: गैस अथवा वाष्प को प्रधार (जेट) के रूप में इलेक्ट्रान किरणावालि के मार्ग में छोड़ा जाता है, जिसमें इलेक्ट्रान उससे टकराने के बाद ही फोटो पट्टिका पर गिरें। इस पट्टिका पर इलेक्ट्रानों का वैसा ही प्रभाव पड़ता है जैसा प्रकाश का। इन पदार्थो की विशेष विवर्तन आकृतियों फोटो पट्टिका पर कुछ ही सेकेंडों में अंकित हो जाती हैं, जबकि एक्स-किरणों को बहुधा कई घंटों की आवश्यकता पड़ती है। विवर्तन आकृतियों से कार्बन-क्लोरीन के बंधन में परमाणुओं के बीच की दूरी 1.76x10<sup>-8</sup> सें.मी. के बराबर निकली है। यह मान उस मान के पर्याप्त अनुकूल है जो अधिकांश संतृप्त कार्बनिक क्लोराइडों में कार्बन-क्लोरीन के बंधन में देखा गया है।
 
== व्यावहरिक प्रयोग ==
इलेक्ट्रान विवर्तन की क्रिया का प्रयोग पदार्थों के, विशेष कर महीन झिल्लिकाओं एवं जटिल अणुओं के, अतिरिक्त ढाँचे के अध्ययन में किया जाता है। इसका प्रयोग चर्बी, तेल, ग्रैफ़ाइट आदि द्वारा घर्षण कम करने की जाँच में किया गया है। संक्षारण, विद्युल्लेपन, संधान (वेÏल्डग) आदि क्षेत्रों में यह अत्यंत महत्पूर्ण हो गया है। इन विभिन्न उपयोगों के कारण इलेक्ट्रान-विवर्तन-उपकरण आधुनिक इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी के साथ अधिकतर जोड़ दिए जाते हैं।
 
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [http://rcl.physik.uni-kl.de Remote experiment on electron diffraction] (choose English and then "Labs")
* [[Jmol]]-mediated image/diffraction [http://newton.umsl.edu/run//nano/unknown173.html analysis of an unknown]
74,334

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