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प्रकाशन का शाब्दिक अर्थ है 'प्रकाश में लाना'। यह [[संस्कृत]] की "प्रकश" धातु से बना है, जिसका अर्थ है फलाना, विकसित करना। उसी से बना 'प्रकाशन', जिसका शाब्दिक अर्थ हुआ फैलाने या विकसित करने की क्रिया। आधुनिक संदर्भ में इसकी परिभाषा यों की जा सकती है : लिखित विषय का चुनाव, मुद्रण, और वितरण। प्रकाशन का कार्य आज के युग में मुद्रण और कागज पर पूर्णत: निर्भर है, यद्यपि यह दोनों ही चीज़ों से पुराना है।
 
== इतिहास ==
लकड़ी के ब्लाकों से छपाई करने का अविष्कार नवीं शताब्दी के पूर्वार्धं में चीन में हुआ था। टाइप से छपाई का आरंभ भी वहीं शताब्दी के मध्य में हुआ था। लेकिन इसे अधिक महत्व नहीं दिया गया। यही सोचा गया कि पांडुलिपियों की नकल करते समय अच्छे कातिबों से जो गलतियाँ हो जाती हैं, वे मुद्रण में नहीं होंगी। यूरोप में, टाइप से छपाई के काम का आरंभ 15वीं शताब्दी के मध्य में आरंभ हुआ। किंतु चीन की भाँति वहाँ भी मुद्रण का प्रयोग केवल धार्मिक ग्रंथों और शासकीय कागजों को शुद्ध छापने में किया गया। एशिया या यूरोप, कहीं भी सोच तक नहीं गया कि मुद्रण की सहायता से राजनीतिक, बौद्धिक या धार्मिक साहित्य का विस्तृत प्रसार किया जा सकता है। पूर्व और पश्चिम दोनों में सदियों तक धार्मिक संस्थाएँ, सरकार, विश्वविद्यालय तथा अन्य शक्तिशालिनी संस्थाएँ अपने ही विचारों और सूचनाओं के प्रसार में मुद्रण का उपयोग करती रहीं और उन्होंने ज्ञान के प्रसार में उसके उपयोग का निरंतर विरोध किया। बाद में, आखिरकार आत्मिक एवं बौद्धिक विकास संबंधी अथवा धार्मिक एवं वैज्ञानिक साहित्य के प्रकाशन में मुद्रण का शत प्रतिशत सहयोग मिलने ही लगा।
 
=== सबसे पहली पुस्तकें ===
मुद्रण के आविष्कार से पहले प्रकाशन का कार्य कातिब या प्रशिक्षित गुलाम किया करते थे। वे चर्मपत्र पर किसी पांडुलिपि की अनेक प्रतिलिपियाँ लिखते रहते थे। टालेमी वंश के शासनकाल में मिस्र में, तथा यूनान और गणतांत्रिक रोम के प्रमुख नगरों में चर्मपत्र तैयार करनेवाली अनेक उद्योगशालाएँ खुल गई थीं, और चर्मपत्र पर प्राचीन साहित्य, धर्म और कानून संबंधी श्रेष्ठ कृतियों की प्रतिलिपियाँ तैयार की जाती थीं। रोमी साम्राज्य में तथा पश्चिमी देशों के राजा, राजकुमार, पार्लिमेंट, पादरी आदि अक्सर प्रकाशन पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते थे या करने की कोशिश करते थे और लंबे समय के लिये प्रकाशनकार्य बंद हो जाता था। फिर भी ये पुराने प्रयास आज की प्रकाशन संस्थाओं के ही आदि रूप थे। उनका काम था बड़े पैमाने पर छापने के लिये पांडुलिपियों का चुनाव करना, उनके लिये लेखकों को पुस्तकों की बिक्री से पहले अग्रिम पारिश्रमिक देना, अलग अलग पांडुलिपियों के संस्करण का आकार प्रकार तथा मूल्य निर्धारित करना और बाजार तैयार करना जहाँ, अनेक प्रयत्न करके पुस्तकों को लाभ सहित बेचा जा सके। वे अत्याधुनिक अर्थो में भी प्रकाशक ही थे, यद्यपि उनके उत्पादन "पुस्तकें" नहीं थीं।
 
चर्मपत्र के समान "कोडेक्स" भी हाथ से लिखे जाते थे। मठों के "लेखन कक्षों" में अपने काम के प्रति उत्सर्ग की भावना रखनेवाले कातिब दिन भर प्राचीन ग्रंथों के पृष्ठ के पृष्ठ नकल किया करते थे। उन्हीं के कारण प्राचीन ग्रंथों तथा बाइबिल की रक्षा हो सकी। (आग लगन के भय से मठों में रात को काम नहीं होता था।) "कातिब अपना काम खत्म कर चुकता था तो एक दूसरा आदमी उसे मूल से मिलाकर संशोधित करता था", डगलस सी. मेकमर्टी ने लिखा है, "फिर उन पन्नो को लाल स्याही से लिखनेवो कातिब के पास भेज दिया जाता था जो मुखपृष्ठ, शीर्षक, अध्याय संख्या तथा दूसरे नाम, टिप्पणियाँ आदि जोड़ देता था। यदि पुस्तक में चित्र जाने को होते थे तो उसे चित्रकार के पास भेज दिया जाता था। उसके काम की समाप्ति के बाद पुस्तक जिल्द बँधने के लिये तैयार हो जाती थी।"
 
=== आधुनिक यूरोप में मुद्रण और प्रकाशन ===
[[Fileचित्र:The Caxton Celebration - William Caxton showing specimens of his printing to King Edward IV and his Queen.jpg|thumb|right|गटेनबर्ग प्रेस, 15 वीं सदी]]
प्रकाशन का प्रारंभ मुद्रणकला के प्रारंभ से पहले ही हो चुका था, किंतु 15वीं शताब्दी में योआन गटेनबर्ग द्वारा वर्णमाला के अक्षरों के टाइपों के आविष्कार के बाद प्रकाशन की बड़ी उन्नति हुई। गटेनबर्ग अक्षरों के टाइपों का सफल प्रयोग न कर सका। फिर भी उसके युगांतरकारी आविष्कार के बाद उसका नगर मेंज (जर्मनी) यूरोप महाद्वीप का निसंदिग्ध प्रकाशन केंद्र बन गया। इसके बाद पश्चिमी संसार मुद्रण और प्रकाशन के विकास में जर्मनी ही अगुआ रहा। सन् 1500 से पहले यूरोप में 30000 पुसतकें छप चुकी थीं। इनमें से दो तिहाई से अधिक का प्रकाशन जर्मनी के विभिन्न विद्याकेंद्रों लाइपपजिग, कोलोन, बैसेल, न्यूरेमबर्ग, औग्सबर्ग और स्कासबर्ग में हुआ था। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि इन्हीं नगरों में प्रशिक्षित जर्मनों ने ही इटली में आधुनिक मुद्रण और प्रकाशन की शुरुआत सन् 1460 के आसपास की, जहाँ इन दोनों कलाओं ने पुनरुत्थानकालीन संस्कृति और व्यापार के विकास में बड़ा योग दिया। इसी प्रकार, इटली में प्रशिक्षित जर्मन ही 16वीं सदी के अंत में मुद्रण प्रकाशन उद्योग को फ्रांस में ले गये।
 
18वीं सदी के बाद कापीराइट के विकास का स्पष्ट अर्थ है पेशे के रूप में लेखन व्यवसाय और व्यवसाय के रूप में प्रकाशन का विकास। कानून उनकी सुरक्षा करके दोनों को बढ़ावा देता है। लेकिन इसका अर्थ कुछ और भी है। यह जनसाधारण की बढ़ती हुई ज्ञानपिपासा और अध्ययनप्रियता का प्रतीक भी है।
 
=== समकालीन प्रकाशन की ओर ===
साहित्यिक कृतियों का बाजार बढ़ता जा रहा था। मुद्रक इसका सामना करने में सफल न थे। उन्हें पुस्तकविक्रेताओं से धन की माँग करनी पड़ती थी। धीरे धीरे 18वीं सदी में पुस्तकविक्रेता ही प्रकाशक बन बैठे। उस समय तक जनता में, विशेष रूप से इंगलैंड में, पुस्तकप्रेम बहुत बढ़ गया था। लोकप्रिय पुस्तकों (बाइबिल, टीकाओं, पाठ्य पुस्तकों, कोश आदि) की बिक्री बहुत बढ़ गई थी। इस नई माँग को पूरा करने के लिये गश्ती पुस्तकालयों की स्थापना 1720 में हुई। नए लेखकों के पाठकों की संख्या बढ़ने लगी और उन्होंने अपने "संरक्षकों" (पेट्रनों) से अलग होना शु डिग्री कर दिया। 18वीं सदी क कांस्टेबिल और लांगमैंस जैसे पुस्तकविक्रेता पुस्तक व्यवसाय के केंद्र बन गए। कुछ ही दशकों बाद, अमरीका में हार्पर, स्क्रिबनर, डटन और लिंटिल ब्राउन का आविर्भाव हुआ।
 
20 सदी के तीसरे दशक में इंगलैंड, अमरीका, जर्मनी और फ्रांस में और नए नए प्रकाशकों का आविर्भाव हुआ। वे केवल कथासाहित्य, जीवनसाहित्य, इतिहास, संस्मरण, सामान्य मनोविज्ञान आदि विषयों की पुस्तकों का प्रकाशन करने लगे। उन्हें व्यापारी प्रकाशक का नाम दिया गया। अनेक पुराने ओर कई नए प्रकाशन संस्थानों में बाइबिल, धार्मिक पुस्तकों, स्कूल और कालेज की पाठ्य पुस्तकों, डाक्टरी पुस्तकों के विभाग बने रहे, जिनपर प्रकाशन उद्योग की आधारशिला रखी हुई है। लेकिन सबसे नया प्रचलन था व्यापारी प्रकाशक बनने का। विशेषज्ञता का युग आरंभ हो गया, विशेष रूप से अमरीका में, जहाँ उद्योग पुरानी परंपराओं से इतनी बुरी तरह आच्छादित न था और नए प्रयोगों के लिये गुजाइश थी।
 
=== विशेषज्ञता का युग ===
प्रकाशन व्यवसाय बढ़ता गया। प्रकाशित पुस्तकों की संख्या बढ़ती गई। एक उदाहरण लें। इंगलैंड में 18वीं सदी के पूर्वार्ध में एक वर्ष में प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 93 थी। 20वीं सदी के पहले 25 सालों में प्रति वर्ष औसत 600 किताबें प्रकाशित हुई। इसी वृद्धि से मालूम होता है कि विशेषज्ञता का युग क्यों आया।
 
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