"लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर": अवतरणों में अंतर

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|वास्तुकला = [[हिन्दू]]
|स्थान=[[रायपुर]] से १२० कि.मी. संस्कारधानी [[शिवरीनारायण]] से ३ कि.मी.
}}'''लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर''' [[छत्तीसगढ़]] की राजधानी [[रायपुर]] से १२० कि.मी. तथा संस्कारधानी [[शिवरीनारायण]] से ३ कि.मी. की दूरी पर बसे खरौद नगर में स्थित है। यह नगर प्राचीन छत्तीसगढ़ के पाँच ललित कला केन्द्रों में से एक हैं और मोक्षदायी नगर माना जाने के कारण इसे ''छत्तीसगढ़ की काशी'' भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ रामायण कालीन शबरी उद्धार और लंका विजय के निमित्त भ्राता लक्ष्मण की विनती पर श्रीराम ने खर और दूषण की मुक्ति के पश्चात 'लक्ष्मणेश्वर महादेव' की स्थापना की थी।<ref>{{cite web |url= http://www.srijangatha.com/2007-08/August07/pustkayan-a.ikesharwani.htm|title= गुप्त से प्रकाशमान होता शिवरीनारायण|accessmonthday=[[३१ मार्च]]|accessyear=[[२००९]]|format= एचटीएम|publisher=सृजनगाथा|language=}}</ref>
 
यह मंदिर नगर के प्रमुख देव के रूप में पश्चिम दिशा में पूर्वाभिमुख स्थित है। मंदिर में चारों ओर पत्थर की मजबूत दीवार है। इस दीवार के अंदर ११० फीट लंबा और ४८ फीट चौड़ा चबूतरा है जिसके ऊपर ४८ फुट ऊँचा और ३० फुट गोलाई लिए मंदिर स्थित है। मंदिर के अवलोकन से पता चलता है कि पहले इस चबूतरे में बृहदाकार मंदिर के निर्माण की योजना थी, क्योंकि इसके अधोभाग स्पष्टत: मंदिर की आकृति में निर्मित है। चबूतरे के ऊपरी भाग को परिक्रमा कहते हैं। मंदिर के गर्भगृह मे एक विशिष्ट शिवलिंग की स्थापना है। इस शिवलिंग की सबसे बडी विशेषता यह है कि शिवलिंग मे एक लाख छिद्र है इसीलिये इसका नाम लक्षलिंग भी है। सभा मंडप के सामने के भाग में सत्यनारायण मंडप, नन्दी मंडप और भोगशाला हैं।<ref>{{cite web |url=http://ashvinik.blogspot.com/2008/01/blog-post_26.html|title=लखनेश्वर दर्शन करि कंचन होत शरीर ... |accessmonthday=[[३१ मार्च]]|accessyear=[[२००९]]|format= एचटीएमएल|publisher=अश्विनी|language=}}</ref>
मूल मंदिर के प्रवेश द्वार के उभय पार्श्व में कलाकृति से सुसज्जित दो पाषाण स्तम्भ हैं। इनमें से एक स्तम्भ में रावण द्वारा कैलासोत्तालन तथा अर्द्धनारीश्वर के दृश्य खुदे हैं। इसी प्रकार दूसरे स्तम्भ में राम चरित्र से सम्बंधित दृश्य जैसे राम-सुग्रीव मित्रता, बाली का वध, शिव तांडव और सामान्य जीवन से सम्बंधित एक बालक के साथ स्त्री-पुरूष और दंडधरी पुरुष खुदे हैं। प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना की मूर्ति स्थित है। मूर्तियों में मकर और कच्छप वाहन स्पष्ट दिखाई देते हैं। उनके पार्श्व में दो नारी प्रतिमाएँ हैं। इसके नीचे प्रत्येक पार्श्व में द्वारपाल जय और विजय की मूर्ति है। लक्ष्मणेश्वर महादेव के इस मंदिर में सावन मास में श्रावणी और महाशिवरात्रि में मेला लगता है।<ref>{{cite web |url=http://www.cgnews.in/permanent/Chhattisgarh/CULTURE/culture-mela-madai.htm|title=छत्तीसगढ़ के मेला और मड़ई
|accessmonthday=[[३१ मार्च]]|accessyear=[[२००९]]|format= एचटीएम|publisher=छत्तीसगढ़ न्यूज़|language=}}</ref>
== किंवदंती ==
मान्यता है कि मंदिर के गर्भगृह में श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के द्वारा स्थापित लक्ष्यलिंग स्थित है। इसे लखेश्वर महादेव भी कहा जाता है क्योंकि इसमें एक लाख लिंग है। इसमें एक पातालगामी लक्ष्य छिद्र है जिसमें जितना भी जल डाला जाय वह उसमें समाहित हो जाता है। इस लक्ष्य छिद्र के बारे में कहा जाता है कि मंदिर के बाहर स्थित कुंड से इसका सम्बंध है। इन छिद्रों में एक ऐसा छिद्र भी है जिसमें सदैव जल भरा रहता है। इसे ''अक्षय कुंड'' कहते हैं। स्वयंभू लक्ष्यलिंग के आस पास वर्तुल योन्याकार जलहरी बनी है। मंदिर के बाहर परिक्रमा में राजा खड्गदेव और उनकी रानी हाथ जोड़े स्थित हैं। प्रति वर्ष यहाँ महाशिवरात्रि के मेले में शिव की बारात निकाली जाती है। छत्तीसगढ़ में इस नगर की ''काशी'' के समान मान्यता है।<ref>{{cite web |url=http://aarambha.blogspot.com/2008/03/lakhaneshwar.html|title=सिंदूरगिरि के बीच में, लखनेश्वर भगवान|accessmonthday=[[३१ मार्च]]|accessyear=[[२००९]]|format= एचटीएमएल|publisher=आरंभ|language=}}</ref> कहते हैं भगवान राम ने इस स्थान में खर और दूषण नाम के असुरों का वध किया था इसी कारण इस नगर का नाम खरौद पड़ा।<ref>{{cite web |url=http://tapeshjainji.blogspot.com/2006/11/blog-post_5734.html|title=अद्भुत और आश्चर्यजनक यात्रा|accessmonthday=[[३१ मार्च]]|accessyear=[[२००९]]|format= एचटीएमएल|publisher=छत्तीसगढःचित्र-विचित्र|language=}}</ref>
 
== संदर्भ ==
<references/>
{{छत्तीसगढ़ राज्य के संरक्षित स्मारक}}
[[श्रेणी:छत्तीसगढ़]]
[[श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना]]
[[श्रेणी:शिव मंदिर‎मंदिर]]
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