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तथ्यों के मुताबिक भीकाजी हालांकि अहिंसा में विश्वास रखती थीं लेकिन उन्होंने अन्यायपूर्ण हिंसा के विरोध का आह्वान भी किया था। उन्होंने [[स्वराज]] के लिए आवाज उठाई और नारा दिया− ''आगे बढ़ो, हम भारत के लिए हैं और भारत भारतीयों के लिए है।''
 
== जीवन परिचय ==
भीकाजी कामा का जन्म 24 सितम्बर 1861 को [[बम्बई]] में एक [[पारसी]] परिवार में हुआ था। उनमें लोगों की मदद और सेवा करने की भावना कूट−कूट कर भरी थी। वर्ष 1896 में मुम्बई में [[प्लेग]] फैलने के बाद भीकाजी ने इसके मरीजों की सेवा की थी। बाद में वह खुद भी इस बीमारी की चपेट में आ गई थीं। इलाज के बाद वह ठीक हो गई थीं लेकिन उन्हें आराम और आगे के इलाज के लिए यूरोप जाने की सलाह दी गई थी। वर्ष 1902 में वह इसी सिलसिले में [[लंदन]] गईं और वहां भी उन्होंने भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के लिए काम जारी रखा। भीकाजी ने वर्ष 1905 में अपने सहयोगियों [[विनायक दामोदर सावरकर]] और [[श्यामजी कृष्ण वर्मा]] की मदद से भारत के ध्वज का पहला डिजाइन तैयार किया था।
 
भीकाजी द्वारा लहराए गए झंडे में देश के विभिन्न धर्मों की भावनाओं और संस्कृति को समेटने की कोशिश की गई थी। उसमें इस्लाम, हिंदुत्व और बौद्ध मत को प्रदर्शित करने के लिए हरा, पीला और लाल रंग इस्तेमाल किया गया था। साथ ही उसमें बीच में [[देवनागरी लिपि]] में [[वंदे मातरम]] लिखा हुआ था। जर्मनी में फहराया गया वह झंडा वर्तमान में [[पुणे]] की मराठा एवं केसरी लाइब्रेरी में रखा हुआ है।
 
== संदर्भ ==
<references/>
 
== बाहरी कड़ियाँ ==
* [http://www.prabhasakshi.com/ShowArticle.aspx?ArticleId=120813-102447-320010 निर्भीकता के लिए जानी जाती थीं मैडम कामा]
 
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