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'''रानाबाई''' अथवा '''वीराँगना रानाबाई''' के नाम से प्रसिद्ध [[जाट]] वीरबाला गांव [[हरनावा]], [[राजस्थान]] के [[नागोर]] जिले की निवासी थी। वीराँगना रानाबाई का सन् 1543 में चौधरी जालमसिंह घाणा के घर में जन्म हुआ।
<center><big>रानाबाई के पद </big></center>
'''रानाबाई (1504-1570)''' एक जाट वीरबाला और एक हिंदू कवयित्री थी । जिनकी रचनाएं राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में लोकप्रिय हैं । वह राजस्थान की दूसरी मीरा के रूप में जानी जाती है । वह संत चतुर दास (जो कि खोजीजी के नाम से भी जाने जाते हैं) की शिष्या थीं । रानाबाई ने राजस्थानी भाषा में कई कविताओं की रचना की थी । सारी रचनाएँ सामान्य लय मे रची गई हैं । उनके गानों के संग्रह को पदावली कहा जाता है । उनके द्वारा रचित पदों के गायन का माध्यम ठेठ राजस्थानी था । रानाबाई के द्वारा लिखे गए कुछ पद प्रस्तुत है-
'''Ranabai (रानाबाई)''' (1504-1570) was a Jat warrior girl and a Hindu mystical poetess whose compositions are popular throughout [[Marwar]] region of [[Rajasthan]], [[India]]. She is known as 'Second Mira of [[Rajasthan]]". She was a disciple of ''sant'' Chatur Das also known as '''Khojiji'''. Ranabai composed many poems (''padas'') in [[Rajasthani Language]]. <ref>[[Dr Pema Ram]] & Dr Vikramaditya Chaudhary, Jaton ki Gauravgatha (जाटों की गौरवगाथा), First Edition 2004, Publisher - Rajasthani Granthagar, Jodhpur, Ph 0291-2623933, p. 40-41</ref> Ranabai's poem is traditionally called a ''pada'', a term used by the 14th century preachers for a small spiritual song. This is usually composed in simple rhythms and carries a refrain within itself. Her collection of songs is called the Padavali. The typicality of Indian love poetry of those days was used by [[Ranabai]] but as an instrument to express her deepest emotions felt for her Gurudev Khojiji and ishta-devata Gopinath. Her typical medium of singing was [[Rajasthani]]. Some of the ''padas'' by [[Ranabai]] are produced below.
 
पन्द्रह सौ इकसठ प्रकट, आखा तीज त्यौहार
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