"बिहार का मध्यकालीन इतिहास" के अवतरणों में अंतर

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* [[विद्यापति]] का रचित ग्रन्थ [[कीर्तिलता]] के अनुसार कर्नाट वंशीय शासक हरिसिंह के पश्‍चात मिथिला में राजनीतिक अराजकता का माहौल था।
 
* मुस्लिम आक्रमण से पूर्व बिहार दो राजनीतिक क्षेत्रीय भाग में विभक्‍त था- दक्षिण बिहार का क्षेत्रीय भाग और उत्तर बिहार का क्षेत्रीय भाग।
 
दक्षिण बिहार का क्षेत्रीय भाग-यह भाग दक्षिण बिहार का क्षेत्र था। जिसमें मगध राज्य मुख्य था।
दोनों क्षेत्रीय भाग में कोई मजबूत शासक नहीं था। और सभी क्षेत्रो में छोटे-छोटे राजा/सामन्त स्वतन्त्र सत्ता स्थापित कर चुके थे। चाल वंशीय शासन व्यवस्था भी धीरे-धीरे बिहार में कमजोर होती जा रही थी।वे बंगाल तक ही सीमित हो चुके थे।
 
== पाल वंश ==
पाल वंश के समय (१०५५-८१ ई.) तक मगध में मानस शासक विग्रहराज स्वतन्त्र हो गया। पाल वंश का बिहार में गहड़वाल वंश का अधिकार (११२६ से ११८८ई. तक) हो गया था।
 
११९७-९८ ई. के पश्‍चात्‌ [[बख्तियार खिलजी]] ने [[मगध]] क्षेत्र में प्रथम आक्रमण किया और लूटा। इसके पश्‍चात उसने आधुनिक [[बिहार शरीफ]] (ओदन्तपुरी) पर आक्रमण किया। ओदन्तपुरी विश्‍वविद्यालय के लूटने के बाद नालन्दा विश्‍वविद्यालय को जलाकर तहस-नहस कर दिया। इसी समय उसने आधुनिक बख्तियारपुर शहर को बसाया। इसी दौरान बिहार शरीफ तुर्कों का केन्द्र के रुप में उभरा।
 
== बौद्ध विहार ==
* इतिहासकारों के अनुसार इस क्षेत्र में बौद्ध विहारों की संख्या काफी थी, अतः तुर्कों ने इसे विहारों का प्रदेश कहा है। उक्‍त क्षेत्र पहले बिहार शरीफ कहलाया।
 
* बौद्ध धर्म में बौद्ध भिक्षुओं के ठहरने के स्थान को विहार कहते हैं। यही विहार जो तुर्कों द्वारा दिया गया है। वह बाद में बिहार हो गया।
 
* बिहार शब्द विहार का अपभ्रंश रुप है। यह शब्द बौद्ध (मठों) विहारों कि क्षेत्रीय बहुलता के कारण (बिहार) तुर्कों द्वारा दिया हुआ नाम है।
 
बिहार का अर्थ- "बौद्ध भिक्षुओं का निवास"
इस प्रकार बिहार पर खिलजी राजवंश का प्रभाव कम और सीमित क्षेत्रों पर रहा। (जो अवध का गवर्नर था) इवाज को गिरफ्तार कर हत्या कर दी। अवध, बिहार और लखनौती को मिलाकर एक कर दिया। १२२७-२९ ई. तक उसने शासन किया। १२२९ ई. में उसकी मृत्यु के बाद दौलतशाह खिलजी ने पुनः विद्रोह कर दिया,परन्तु इल्तुतमिश ने पुनः लखनौती जाकर वल्ख खिलजी को पराजित कर दिया तथा बिहार और बंगाल को पुनः अलग-अलग कर दिया।उसने अलालुद्दीन जानी को बंगाल का गवर्नर एवं सैफूद्दीन ऐबक को बिहार का राज्यपाल नियुक्‍त किया बाद में तुगान खाँ बिहार का राज्यपाल बना। उसके उत्तराधिकारियों में क्रमशः रुकनुद्दीन फिरोजशाह, रजिया मुइज्जुद्दीन, ब्रह्यराय शाह एवं अलाउद्दीन मसूद शाह आदि शासकों ने लखनौती एवं बिहार के तथा दिल्ली के प्रति नाममात्र के सम्बन्ध बनाये रखे।
 
== [[बलबन]] ==
जब दिल्ली का सुल्तान बलबन बना तब बिहार को पुनः बंगाल से अलग कर (गया क्षेत्र) दिल्ली के अधीन कर दिया, जिसकी स्पष्टता हमें वनराज राजा की गया प्रशस्ति से मिलती है। लखनौती शासक जो स्वतन्त्र हो गये थे उन्होने बलबन की अधीनता भी स्वीकार की।
 
१२वीं शताब्दी में चेरो राजवंश का विस्तार बनारस के पूरब में पटना तक तथा दक्षिण में बिहार शरीफ एवं गंगा तथा उत्तर में कैमूर तक था। दक्षिण भाग में चेरो सरदारों का एक मुस्लिम धर्म प्रचारक मंसुस्‍हाल्लाज शहीद था। शाहाबाद जिले में चार चेरो रान्य में विभाजित था-
 
* धूधीलिया चेरो- यह शाहाबाद के मध्य में स्थित प्रथम राज्य था, जिसका मुख्यालय बिहियाँ था।
 
* भोजपुर- यह शाहाबाद का दूसरा राज्य था, जिसका मुख्यालय तिरावन था। यहाँ का राजा सीताराम था।
 
* तीसरा राज्य का मुख्यालय चैनपुर था, जबकि देव मार्केण्ड चौथा राज्य का मुख्यालय था। इसमें चकाई तुलसीपुर रामगठवा पीरी आदि क्षेत्र सम्मिलित थे। राजा फूलचन्द यहाँ का राजा था। जिन्होंने जगदीशपुर में मेला शुरु किया।
 
* सानेपरी चेरा जो सोन नदी के आस-पास इलाकों में बसे थे जिनका प्रमुख महरटा चेरो था। इसके खिलाफ शेरशाह ने अभियान चलाया था।
 
भोजपुर चेरो का प्रमुख कुकुमचन्द्र कारण था। चेरो का अन्तिम राजा मेदिनीराय था। मेदिनीराय की मृत्यु के पश्‍चात्‌ उसका पुत्र प्रताप राय राजा बना। इसके समय में तीन मुगल आक्रमण हुए अन्ततः १६६० ई. में इन्हें मुगल राज्य में मिला लिया गया।
नूहानी सरदारों ने उनकी हत्या के लिए असफल कोशिश की और जब शेर खाँ ने उनको नुसरतशाह के विरुद्ध युद्ध कर दिया और पराजित कर दिया। इस विजय ने बंगाल के सुल्तान की महत्वाकांक्षी योजना को विफल कर दिया। बाबर के समय शेर खाँ हमेशा अधीनता का प्रदर्शन करता रहा था परन्तु हुमायूँ के समय में अपना रुख बदलकर चुनार गढ़ को लेकर प्रथम बार चुनार लेने की चेष्टा की तब उसे महमूद लोदी के प्रत्याक्रमण के कारण वहाँ से जाना पड़ा। उसने हिन्दूबेग को सेना भेजकर शेर खाँ ने दुर्ग देने से साफ इनकार कर दिया। फलतः एक युद्ध हुआ।
 
== [[चौसा का युद्ध]] ==
हुमायूँ के सेनापति हिन्दूबेग चाहते थे कि वह गंगा के उत्तरी तट से जौनपुर तक अफगानों को वहाँ से खदेड़ दे, परन्तु हुमायूँ ने अफगानो की गतिविधियों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। शेर खाँ ने एक अफगान को दूत बनाकर भेजा जिससे उसकी सेना की दुर्व्यवस्था की सूचना मिल गई। फलस्वरुप उसने अचानक रात में हमला कर दिया। बहुत से मुगल सैनिक गंगा में कूद पड़े और डूब गये या अफगानों के तीरों के शिकार हो गये। हुमायूँ स्वयं डूबते-डूबते बच गया। इस प्रकार चौसा का युद्ध में अफगानों को विजयश्री मिली।
 
जिस रणनीति को अपनाकर पानीपत के प्रथम युद्ध में अफगान की शक्‍ति को समाप्त कर दिया उसी नीति को अपनाकर शेरशाह ने हुमायूँ की शक्‍ति को नष्ट कर दिया । मुगलों की सेना चारों ओर से घिर गयी और पूर्ण पराजय हो गयी । हुमायूँ और उसके सेनापति आगरा भाग गये । इस युद्ध में शेरशाह के साथ ख्वास खाँ, हेबत खाँ, नियाजी खाँ, ईसा खाँ, केन्द्र में स्वयं शेरशाह, पार्श्‍व में बेटे जलाल खाँ और जालू दूसरे पार्श्‍व में राजकुमार आद्रित खाँ, कुत्बु खाँ, बुवेत हुसेन खाँ, जालवानी आदि एवं कोतल सेना थी । दूसरी और हुमायूँ के साथ उसका भाई हिन्दाल व अस्करी तथा हैदर मिर्जा दगलात, यादगार नसरी और कासिम हुसैन सुल्तान थे ।
 
== शेरशाह का राज्याभिषेक ==
शेरशाह कन्‍नौज युद्ध की विजय के बाद वह कन्नौज में ही रहा और शुजात खाँ को ग्वालियर विजय के लिए भेजा । वर्यजीद गुर को हुमायूँ को बन्दी बनाकर लाने के लिए भेजा । नसीर खाँ नुहानी को दिल्ली तथा सम्बलपुर का भार सौंप दिया ।
 
अन्ततः शेरशाह का १० जून, १५४० को आगरा में विधिवत्‌ राज्याभिषेक हुआ । उसके बाद १५४० ई. में लाहौर पर अधिकार कर लिया । बाद में ख्वास खाँ और हैबत खाँ ने पूरे पंजाब पर अधिकार कर लिया । फलतः शेरशाह ने भारत में पुनः द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की । इतिहास में इसे सूरवंश के नाम से जाना जाता है । सिंहासन पर बैठते समय शेरशाह ६८ वर्ष का हो चुका था और ५ वर्ष तक शासन सम्भालने के बाद मई १५४५ ई. में उसकी मृत्यु हो गई ।
 
== द्वितीय अफगान साम्राज्य ==
शेरशाह ने उत्तरी भारत (बिहार) में सूर वंश तथा द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की थी । इस स्थापना में उसने अनेकों प्रतिशोध एवं युद्धों को लड़ा ।
 
शेरशाह ने शुजात खाँ को रूपवास में, दरिया खाँ को उज्जैन में, आलम खाँ को सारंगपुर में, पूरनमल को रायसीन में तथा मिलसा को चन्देरी में नियुक्‍त किया । शेरशाह ने बाद में शुजात खाँ को सम्पूर्ण मालवा का हाकिम नियुक्‍त किया और १२ हजार सैनिक रखने की अनुमति दे दी ।
 
=== रणथम्भौर पर अधिकार ===
शेरशाह १५४३ ई. में रणथम्भौर होता हुआ आया, फलतः वहाँ के हाकिम ने अपनागढ़ पर उनकी अधीनता स्वीकार की । शेरशाह ने अपने बड़े पुत्र आदित्य को वहाँ का हाकिम नियुक्‍त किया ।
 
शेरशाह ने सम्राट बनने से पूर्व विभिन्‍न स्थानों पर अपनी सुविधा और फायदे को ध्यान में रखकर विश्‍वासघात किया था । पूरनमल को एक सम्राट की हैसियत से आश्‍वासन देकर खुले मैदान में हराने में सक्षम होते हुए भी उलेमा की राय का बहाना बनाकर जो विश्‍वासघात किया वह उसके यश को सदा के लिए कलंकित करता रहेगा । फलतः बिना किसी हानि के राजपूतों का नाश हुआ और मिलसा, रायसीन तथा चंदेरी पर शेरशाह का अधिकार हो गया ।
 
== कालिंजर युद्ध ==
यह शेरशाह का अन्तिम युद्ध था । यह युद्ध चन्देल राजपूतों के साथ हुआ । भाटा के राजा वीरभानु ने हुमायूँ की सहायता की थी, जिससे शेरशाह ने एक दूत वीरभानु के पास भेज दिया । वीरभानु डरकर कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चन्देल की शरण में चला गया । शेरशाह ने कीर्तिसिंह से वीरभानु की माँग की जिसे उसने अस्वीकार कर दिया । फलतः शेरशाह ८०,००० घुड़सवार, २,००० हाथी और अनेक तोपों के साथ कालिंजर पर आक्रमण कर दिया । उसने अपने बेटे आदित्य खाँ को आदेश दिया कि वह रणथम्भौर, अजमेर, बयाना और निकटवर्ती प्रदेश पर कड़ी नजर रखे । पटना स्थित जलाल खाँ को आज्ञा भेजी कि वह पूरब की ओर से बघेल चन्देल राज्य को घेर ले । यह व्यवस्था करके उसने कालिंजर का घेरा डाला । कीर्तिसिंह और शेरशाह के साथ छः माह तक युद्ध चलता रहा । बड़ी तोपों के लिए सबाते और सरकोव (ऊँचे खम्भे) बनाये गये और उसके ऊपर से किले की दीवार पर गोलीबारी प्रारम्भ की गई । एक दिन शेरशाह अपने सैकों का निरीक्षण कर रहा था, उसने देखा कि जलाल खाँ जलवानी हुक्‍के (हुक्‍के-एक प्रकार के अग्निबाण, जो हाथ से फेंके जाते थे) तैयार कराये हैं और उसका प्रयोग करके दुर्ग के भीतर संकट उपस्थित करने की योजना बनाई है । शेरशाह ने स्वयं हुक्‍कों को फेंकना शुरू कर दिया । एक हुक्‍का किले की बाहरी दीवार से टकराकर उस ढेर पर आ गिरा जहाँ शेरशाह खड़ा था, तुरन्त एक भीषण ज्वाला प्रज्वलित हो उठी और शेरशाह बुरी तरह जल गया । शेरशाह की हालत बिगड़ने लगी और उनके सैनिक और सेनापति पास आकर दुःख प्रकट करने लगे ।
 
शेरशाह ने अपने अल्पकालीन शासनकाल में अनेक सार्वजनिक कार्य किये जो निम्न हैं-
 
=== शासन सुधार ===
शेरशाह ने एक जनहितकारी शासन प्रणाली की स्थापना की । शासन को सुविधाजनक प्रबन्ध के लिए सारा साम्राज्य को ४७ भागों में बाँट दिया, जिसे प्रान्त कहा जाता है । प्रत्येक प्रान्त में एक फौजदार था जो सूबेदार होता था । प्रत्येक प्रान्त सरकार, परगनों तथा गाँव परगने में बँटे थे । सरकार में प्रमुख अधिकारी होते थे-शिकदार-ए-शिकदारा तथा मुन्सिफ-ए-मुन्सिफा । प्रथम सैन्य अधिकारी होता था, जबकि दूसरा दीवानी मुकदमों का फैसला देता था ।
 
ऐसा माना जाता है कि शेरशाह बंगाल पर अधिकार करने के बाद वह बिहार में पटना आया । एक दिन वह गंगा किनारे पर खड़ा था तो उसे यह जगह सामरिक महत्व की ओर ध्यान गया, उसने एक किले का निर्माण कराया । मौर्यों के पतन के बाद पटना पुनः प्रान्तीय राजधानी बनी, अतः आधुनिक पटना को शेरशाह द्वारा बसाया माना जाता है ।
 
== भूमि व्यवस्था ==
शेरशाह द्वारा भूमि व्यवस्था अत्यन्त ही उत्कृष्ट था । उसके शासनकाल के भू-विशेषज्ञ टोडरमल खत्री था ।
 
शेरशाह ने भूमि सुधार के लिए अनेक कार्य किए । भूमि की नाप कराई, भूमि को बीघों में बाँटा, उपज का १/३ भाग भूमिकर के लिए निर्धारित किया, अनाज एवं नकद दोनों रू में लेने की प्रणाली विकसित कराई । पट्टे पर मालगुजारी लिखने की व्यवस्था की गई । किसानों की सुविधा दी गई कि वह भूमिकर स्वयं राजकोष में जमा कर सकता था ।
 
== सैन्य व्यवस्था ==
शेरशाह ने एक सशक्‍त एवं अनुशासित सैन्य व्यवस्था का गठन किया । सेना में लड़ाकू एवं निपुण अफगानों एवं राजपूतों को भर्ती किया, लेकिन ज्यादा से ज्यादा अफगान ही थे । सेना का प्रत्येक भाग एक फौजदार के अधीन कर दिया गया । शेरशाह ने घोड़ा दागने की प्रथा शुरू थी । उसके पास डेढ़ लाख घुड़सवार, २५ हजार पैदल सेना थी । वह सैनिकों के प्रति नम्र लेकिन अनुशासन भंग करने वाले को कठोर दण्ड दिया करता था ।
 
== न्याय व्यवस्था ==
शेरशाह की न्यासी व्यवस्था अत्यन्त सुव्यवस्थित थी । शेरशाह के शासनकाल में माल और दीवानी के स्थानीय मामले की सुनवाई के लिए दौरा करने वाले मुंसिफ नियुक्‍त किये गये । प्रधान नगरों के काजियों के अलावा सरकार में एक प्रधान मुंसिफ भी रहता था जिसे अपील सुनने तथा मुंसिफों के कार्यों के निरीक्षण करने का अधिकार था ।
 
उसने अनेकों भवनों जिसमें रोहतासगढ़, सहरसा का दुर्ग प्रसिद्ध दुर्ग हैं । इस प्रकार शेरशाह ने अल्प अवधि में बंगाल से सिंह तक जाने वाली ५०० कोस लम्बी ग्रांड ट्रंक सड़क का निर्माण किया । आगरा से बुहारनपुर तक, आगरा से बयाना, मारवाड़, चित्तौड़ तक एवं लाहौर से मुल्तान तक ये उपर्युक्‍त चार सड़कों का निर्माण किया । शेरशाह ने अनेक सरायों (लगभग १,७००) का निर्माण किया । सरायों की देखभाल शिकदार करता था ।
 
=== शेरशाह के उत्तराधिकारी ===
शेरशाह की मृत्यु के बाद उसका योग्य एवं चरित्रवान पुत्र जलाल खाँ गद्दी पर बैठा, लेकिन अपने बड़े भाई आदिल खाँ के रहते सम्राट बनना स्वीकार नहीं किया था । उसने अमीरों व सरदारों के विशेष आग्रह पर राजपद ग्रहण किया । गद्दी पर बैठते ही अपना नाम इस्लामशाह धारण किया और उसने आठ वर्षों तक शासन किया । इस्लामशाह के समय विद्रोह और षड्‍यन्त्र का दौर चला । उनकी हत्या के लिए अनेक बार प्रयास किया गया, लेकिन इस्लामशाह ने धीरे-धीरे लगभग सभी पुराने विश्‍वासी सेनापतियों, हाकिमों व अधिकारियों आदि जो सन्देह के घेरे में आते गये उनकी हत्या करवा दी । सुल्तान के षड्‍यन्त्र में एकमात्र रिश्तेदार शाला को छोड़ा गया ।
 
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