"बृहदीश्वर मन्दिर" के अवतरणों में अंतर

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* [http://bharat.gov.in/knowindia/brihadisvara.php बृहदेश्‍वर मंदिर - तंजौर]
* [http://mallar.wordpress.com/2010/08/10/ब्रिहदेश्वर-मंदिर-तंजाव/ वृहदेश्वर मंदिर, तंजावूर]
 
 
 
[[श्रेणी:तमिलनाडु के हिन्दू मन्दिर]]
[[श्रेणी:स्थापत्य]]
[[श्रेणी:तमिलनाडु]]
[[श्रेणी:शिव मंदिर]]
 
== <big>चिदम्बरम मन्दिर</big> ==
तमिलनाडू को मंदिरों का राज्य कहा जाता है। पूरे तमिलनाडू तथा दक्षिण भारत में अनेकोनेक बड़े मंदिर है जो अपने आप में अनूठी कला और संस्कृति कोसमेटे हुए है। हम यहां तमिलनाडू के अनोखे शिव मंदिर जो कि चिदम्बरम में है उसका उल्लेख कर रहे हैं। चिदम्बरम मंदिर तिरुची से 155 किमी. तथा कुम्माकोणम से 74 किमी तथा पौंडीचेरी से 78 किमी. की दूरी पर कुड्डालोर जिले में स्थित है। यह दक्षिण भारत के प्रमुख मंदिरों में से एक है।
 
चिदम्बरम शब्द का उद्गम चित्त से लिया गया मालूम होता है जिसका अर्थ होता है चेतना तथा अम्बरम का अर्थ होता है आकाश। यह चिता की ओर संकेत करता है। वेद और धर्म ग्रंथों के अनुसार इसे प्राप्त करना ही अंतिम उद्देश्य होता है।
चिदम्बरम की कथा भगवान शिव की थिलाई वनम में घुमने से शुरू होती है। वनम का अर्थ है जंगल और थिलाई वृक्ष वनस्पतिक नाम एक्सोकोरिया अगलोचा जो कि वृक्षों की एक प्रजाति है जो कि चिदंबरम के निकट पाई जाती है। थिलाई के जंगलों में साधुओं का समूह रहता था जो मानते थे कि मंत्रों अथवा जादुई शब्दों से देवताओं कोवश में किया जा सकता है। एक बार भगवान शिव साधारण भिक्षु (पित्चातंदर) के रूप में जंगल में भ्रमण करते है उनके पीछे-पीछे उनकी सहचरी भी चलती है जो मोहिणी रूप में विष्णु है। ऋषीगण व उनकी पत्नियां मोहक भिक्षुक व उनकी पत्नी पर मोहित हो जाते है। अपनी पत्नियों कोइस प्रकार मोहित देख ऋषिगण क्रोधित हो जाते है तथा मंत्रों से अनेकों नाग पैदा कर देते है। भिक्षुक रूप में भगवान उन्हें उठाकर आभूषण रूप में गले व शिखा आदि पर धारण कर लेते हैं फिर ऋषिगण क्रोधित होकर बाघ पैदा कर देते है जिनकी खाल निकाल कर भगवान चादर के रूप में अपनी कमर पर बांध लेते है, फिर सारी शक्ति लगाकर ऋषिगण शक्तिशाली राक्षस मुयालकन का आह्वान करते है जो अज्ञानता और अभिमान का प्रतीक होता है। भगवान उसकी पीढ पर चढ़ जाते हैं तथा आनंद पूर्वक तांडव करते हुए अपने असली रूप में आ जाते हैं। इस पर ऋषिगण अनुभव करते है कि वह देवता सत्य है और वे समर्पण कर देते हैं।
 
भगवान शिव की आनंद तांडव मुद्रा एक अत्यंत प्रसिद्ध मुद्रा है जो विश्व में अनेकों लोगों द्वारा पहचानी जाती है। यह ब्रह्मांडीय नृत्य मुद्रा हमें बताती है कि भरतनाट्यम नर्तक व नर्तकी कोकिस प्रकार नृत्य करना चाहिए।
इस मंदिर के 9 द्वार हैं जिनमें 4 पर ऊंचे गोपुर बने हैं (पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण) इनमें 7 स्तर है। पूर्व के गोपुर पर भरतनाट्यम की 108 कलाएं अंकित हैं (यह 11वीं सदी में चोल राजा द्वारा बनवाया गया) ये 9 द्वार मनुष्यों के 9 विवरों का संकेत करते हैं।
 
===== चितसभाई (पौनाम्बलम) =====
 
गर्भगृह हृदय का प्रतीक है यहां पांच सीढिय़ों द्वारा जाया जाता है इन्हें पंचाटचारा पदी कहते हैं। पंच यानि 5 अक्षरा शाश्वत शब्दांश सि वा, या, ना,म। पवित्र गर्भ गृह 28 खम्बों पर खड़ा है जो 28 आगमया भगवान शिव की पूजा की निर्धारित रीतियों का प्रतीक है। छत 64 धरनों के समूह पर आधारित है जो 64 कला का प्रतीक है। इसमें आने वाली आड़ी धरने असंख्य रुधिर कोशिकाओं का संकेत है। छत का निर्माण 21600 स्वर्ण टाइलों द्वारा किया गया है इन पर सि वा, या, ना,म लिखा है जो मानव द्वारा लिए गए श्वासों का प्रतीक है। यह स्वर्ण टाइले 72000 स्वर्ण कीलों की सहायता से लगाई गई है जो मनुष्य शरीर में उपस्थित नाडिय़ों की संख्या का प्रतीक है। छत के ऊपर 9 तांबे के कलश हैं जो ऊर्जा (शक्तियों) के 9 रूपों का प्रतीक है। अर्थ मण्डप में 6 खंबे है जो 6 शास्त्रों के प्रतीक है। अर्थमण्डप के साथ वाले मण्डप में 18 खंबे है जो 18 पुराणों का प्रतीक है। चित सभा की छत चार खंबों पर खड़ी है जो चार वेदों का प्रतीक है। यहां के मंदिर का रथ तमीलनाडू के सभी मंदिरों के रथ से सुंदर है नटराज भगवान एक वर्ष में दो बार इस पर बैठते हैं जिसे असंख्य भक्त खीचते हैं।
<big>कनक सभा :</big> यह चित सभई के ठीक सामने है जहां दैनिक पूजा की जाती है। चित सभा व कनक सभा की छतें स्वणीमण्रित है तथा उन्हें पौन्नबलम कहते हैं।
 
<big>नृत्यसभा:</big> मान्यता के अनुसार यहां भगवान शिव ने देवी काली के साथ नृत्य किया था। इसमें 56 खम्बे हैं। इसमें शिव का एक पांव ऊपर है एक नीचे। शिव चांदी जडि़त हैं।
 
<big>राजा सभा</big> : यह 1000 पिल्लरों का हाल कमल या सहस्त्रनाम योगिक चक्र का प्रतीक है। सहस्त्र चक्र योगिक क्रिया का सर्वोच्च बिन्दु है यहां ध्यान लगने से परमात्मा से मिलन की अवस्था कोप्राप्त किया जा सकता है।
-प्रवेश देने वाले गोपुरी की तुलना जो व्यक्ति अपने पैर के अंगूठे कोऊपर उठाकर अपनी पीठ के बल लेटा हो, से उसके चरणों की उपमा दी गई है।
 
-ध्वजास्तम्भ सुष्मना नाड़ी का प्रतीक है जो मूलाधार से उठती है और सहस्त्र (मस्तिष्क की शिखा) तक जाती है।
 
श्रीगोविंद राज स्वामी मंदिर भी चिदंबरम मंदिर में है। गोविंदराजा मंदिरा 1639 में चोल राजा द्वारा बनवाया गया था। गोविंदराज पेरुमल व उनकी सहचरी पुन्दरीगावाल्ली थाय्यर कहते है। यह भगवान विष्णु के 108 दिव्य स्थलों में एक है। मूल रूप में यह मंदिर भगवान श्री गोविंदराज स्वामी का निवास था तथा भगवान शिव अपनी सहचरी के साथ वहां आएं तथा दोनों ने भगवान विष्णु कोउनकी नृत्यस्र्पधा के निर्णायक बनने का अनुरोध पर (भगवान गोविंदराज जी) निर्णायक बने। दोनों में बराबरी का नृत्य प्रतिस्पर्धा चलती रही। भगवान शिव ने विजयी होने के लिए युक्ति लगाते हुए भगवान गोविंदराज से कहा कि वे एक पैर उठाकर नृत्य कर सकते है, महिलाओं कोयह मुद्रा नृत्यशास्त्र के अनुसार वर्जित थी इसीलिए जब अतत: भगवान शिव जब इस मुद्रा में आए तो पार्वती जी ने हार स्वीकार कर ली इसीलिए इस स्थान पर भगवान शिव की मूर्ति नृत्य अवस्था में है। भगवान गोविंदराजास्वामि इस प्रतिस्पर्धा के निर्णयकत्र्ता व साक्षी दोनों थे। यहां पर भगवान विष्णु शेषशेय्या पर लेटे हुए दर्शन देते हैं।
 
राजा परटंका -द्वितीय, राजराजा चोल-प्रथम, कुलोचुंगा चोल-प्रथम, राजराजा चोल की बेटी कुदंाबाई-द्वितीय तथा चोल राजा विक्रम चोल (1113- 1135) ने भी मंदिर के लिये काफी दान दिये। पुदुकोटट्ई के महाराज शेरीसेतुपथी ने पन्ने के आभूषण दान में दिये जिन्हें आज भी भगवान कोपहनाया जाता है।
 
[[श्रेणी:तमिलनाडु के हिन्दू मन्दिर]]
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