"होमर" के अवतरणों में अंतर

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सर्ग 24 - प्रायम का एकिलेस के पास आकर बेटे की लाश माँगना - प्रायम को देखकर एकिलेस को अपने वृद्ध पिता की याद - एकिलेस का हृदय द्रवित-लाश सन्दान एवं दाह-संस्कार - काल तक शान्ति-व्यवस्था की प्रधि - संस्कार कृत्यों का वर्णन।
 
'''ओडेसी'''
 
मंगलाचरण - हे देवी, तू उस कुशल मानव ओडेसियस की कथा गाने की शक्ति दे जिसने ट्राय
यह काल-बन्ध द्विगुण पेचीदा इसलिए हो जाता है कि ओडेसी का ‘देश’ एक नहीं है।
ओडेसी का विषय है, ‘'''भयंकर समुद्र-भ्रमण एवं गुहागमन’'''। अतः व्यापार के केन्द्र दो हो जाते हैं। एक तो है '''इथैका जहाँ उसकी रानी पिनीलोपी'''
उसकी प्रतीक्षा में बैठी है और उसके पुत्र-कलत्र उसके शत्रुओं से घिरे हैं। दूसरा है ओडेसियस स्वयस्वयं
एवं उसकी समुद्र-सतह पर की चलायमान स्थिति। इन दो ‘देशों’ के घटनाओं का संचालन होता है
महान सूत्रधार ज़ीयस द्वारा। ‘देश की एकता’ न होने पर भी विषय या व्यापार की एकता उसी तरह कटी-छँटी
रूप में विद्यमान है जिस तरह ‘इलियड’ में। कवि बड़ी सावधानी से एक घटना की परत में दूसरी घटना रखकर
समूचे व्यापार की संगति एवं सुडौलता की रक्षा बड़ी धीरता से करता है।
'''
'''इलियड'''की विषय-वस्तु सीमित है। इसी से '''ट्रेजेडी''' का पैटर्न बैठ गया।
इलियड''''''मोटे अक्षर''' की विषय-वस्तु सीमित है। इसी से '''ट्रेजेडी''' का पैटर्न बैठ गया। बड़ी सरलता से कार्य-प्रभाव की एकता साध ली गयी। परन्तु ‘ओडेसी’ का विषय विस्तृत है। यह उपन्यास की तरह है। फिर भी इतनी सावधानी से कार्य एवं प्रभाव की एकता सम्पादित की गयी है कि आज के शैली-प्रधान या रूप-प्रधान उपन्यास भी उसके सामने फीके पड़ जाते हैं। एक आदि कवि के लिए-एक प्रारम्भकर्त्ता के लिए इतनी बड़ी कारीगरी आश्चर्य का ही विषय है। संक्षेप में इलियड का रूपायन (फार्म) ट्रेजेडीपरक है एवं ओडेसी का उपन्यासपरक।
बड़ी सरलता से कार्य-प्रभाव की एकता साध ली गयी। परन्तु ‘ओडेसी’ का विषय विस्तृत है।
यह उपन्यास की तरह है। फिर भी इतनी सावधानी से कार्य एवं प्रभाव की एकता सम्पादित
की गयी है कि आज के शैली-प्रधान या रूप-प्रधान उपन्यास भी उसके सामने फीके पड़
जाते हैं। एक आदि कवि के लिए-एक प्रारम्भकर्त्ता के लिए इतनी बड़ी कारीगरी आश्चर्य का
ही विषय है। संक्षेप में इलियड का रूपायन (फार्म) ट्रेजेडीपरक है एवं ओडेसी का उपन्यासपरक।
 
इतना होते हुए भी ओडेसी बहुत-सी बातों में इलियड के समानान्तर है।
'''इलियड और ओडेसी''' दोनों काव्यों का आरम्भ कथाकाल की अन्तिम छोर पकड़कर होता है।
'''इलियड और ओडेसी''' दोनों काव्यों का आरम्भ कथाकाल की अन्तिम छोर पकड़कर होता है। दोनों का अन्त भी प्रारम्भ में घोषित विषय पर होता है। दोनों की गति-रेखा वृत्ताकार है। दोनों में सर्गों की संख्या 24 है। इलियड के अन्त में हेक्टर का निधन है तो ओडेसी में पाणि-प्रार्थी राजकुमारों का। इलियड के अन्त में एक शान्त वातावरण, कुछ काल के ही लिए सही, उपस्थित हो जाता है जिसमें दोनों पक्ष मृतकों का दाह-संस्कार करते हैं। ओडेसी में तो अन्त में प्रियामिलन एवं स्थायी शान्ति आ जाती है। दोनों महाकाव्यों के अन्दर आये चरित्र एक ही पैमाने और साँचे में ढले ज्ञात होते हैं। एन्थनी जिस कुटिलता और तत्परता से ग्रीक योद्धाओं की सहायता इलियड में करती है उसी रूप में ओडेसी में भी। पोजीडॉन (वरुण) दोनों में एक क्रूर एवं उजड्ड देवता की तरह है। ओडेसियस दोनों महाकाव्यों में साहसी, वीर, क्रूरकर्मा एवं कुटिल रूप में चित्रित है। मिनीलास उसी प्रकार धनी, उदार हृदय योद्धा दोनों महाकाव्यों में है। बुद्धिमान् वृद्ध नेस्टर का मित्र भी वहीं रहता है। यदि इन महाकाव्यों के रचयिता अलग-अलग होते तो चरित्रों के चित्रण में फर्क अवश्य आ जाता। उदाहरण के लिए होमर का ‘डायोमीडिल’ या ‘अफ्रोदीती’ वर्जिल के डायोमीडिज या अफ्रोदीती (वीनस) से बिलकुल अलग हैं। कथानक एवं चरित्रों का समान पैटर्न बताता है कि दोनों काव्य एक ही व्यक्ति की प्रतिभा से निःसृत हैं।
दोनों का अन्त भी प्रारम्भ में घोषित विषय पर होता है। दोनों की गति-रेखा वृत्ताकार है।
दोनों में सर्गों की संख्या 24 है। इलियड के अन्त में हेक्टर का निधन है तो ओडेसी म
ें पाणि-प्रार्थी राजकुमारों का। इलियड के अन्त में एक शान्त वातावरण,
कुछ काल के ही लिए सही, उपस्थित हो जाता है जिसमें दोनों पक्ष मृतकों का
दाह-संस्कार करते हैं। ओडेसी में तो अन्त में प्रियामिलन एवं स्थायी शान्ति
आ जाती है। दोनों महाकाव्यों के अन्दर आये चरित्र एक ही पैमाने और साँचे में
ढले ज्ञात होते हैं। एन्थनी जिस कुटिलता और तत्परता से ग्रीक योद्धाओं की सहायता
इलियड में करती है उसी रूप में ओडेसी में भी। पोजीडॉन (वरुण) दोनों में एक क्रूर एवं
उजड्ड देवता की तरह है। ओडेसियस दोनों महाकाव्यों में साहसी, वीर, क्रूरकर्मा एवं कुटिल
रूप में चित्रित है। मिनीलास उसी प्रकार धनी, उदार हृदय योद्धा दोनों महाकाव्यों में है।
बुद्धिमान् वृद्ध नेस्टर का मित्र भी वहीं रहता है। यदि इन महाकाव्यों के रचयित
ा अलग-अलग होते तो चरित्रों के चित्रण में फर्क अवश्य आ जाता। उदाहरण
के लिए होमर का ‘डायोमीडिल’ या ‘अफ्रोदीती’ वर्जिल के डायोमीडिज या अफ्रोदीती
(वीनस) से बिलकुल अलग हैं। कथानक एवं चरित्रों का समान पैटर्न बताता है कि दोनों
काव्य एक ही व्यक्ति की प्रतिभा से निःसृत हैं।
 
== संदर्भ ==
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