"मीर तक़ी मीर" के अवतरणों में अंतर

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{{Infobox writer
| name = [[मुग़ल सल्तनत|मुग़ल ज़माने]] के [[उर्दुउर्दू शायर]]<br />'''मीर तक़ी मीर'''
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| death_date = १८१० (आयु ८७)
| death_place = [[लखनऊ]]
| occupation = [[उर्दुउर्दू शायर]]
| nationality = [[भारतीय]]
| period = [[मुग़ल सल्तनत|मुग़ल काल]]
| debut_works = ''कलाम-ए-मीर''
| influences = [[अमीर ख़ुसरो]]
| influenced = [[उर्दुउर्दू शायरी]], [[ग़ालिब]]
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'''ख़ुदा-ए-सुखन मोहम्मद तकी''' उर्फ ''मीर तकी "मीर" '' ([[1723]] - 20 सितम्बर [[1810]] ) [[उर्दू]] एवं [[फ़ारसी]] भाषा के महान शायर थे। मीर को उर्दू के उस प्रचलन के लिए याद किया जाता है जिसमें फ़ारसी और हिन्दुस्तानी के शब्दों का अच्छा मिश्रण और सामंजस्य हो । [[अहमद शाह अब्दाली]] और [[नादिरशाह]] के हमलों से कटी-फटी दिल्ली को मीर तक़ी ''मीर'' ने अपनी आँखों से देखा था । इस त्रासदी की व्यथा उनकेउनकी कलामोरचनाओं मे दिखती है, अपनी ग़ज़लों के बारे में एक जगह उन्होने कहा था-
 
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== जीवन ==
इनका जन्म [[आगरा]] (अकबरपुर) मे हुआ था । उनका बचपन अपने पिता की देख रेखदेखरेख मे बीता । उनके प्यार और करुणा के जीवन मेमें महत्त्व के प्रति नजरिये का मीर के जीवन पे गहरा प्रभाव परपड़ा जिसकी झलक उनके शेरो मे भी देखने को मिलती है | पिता के मरणोपरांत, ११ की वय मे, इनके उपर ३०० रुपयों का कर्ज था और पैतृक सम्पत्ति के नाम पर कुछ किताबें । १७ साल की उम्र में वे दिल्ली आ गए । बादशाह के दरबार में १ रुपया वजीफ़ा मुकर्रर हुआ । इसको लेने के बाद वे वापस आगरा आ गए । १७३९ में फ़ारस के नादिरशाह के भारत पर आक्रमण के दौरानसमसामुद्दौलादौरान समसामुद्दौला मारे गए और इनका वजीफ़ा बन्दबंद हो गया । इन्हें आगरा भी छोड़ना पड़ा और वापस दिल्ली आए । अब दिल्ली उजाड़ थी और कहा जाता है कि नादिर शाह ने अपने मरने की झूठी अफ़वाह पैलाने के बदले में दिल्ली में एक ही दिन में २०-२२००० लोगों को मार दिया था और भयानक लूट मचाई थी ।
 
उस समय शाही दरबार में फ़ारसी शायरी को अधिक महत्व दिया जाता था । मीर तक़ी मार''मीर'' को उर्दू में शेर कहने का प्रोत्साहन अमरोहा के सैयद सआदत अली ने दिया । २५-२६ साल की उम्र तक ये एक दीवाने शायर के रूप में ख्यात हो गए थे । १७४८ में इन्हें मालवा के सूबेदार के बेटे का मुसाहिब बना दिया गया । लेकिन १७६१ में एक बार फ़िर भारत पर आक्रमण हुआ । इसबारइस बार बारी थी अफ़गान सर्गनासरगना अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) की । वोवह नादिर शाह का ही सेना पतिसेनापति था । [[पानीपत की तीसरी लड़ाई]] में मराठे हार गए । दिल्ली को फिर बरबादी के दिन देखने पड़े । लेकिन इस बार बरबाद दिल्ली को भी वे अपने सीने से कई दिनों तक लगाए रहे । [[अहमद शाह अब्दाली]] के दिल्ली पर हमले के बाद वह [[अशफ - उद - दुलाह]] के दरबार मे [[लखनऊ]] चले गये । अपनी जिन्दगी के बाकी दिन उन्होने लखनऊ मे ही गुजारे ।
 
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== कार्यक्षेत्र और रचना ==
मीर की गज़लोंग़ज़लों के कुल ६ दीवान हैं । इनमें से कई शेर ऐसे हैं जो मीर के हैं या नहीं इस पर विवाद है । इसके अलावा कई शेर या कसीदे ऐसे हैं जो किसी और के संकलन में हैं पर ऐसा मानने वालों की कमी नहीं कि वे मीर के हैं । शेरों (्रबीअरबी में अशारअशआर) की संख्या कुल १५००० है । इसके अलावा कुल्लियात-ए-मीर में दर्जनों मनसवियाँमसनवियाँ (स्तुतिगान), क़सीदे, वासोख़्त और मर्सिये संकलित हैं ।
== संबंधित कड़ियाँ ==
* [[शायर]]
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