"श्रीधर व्यंकटेश केतकर": अवतरणों में अंतर

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== परिचय ==
श्रीधर वेंकटेश केतकर [[मराठी विश्वकोश]] (ज्ञानकोशज्ञानकोष) के सुविख्यात संपादक। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बड़े अनियमित ढंग से चली। विविध विषयों का ज्ञान प्राप्त करने में उन्होंने अच्छी रुचि दिखलाई और साहित्य संबंधी अनेक क्रियाकलापों में उत्साहपूर्वक दिलचस्पी ली, फिर भी वे यहाँ विश्वविद्यालय की कोई उपाधि प्राप्त न कर सके। सन्‌ 1906 में वे अमरीका चले गए। कॉर्नेल विश्वविद्यालय में पाँच वर्ष बिताने के बाद 1911 में उन्होंने पी-एच. डी. वी उपाधि प्राप्त की। उनके शोधप्रबंध का शीर्षक था 'भारत में जातियों का इतिहास'। इसमें उन्होंने मनुस्मृति में परिलक्षित सामाजिक स्थितियों का विवेचनात्मक विश्लेषण किया (मनुस्मृति का रचनाकाल उन्होंने 227 से 320 ई. के बीच में माना है)। इसके परिशिष्ट रूप में दिए गए लेख 'जाति और मानव-जाति-विज्ञान' में उन्होंने 'वर्ण' तथा 'जाति' के मौलिक भेद पर बल दिया। अमरीका में उन्होंने अपना समय विविध विषयों का ज्ञान प्राप्त करने में बिताया जो उनके जीवन के मुख्य ग्रंथ मराठी ज्ञान कोश के निर्माण में सहायक हुअ। लौटते समय एक वर्ष तक वे लंदन में रुके और वहाँ भी सामाजिक विषयों संबंधी अध्ययन एवं गवेषण कार्य जारी रखा। यहाँ उन्होंने जातियों के इतिहास का दूसरा खंड 'हिंदुत्व पर निबंध' नाम से प्रकाशित किया।
 
भारत आने के बाद केतकर ने कुछ वर्ष [[कलकत्ता विश्वविद्यालय]] में राजनीतिशास्त्र तथा [[अर्थशास्त्र]] पढ़ाने में व्यतीत किए। इसी समय उन्होंने दो अन्य ग्रंथ प्रकाशित किए - भारतीय अर्थशास्त्र तथा हिंदू विधि (कानून)। जनवरी, 1916 में ही वस्तुत: उन्होंने मराठी ज्ञानकोश के महान्‌ साहित्यिक अनुष्ठान का औपचारिक रूप से आरंभ किया। उन्हें इसे पाँच वर्ष में प्रकाशित करने की आशा थी किंतु वास्तव में केवल पहला खंड ही सन्‌ 1921 में निकल सका और इक्कीसवाँ खंड (अनुक्रमणिका) 1929 में प्रकाशित हुआ। 1916 से 1929 तक का 13-14 वर्ष का समय केतकर के लिए असाधारण दौड़ धूपवाली सक्रियता का था, क्योंकि उन्हें एक साथ ही ज्ञानकोश के संपादक, व्यवस्थापक, मुद्रक, प्रकाशक, यहाँ तक कि स्थान स्थान पर जाकर उसके ग्राहक बनाने का भी कार्य करना पड़ता था। पूर्ण संलग्नता चाहनेवाले इस काम के साथ साथ, और उसके समाप्त हो जाने के बाद भी, वे अन्यान्य कार्यों में - साहित्यिक, सामाजिक तथा राजनीतिक - बराबर जुटे रहते थे। वे एक दैनिक समाचारपत्र तथा एक साहित्य पत्रिका का संपादन करते थे और उपन्यास, राजनीतिक पुस्तिकाएँ तथा समाजविज्ञान संबंधी निबंध लिखा करते थे। इसके अतिरिक्त वे अपनी भावी पुस्तक '[[प्राचीन महाराष्ट्र का इतिहास]]' के संबंध में बहुत सा गवेषण कार्य भी करते रहते थे। किंतु यह बात हमें मान ही लेनी पड़ती है कि सन्‌ 1930 के बाद की उनकी रचनाएँ देखने से स्पष्ट हो जाता है कि पहले के कुशल लेखक की मानसिक ग्रहणशीलता में कमी आ गई है।
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