"नरवानर गण" के अवतरणों में अंतर

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ये मानव के दूर के संभ्राता माने जाते हैं। इनकी विशेषताएँ इस प्रकार हैं : ये कपोलधानरहित होते हैं और इनकी पूँछ प्रारंभिक मात्र है। इनमें से शाखा वानरों को छोड़कर किसी के भी नितंब पर किण नहीं होते। हाथ पैरों की अपेक्षा अधिक लंबे होते हैं। इनमें कुछ-कुछ द्विपाद प्रवृत्ति पाई जाती है। शरीर के अग्रभाग और हाथ पैरों पर लोग पाए जाते हैं। इस वंश में शाखावानर, वनमानुष, मध्यवानर तथा भीमवानर आते हैं।
 
'''गिब्बन (शाखा वानर)''' - यह दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाया जाता है। यह ऐं्थ्राोपोइडियाऐंथ्रोपोडिया वानरों में से सबसे अधिक आद्य और छोटा है। साधारण गिब्बन खड़ी अवस्था में तीन फुट से अधिक ऊँचा नहीं होता है। यह सर्वथा वृक्षवासी है, किंतु भूमि पर भी सीधा खड़ा होकर चल सकता है। इसकी बाहें बहुत लंबी होती है और सीधा खड़ा होने पर भूमि का स्पर्श कर सकता हैं। यह फलभक्षी है, यद्यपि इसके भेदक दंत पर्याप्त बड़े और आत्मरक्षा के लिए खड्ग का काम देते हैं। इसकी आवाज बहुत भारी होती है।
 
'''वनमानुष (औरांग-ऊटान)''' - यह सुमात्रा और बोर्नियो द्वीपां का वासी है। यह नाटा किंतु स्थूलकाय और हलके लाल बालोंवाला होता है। यद्यपि यह चार फुट ही ऊँचा होता है, तथापि इसकी भुजा सात फुट की ऊँचाई तक पहुँच सकती हैं। सिर छोटा, चौड़ा और आँखें सन्निकट होती हैं। जबड़े गहरे, भारी और फलों को चबाने तथा शत्रु का सामना करने में सहायता पहुँचाते हैं। हाथ ही प्रति रक्षाशस्त्र है और वनमानुष शत्रु से लड़ते समय दाँतों की अपेक्षा उनपर अधिक निर्भर रहता है। इसके आरोहण का ढंग मनुष्य के ही समान है। यह अपना घर वृक्षों पर शाखाओं के बीच में बनाता है। यह सर्वथा फलभक्षी प्राणी है (देखें औरांग-ऊटान)।