"व्याख्यान शास्त्र": अवतरणों में अंतर

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==पश्चिमी संस्कृति में महत्व==
इस शास्त्र का [[प्राचीन यूनान]] और [[प्राचीन रोम]] में बहुत महत्व रहा था और इसका पश्चिमी परम्परा पर गहरा प्रभाव पड़ा है।<ref>See, e..g., Thomas Conley, Rhetoric in the European Tradition (University of Chicago, 1991).</ref> प्राचीन यूनानी [[दार्शनिक]] [[अरस्तु]] ने व्याख्यान में श्रोताओं को प्रभावित करने के तीन तत्व बताएँ थे, जिन्हें [[यूनानी भाषा]] में 'लोगोस' (<small>λόγος, logos</small>, तर्क), 'पेथोस' (<small>πάθος, pathos</small>, भावनाएँ) और 'ईथोस' (<small>ἦθος, ethos</small>, भावनाएँमूल्य व विश्वास) कहा जाता है। प्रचीन यूनान से लेकर १९वीं शताब्दी के अंत तक पश्चिमी लेखकों और अन्य विद्वानों को विश्वविद्यालयों और अन्य शिक्षा संस्थानों में व्याख्यान शास्त्र की औपचारिक शिक्षा दी जाती थी।
 
==इन्हें भी देखें==