"श्यामसुन्दर दास" के अवतरणों में अंतर

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मृत्यु- १९४५ ई०
 
डॉ. श्याम सुंदर दास
द्विवेदी युग
गोस्वामी तुलसीदास, भाषा विज्ञान, साहित्यालोचन, हिन्दी भाषा और साहित्य, हिन्दी शब्द सागर, भाषा रहस्य मेघदूत, पृथ्वीराज रासो आदि।
 
जीवन-परिचय- बाबू श्याम सुंदर दास का जन्म सं. १९३२ में बनारस में हुआ। इनके पिता का नाम लाला देवी दास खन्ना था।
भाषा मुहावरों, कहावतों, शुद्ध खड़ी बोली तथा विदेशी शब्दों का प्रयोग कम।
 
शैली व्याख्यात्मक, विचारात्मक, विवेचनात्मक, गवेषणात्मक आदि।
बी.ए. पास करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक सेंट्रल हिंदू कालिज काशी में अध्यापन कार्य किया तत्पश्चात ये सिचाई विभाग में कार्य करने के लिए शिमला चले गए। कुछ समय में कश्मीर महाराज के प्राइवेट सेक्रेटरी भी रहे। इस प्रकार विभिन्न स्थानों पर कार्य करने के उपरांत हिंदू विश्व विद्यालय काशी के हिंदी विभाग के अध्यक्ष नियुक्त हुए।
 
अंग्रेज़ी सरकार ने इनकी साहित्य-सेवा से प्रभावित होकर इन्हें रायसाहब और रायबहादुर की उपाधियाँ प्रदान कीं।
संवत २००२ में इनका स्वर्गवास हो गया।
 
ग्रंथ-रचना- बाबू श्याम सुंदर दास ने अनेक ग्रंथों की रचना की। उन्होंने लगभग सौ ग्रंथों का संपादन किया। उन्हें अप्रकाशित पुस्तकों की खोज करके प्रकाशित कराने का शौक था। उनके मौलिक ग्रंथों में साहित्यालोचन, भाषा विज्ञान, हिंदी भाषा का विकास, गोस्वामी तुलसी दास, रूपक रहस्य आदि प्रमुख हैं।
 
वर्ण्य विषय- बाबू श्याम सुंदर दास ने विचारात्मक तथा भावात्मक दोनों ही एक प्रकार के निबंध लिखे हैं। उनके निबंधों के विषय में पर्याप्त विविधता है। उन्होंने बहुत से अछूते विषयों पर भी लेखनी चलाई कवियों की खोज तथा इतिहास संबंधी निबंधों में उनकी प्रतिभा के दर्शन होते हैं।
 
भाषा- बाबू श्याम सुंदर दास की भाषा शुद्ध साहित्यिक हिंदी है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की प्रधानता है। भाषा के संबंध में उनका विचार था- 'जब हम विदेशी भावों के साथ विदेशी शब्दों को ग्रहण करें तब उन्हें ऐसा बना लें कि उनमें से विदेशीपन निकल जाए और वे अपने होकर हमारे व्याकरण के नियमों से अनुशासित हों।' इसलिए जहाँ कहीं उन्होंने अपनी भाषा में 'उर्दू' के प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया है, वहाँ उनका उर्दूपन निकाल दिया है, कलम, कवायद, कानून आदि शब्दों के नीचे की बिंदी हटाकर और उनके उच्चारण बदल कर उन्होंने उनका प्रयोग लिया है। इसी प्रकार संस्कृत के शब्दों की क्लिष्टता दूर कर के उन्हें हिंदी में सरल ढंग से लिखा है- जैसे- कार्य के स्थान पर कार्य, अञ्जन के स्थान पर अंजन।
 
शब्द चयन के बारे में बाबू श्यामसुंदर दास का मत था- 'सबसे पहला स्थान शुद्ध हिंदी के शब्दों को, उसके पीछे संस्कृत के सुगम और प्रचलित शब्दों को, इसके पीछे फारसी आदि विदेशी भाषाओं के साधारण और प्रचलित शब्दों का और सबसे पीछे संस्कृत के अप्रचलित शब्दों को स्थान दिया जाए। फारसी आदि विदेशी भाषाओं के कठिन शब्दों का प्रयोग कदापि न हो।
 
शैली- बाबू श्याम सुंदर दास ने मुख्यतः दो प्रकार की शैलियों में लिखा है-
१. विचारात्मक शैली- विचारात्मक शैली में विचारात्मक निबंध लिखे गए हैं। इस शैली के वाक्य छोटे-छोटे तथा भावपूर्ण हैं। भाषा सबल, सरल और प्रवाहमयी है। उदाहरणार्थ-
'गोपियो का स्नेह बढ़या है। ये कृष्ण के साथ रास लीला में संकलित होती हैं। अनेक उत्सव मनाती है। प्रेममयी गोपिकाओं का यह आचरण बड़ा ही रमणीय है। उसमें कहीं से अस्वाभाविकता नहीं आ सकी।''
 
२. गवेषणात्मक शैली- गवेषणात्मक निबंधों में गवेषणात्मक शैली का प्रयोग किया गया है। इनमें वाक्य अपेक्षाकृत कुछ लंबे हैं। भाषा के तत्सम शब्दों की अधिकता है। विषय की गहनता तथा शुष्कता के कारण यह शैली में कुछ शुष्क और रहित है। इस प्रकार की शैली का एक उदाहरण देखिए-
'यह जीवन-संग्राम दो भिन्न सभ्यताओं के संघर्षण से और भी तीव्र और दुखमय प्रतीत होने लगा है। इस अवस्था के अनुकूल ही जब साहित्य उत्पन्न होकर समाज के मस्तिष्क को प्रोत्साहित और प्रति क्रियमाण करेगा तभी वास्तविक उन्नति के लक्षण देख पड़ेंगे और उसका कल्याणकारी फल देश को आधुनिक काल का गौरव प्रदान करेगा।''
 
बाबू श्याम सुंदरदास की किसी प्रकार की शैली में अलंकारों की सजावट नहीं पाई जाती। कहावतों और मुहावरों का प्रयोग तो नहीं के बराबर हुआ
 
है। अपने विचारों को भली प्रकार समझाने के लिए बाबू श्याम सुंदर दास ने एक ही बात को 'सारांश यह है' 'अथवा', 'जैसे' आदि शब्दों के साथ बार-बार दुहराया है।
 
साहित्य सेवा और स्थान- हिंदी साहित्य में बाबू श्याम सुंदर दास का स्थान उनके हिंदीप्रचारक और हिंदी उन्नायक के रूप में। उन्होंने अनेक मौलिक ग्रंथों की रचना की। अनेक ग्रंथों का संपादन किया। काशी नगरी-प्रचारिणी सभा की स्थापना में उनका प्रमुख हाथ था। उन्होंने अपने प्रयत्नों से हिंदी को विश्वविद्यालय की उच्च कक्षाओं में स्थान दिलाया।
 
बाबू श्याम सुंदर दास ने अपने जीवन के पचास वर्ष हिंदी की सेवा करते हुए व्यतीत किए उनकी इस हिंदी सेवा को ध्यान में रखते हुए ही राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त ने निम्न पंक्तियाँ लिखी हैं-
मातृभाषा के हुए जो विगत वर्ष पचास।
नाम उनका एक ही है श्याम सुंदरदास।।
 
डॉ. राधा कृष्णन ने शब्दों में ''बाबू श्याम सुंदर अपनी विद्वत्ता का वह आदर्श छोड़ गए हैं जो हिंदी के विद्वानों की वर्तमान पीढ़ी को उन्नति करने की प्रेरणा देता रहेगा।''
 
 
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