"ब्रिटिश भारत में रियासतें" के अवतरणों में अंतर

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[[ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी]] के सम्बन्ध सर्वप्रथम व्यापार के उद्देश्य से सूरत, कर्नाटक, हैदराबाद, बंगाल आदि समुद्रतट पर स्थित राज्यों से हुए। तदन्तर फ्रांसीसियों के साथ संघर्ष के समय राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा को प्रेरणा मिली। इसके फलस्वरूप साम्राज्य निर्माण का कार्य 1757 ईसवी से प्रारम्भ होकर 1856 तक चलता रहा। इस एक शताब्दी में देशी राज्यों के आपसी झगड़ों से लाभ उठाकर कम्पनी ने अपनी कूटनीतिक सैनिक शक्ति द्वारा सारे भारत पर सार्वभौम सत्ता स्थापित कर ली। अनेक राज्य उसके साम्राज्य में विलीन हो गये। अन्य सभी उसका संरक्षण प्राप्त करके कम्पनी के अधीन बन गये। यह अधीन राज्य 'रियासत' कहे जाने लगे। इनकी स्थिति उत्तरोत्तर असन्तोषजनक तथा डाँवाडोल होती गयी। रियासतों की शक्ति क्षीण होती गयी, उनकी सीमाएँ घटती गयीं और स्वतन्त्रता कम होती चली गयी।
===1757 से 1856 तक की स्थिति===
1756 तक कर्नाटक और तंजोर ब्रिटिश कंपनीकम्पनी के अधीन हो गए।गय्। 1757 में बंगाल उसके प्रभावक्षेत्रप्रभाव क्षेत्र में आ गया। 1761 तक हैदराबाद का निज़ाम उसका मित्र बन गया। 1765 में बंगाल की स्वंत्रतास्वतन्त्रता समाप्त हो गई।गयी। इसी वर्ष इलाहाबाद की संधिसन्धि द्वारा दिल्ली के सम्राट् शाहआलमशाह आलम और अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ कंपनीकम्पनी की मैत्री हो गईगयी तथा देशी राज्यों के साथ उसके संबंधोंसम्बन्धों का वास्तविक सूत्रपात हुआ।
 
1765 से 1798 तक मराठों, अफगानों तथा मैसूर के सुल्तानों के भय के कारण आत्मरक्षा की भावना से प्रेरित होकर कंपनीकम्पनी ने आरक्षण नीति द्वारा पड़ोसी राज्यों को अंतरालअन्तरिम राज्य बनाया जिससे नव निर्मित ब्रिटिश राज्य शक्तिशाली मित्र राज्यों से घिर कर सुरक्षित बन गया। इस अवसरवादी नीति को अवध और हैदराबाद के साथ कार्यान्वित किया गया। इसके अनुसार दिखावे के लिएलिये उनके साथ समानता का व्यवहार किया गयागया। परपरन्तु वास्तविकता यह थी कि इस वास्तवप्रक्रिया में उन्हें अधीन बनाने, उनकी सैनिक शक्ति क्षीण करने तथा उसके संपन्नसम्पन्न भागों पर अधिकार करने के किसी अवसर को कम्पनी ने अपने हाथ से बाहर न जाने दिया गया।दिया। रियासतों के प्रति जितनी नीतियाँ कंपनीकम्पनी ने भविष्य में अपनाईअपनायीं उनमें से अधिकांश अवध में पोषित हुई।हुईं। इस काल में कंपनीकम्पनी ने मैसूर तथा मराठा राज्य में फूट डालकर हैदराबाद के सहयोग से उनके विरुद्ध युद्ध किए।किये। अवध को रुहेलखंडरुहेलखण्ड हड़पने में सहायता देकर रामपुर का छोटा राज्य बना दिया। ट्रावनकोर और कुर्ग कंपनीकम्पनी के संरक्षण में आ गए।गये।
 
1799 से 1805 तक [[लॉर्ड वेलेज़ली]] की अग्रगामी नीति के फलस्वरूप सूरत, कर्नाटक तथा तंजोर के राज्यों का अंतअन्त हो गया। अवध, हैदराबाद, बड़ौदा, पूना और मैसूर सहायक संधियोंसन्धियों द्वारा कंपनीकम्पनी के शिकंजे में बुरी तरह जकड़ गए।लिये येगये। अब वे केवल अर्ध स्वतंत्रस्वतन्त्र राज्य भर रह गए।गये थे इसके अतिरिक्त उनकी और कुछ भी हैसियत न थी। उनकी बाह्य नीति पर भी ब्रिटिश नियंत्रणशासन का नियन्त्रण हो गया। सैनिक शक्ति घटा दी गई।गयी। राज्यों में उन्हीं के खर्च पर सहायक सेना रखी गई।गयी जिसके बल पर आन्तरिक आक्रमणों तथा विद्रोहों से उनकी रक्षा की गई।गयी। राजाओं की गतिविधियों पर दृष्टि रखने तथा बिंटिश हितों की सुरक्षा एवं वृद्धि के लिए उनकी राजधानियों में ब्रिटिश हितों की सुरक्षा एवं वृद्धि के लिएलिये उनकी राजधानियों में ब्रिटिश प्रतिनिधि रहने लगे। राज्यों, से ब्रिटिश विरोधी सभी विदेशी हटा दिएदिये गए।गये। अंतरराष्ट्रीयअन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों का फैसला ब्रिटिश कंपनीकम्पनी करने लगी। ये अपमानजनक संधियाँसन्धियाँ देशी राज्यों के लिएलिये आत्मविनाश के समान थीं तथा ब्रिटिश साम्राज्य के लिएलिये विकास श्रृंखला की महत्वपूर्ण लड़ियाँकड़ियों के समान थीं। युद्ध में परास्त होकर नागपुर और ग्वालियर भी उसी जाल में फंसफँस गए।गये। भरतपुर ने ब्रिटिश आक्रमणों को विफल बनाने के पश्चात् संधिसन्धि कर ली। इसी समय से रियासतों के शासक अनुत्तरदायी होने लगे तथा उनके आंतरिकआन्तरिक शासन में अनेक बहानों से ब्रिटिश रेजिडेंटरेजीडेण्ट हस्तक्षेप करने लगे।
 
1805 से 1813 तक ब्रिटिश कंपनीकम्पनी ने देशी राज्यों के प्रति हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई।अपनायी। इस का मेंकारण ट्रावनकोर तथा सरहिंदसरहिन्द के राज्य उसके अधीन हो गए।गये। सतलज पंजाब की सीमा बना दी गई।गयी। सिंधसिन्ध और पंजाब कंपनीकम्पनी के मित्र बन गए।गये।
 
1817-1818 में कई राज्य लार्ड हेस्टिंग्ज़ की आक्रामक नीति के शिकार बने। मराठा संघ को नष्ट करके सतारा का छोटा सा राज्य बना दिया गया। राजपूताना, मध्य भारत तथा बुंदेलखंडबुन्देलखण्ड के सभी राज्य सतत मित्रता तथा सुरक्षा की संधियोंसन्धियों द्वारा कंपनीकम्पनी के करदकरदाता राज्य बन गए।गये। ग्वालियर, नागपुर तथा इंदौरइन्दौर पर पहले से अधिक अपमानजनक संधियाँसन्धियाँ लाद दी गई।गयीं। भोपाल ने प्रतिरक्षात्मक संधिसन्धि द्वारा अंग्रेजों की अधीनता मान ली। अमीर खाँ, ग़फूर खाँ तथा करीम खाँ को क्रमश: टोंक, जावरा तथा गणेशपुर की रियासतें दी गई।गयीं। नतीजा यह हुआ कि ब्रिटिश सार्वभौम सत्ता सारे देशहिन्दुस्तान में फैल गई।गयी।
 
1817-1818 में कई राज्य लार्ड हेस्टिंग्ज़ की आक्रामक नीति के शिकार बने। मराठा संघ को नष्ट करके सतारा का छोटा सा राज्य बना दिया गया। राजपूताना, मध्य भारत तथा बुंदेलखंड के सभी राज्य सतत मित्रता तथा सुरक्षा की संधियों द्वारा कंपनी के करद राज्य बन गए। ग्वालियर, नागपुर तथा इंदौर पर पहले से अधिक अपमानजनक संधियाँ लाद दी गई। भोपाल ने प्रतिरक्षात्मक संधि द्वारा अंग्रेजों की अधीनता मान ली। अमीर खाँ, ग़फूर खाँ तथा करीम खाँ को क्रमश: टोंक, जावरा तथा गणेशपुर की रियासतें दी गई। ब्रिटिश सार्वभौम सत्ता सारे देश में फैल गई।
===1857 की सशस्त्र क्रान्ति===
लार्ड एमहर्स्ट के शासनकाल में कछार, जयंतिया और त्रिपुरा ब्रिटिश संरक्षण में आ गए। मनीपुर स्वतंत्र मित्र राज्य बन गया। भरतपुर की शक्ति नष्ट कर दी गई। लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने कुर्ग, मैसूर तथा जयंतिया को कुशलासन के बहाने तथा कछार को उत्तराधिकारी न होने के कारण हड़प लिया। लॉर्ड ऑकलैंड ने मांडवी, कोलावा, जलौन तथा कर्नूल रियासतों पर अधिकार कर लिया। लॉर्ड एलनबरा ने सिंध जीत लिया तथा ग्वालियर की सैनिक शक्ति नष्ट कर दी। र्लार्ड हार्डिज ने पंजाब की शक्ति संकुचित कर दी तथा जम्मू और कश्मीर के राज्य का निर्माण किया। लॉर्ड डलहौज़ी के समय रियासतों पर विशेष प्रकोप आया। उसने नागपुर, सतारा, झाँसी, संभलपुर, उदयपुर, जैतपुर, वघात तथा करौली के शासकों को पुत्र गोद लेने के अधिकार से वंचित करके उनके राज्यों को हड़प लिया; हैदराबाद से बरार ले लिया; तथा कुशासन का आरोप लगाकर, अवध को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया। इन आपत्तिजनक नीतियों के कारण रियासतों में असंतोष फैल गया जो 1857 की सशस्त्र क्रांति का कारण बना। क्रांति के समय स्वार्थ से प्रेरित होकर अधिकांश देशी शासक कंपनी के प्रति स्वामिभक्त रहे।
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