"केशवदास": अवतरणों में अंतर

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'''केशव''' या '''केशवदास''' (जन्म (अनुमानत:) 1555 विक्रमी और मृत्यु (अनुमानत:) 1618 विक्रमी) [[हिन्दी साहित्य]] के [[रीतिकाल]] की कवि-त्रयी के एक प्रमुख स्तंभ हैं। केशवदासवे [[संस्कृत]] [[काव्यशास्त्र]] का सम्यक् परिचय करानेवाले [[हिंदी]] के प्राचीन आचार्य और [[कवि]] हैं। जन्म (अनुमानत:) 1555 वि. और मृत्यु (अनुमानत:) 1618 वि.। इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम काशीराम था जो ओड़छा नरेश मधुकरशाह के विशेष स्नेहभाजन थे। मधुकरशाह के पुत्र महाराज इंद्रजीत सिंह इनके मुख्य आश्रयदाता थे। वे केशव को अपना गुरु मानते थे। रसिकप्रिया के अनुसार केशव ओड़छा राज्यातर्गत तुंगारराय के निकट बेतवा नदी के किनारे स्थित ओड़छा नगर में रहते थे।
 
इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम काशीराम था जो ओड़छा नरेश मधुकरशाह के विशेष स्नेहभाजन थे। मधुकरशाह के पुत्र महाराज इंद्रजीत सिंह इनके मुख्य आश्रयदाता थे। वे केशव को अपना गुरु मानते थे। [[रसिकप्रिया]] के अनुसार केशव ओड़छा राज्यातर्गत तुंगारराय के निकट [[बेतवा नदी]] के किनारे स्थित ओड़छा नगर में रहते थे।
 
== जीवन परिचय ==
केशवदास संस्कृत के उद्भट विद्वान थे। उनके कुल में भी संस्कृत का ही प्रचार था। नौकर-चाकर भी संस्कृत बोलते थे। उनके कुल में भी संस्कृत छोड़ हिंदी भाषा में कविता करना उन्हें कुछ अपमानजनक-सा लगा -
 
:भाषा बोल न जानहीं, जिनके कुल के दास।
:तिन भाषा कविता करी, जडमति केशव दास।।
 
तिन भाषा कविता करी, जडमति केशव दास।।
 
केशव बड़े भावुक और रसिक व्यक्ति थे। कहा जाता कि एक बार वृध्दावस्था में वे किसी कुएं पर बैठे थे। वहां पानी भरने के लिए आई हुई कुछ स्त्रियों ने उन्हें बाबा कहकर संबोधन किया। इस पर उन्होंने निम्न दोहा कहा -
 
:केशव केसनि असि करी, बैरिहु जस न कराहिंकराहिं।
:चंद्रवदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाहिं।जाहिं।।
 
चंद्रवदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाहिं।
 
संवत 1608 के लगभग जहांगीर ने ओरछा का राज्य वीर सिंह देव को दे दिया। केशव कुछ समय तक वीर सिंह के दरबार में रहे, फिर गंगातट पर चले गए और वहीं रहने लगे।
अलंकारों के बोझ से दबी प्रकृति अपना सहन सौंदर्य खो बैठी है। प्रकृति के संबंध में केशव की कल्पनाएं कहीं-कहीं पर बड़ी असंगत और अरुचिकर हो गई हैं। अरुण सूर्य को कापालिक काल का रक्त से भरा कपाल बना देना कसे का चकर प्रतीत होगा -
 
:कै सोनित कलित कपाल यह,
:किल कपालिक काल को।
 
किल कपालिक काल को।
 
==== संवाद योजना ====
दरबारी कवि होने के कारण केशव में राजदरबारों की वाक्पटुता वर्तमान थी। अतः संवादों की योजना में उन्हें असाधारण सफलता मिली। उनके संवाद अत्यंत आकर्षक हैं। उनमें राजदरबारों जैसी हाज़िर-जवाबी और शिष्टता है। उनके द्वारा चरित्रों का उद्धाटन सुंदर ढंग से हुआ है। जनक-विश्वामित्र संवाद, लव-कुश संवाद, सीता-हनुमान संवाद इसी प्रकार के संवाद हैं।
 
'अंगद-रावण-संवाद' के अंतर्गत एक उत्तर-प्रत्युत्तर देखिए _-
 
'''रावण-'''
रावण -: गेंद करेउं मैं खैल की, हर-गिरि केशोदास।
: सीस चढाए आपने, कमल समान सहास।।
 
'''अंगद-'''
सीस चढाए आपने, कमल समान सहास।।
अंगद -: जैसो तुम कहत उठायो एक गिरिवर,
 
:ऐसे कोटि कपिल के बालक उठावहीं।
अंगद - जैसो तुम कहत उठायो एक गिरिवर,
:काटे जो कहत सीस काटन घनेरे घाघ,
 
:मगर के खेले कहा भट-पद पावहीं।।
ऐसे कोटि कपिल के बालक उठावहीं।
 
काटे जो कहत सीस काटन घनेरे घाघ,
 
मगर के खेले कहा भट-पद पावहीं।।
 
==== पांडित्य-प्रदर्शन ====
अशोक वाटिका में हनुमान जी सीता जी को रामचंद्र जी की मुद्रिका देते हैं। मुद्रिका के प्रति सीता जी का कथन कितना भावपूर्ण है-
 
:श्री पुर में बन मध्य है, तू मग करी अनीति।
:कहि मुंदरी अब तियन की, को करि हैं परतीति।।
 
कहि मुंदरी अब तियन की, को करि हैं परतीति।।
 
== भाषा ==
केशव ने अपने काव्य का माध्यम ब्रजभाषा को बनाया, परंतु ब्रजभाषा का जो ढला हुआ रूप सूर आदि अष्ट छाप के कवियों में मिलता है वह केशव की कविता में नहीं। केशव संस्कृत के प्रकांड़ पंडित थे, अतः उनकी भाषा संस्कृत से अत्यधिक प्रभावित है। उन्होंने संस्कृत के तत्सम शब्दों को ही नहीं, संस्कृत की विभक्तियों को भी अपनाया है, कहीं-कहीं तो उनके छंदों की भाषा संस्कृत ही जान पड़ती है-
 
:रामचंद्र पद पद्मं वृंदारक वृंदाभिवंदनीयम्।
:केशवमति भूतनया लोचनं चंचरीकायते।।
 
केशवमति भूतनया लोचनं चंचरीकायते।।
 
केशव की भाषा में बुंदेलखंडी भाषा का भी काफ़ी मिश्रण मिलता है। खारक(छोहारा), थोरिला(खूंटी), दुगई(दालान), गौरमदाइन(इंद्रधनुष) आदि जैसे बुंदेली शब्दों का प्रयोग बराबर उनके काव्य में हुआ। अवधि भाषा के शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। जैसे - इहां, उहां, दिखाउ, रिझाउ आदि।
केशव ने कहीं-कहीं तो शब्दों को गढ लिया है। जैसे - चाप से चापकीय। अप्रचलित शब्दों के प्रयोग में भी उन्होंने पूरी तरह स्वच्छंदता से काम लिया। जैसे - आलोक(कलंक), लांच(रिश्वत), नारी(समूह) आदि। जल के अर्थ में विष शब्द का प्रयोग केशव की भाषा में ही मिलता है -
 
:विषमय यह गोदावरी, अमृतन को फल देति।
:केशव जीवन हार को, दुख अशेष हर लेति।।
 
केशव जीवन हार को, दुख अशेष हर लेति।।
 
संस्कृत और बुंदेलखंडी के अत्यधिक प्रभाव, लंबी-लंबी शब्द-योजना अप्रचलित शब्दों के प्रयोग आदि के कारण केशव की भाषा में कहीं-कहीं अत्यंत विलष्टता आ गई है।
केशव की भाषा का सामान्य रूप अपेक्षाकृत सुगम है। उसमें कहावतों और मुहावरों का भी यथा-स्थान प्रयोग हुआ है। लाज मरना कहावत का एक प्रयोग देखिए -
 
:कहि केशव आपनि जांघ उघारि के,
:आपहि लाजन की मरिई।
 
आपहि लाजन की मरिई।
 
== शैली ==
केशव दास जी ने अपने काव्य में अनेक स्थलों पर विविध रसों की उत्कृष्ट व्यंजना की है, किंतु मुख्यतः वे श्रृंगार और वीर रस के कवि हैं। श्रृंगार के दोनों पक्षों को उन्होंने अपनाया है। वीरोचित उत्साह के मार्मिक वर्णन में तो वे अपनी सानी नहीं रखते। शत्रुघ्न के बाणों से मूर्छित लव के लिए विलाप करती हुई सीता के प्रति कुश का कथन कितना उत्साहपूर्ण है _
 
:रिपुहिं मारि संहारिदल यम ते लेहुं छुडाय।
:लवहिं मिलै हों देखिहों माता तेरे पाय।।
 
लवहिं मिलै हों देखिहों माता तेरे पाय।।
 
== छंद ==
छंदों के विषय केशव का ज्ञान अपार था। जितने प्रकार के छंदों का प्रयोग उन्होंने किया हिंदी साहित्य में किसी ने नहीं किया। रामचंद्रिका में तो छंदों की विविधता इस सीमा तक पहुंच गई है कि विद्वानों ने उसे शब्दों का अजायबघर कह दिया है। केशव ने स्वतः लिखा है -
 
:रामचंद्र की चंद्रिका बरनति हौं बहु छंद।
 
केशव की छंद योजना संस्कृत साहित्य की छंद योजना है। उन्होंने कविता, सवैया, दोहा आदि छंदों का भी सफलतापूर्वक उपयोग किया है।
 
==अलंकार==
अलंकार - केशव को अलंकारों से विशेष मोह था उनके अनुसार -
 
:जदपि सुजाति सुलच्छनी, सुबरन सरस सुवृत्त
:भूषन विन न विराजहीं कविता बनिता भित्त।।
 
भूषन विन न विराजहीं कविता बनिता भित्त।।
 
अतः उनकी कविता में विभिन्न अलंकारों का प्रयोग सर्वत्र दिखाई देता है। अलंकारों के बोझ से कविता के भाव दब से गए हैं और पाठक को केवल चमत्कार हाथ लगता है।
जहां अलंकार-योजना प्रति केशव को कठोर आग्रह नहीं है, वहां उनकी कविता अत्यंत हृदयग्राही और सरस हैं। उपमा-अलंकार का एक उदाहरण देखिए- दशरथ-मरण के उपरांत भरत जब महल में प्रवेश करते हैं तो वे माताओं को वृक्ष विहीन लताओं के समान पाते हैं।
 
:मंदिर मातु विलोक अकेली।
:ज्यों बिनु वृक्ष विराजत बेली।।
 
ज्यों बिनु वृक्ष विराजत बेली।।
 
== साहित्य में स्थान ==
केशवदास जी वस्तुतः एक श्रेष्ठ कवि थे। सूर और तुलसी के पश्चात हिंदी-काव्य-जगत में उन्हीं की ही गणना की जाती है-
 
:सूर सूर तुलसी ससी उडुगन केशवदास।
:अबके कवि खद्योत सम जह-तह करत प्रकाश।।
 
अबके कवि खद्योत सम जह-तह करत प्रकाश।।
 
== सन्दर्भ ==
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== यह भी देखें ==
* [[बिहारी (साहित्यकार)|बिहारी]]
* [[भूषण]]
 
==बाहरी कड़ियाँ==
{{टिप्पणीसूची}}*[http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A4%B5%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_/_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF केश्व] (कविताकोश)
 
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