"कामन्दकीय नीतिसार" के अवतरणों में अंतर

सम्पादन सारांश रहित
'''कामंदकीय नीतिसार''' [[राजनीति|राज्यशास्त्र]] का एक [[संस्कृत]] ग्रंथ है। इसके रचयिता का नाम 'कामंदकि' अथवा 'कामंदक' है जिससे यह साधारणत: 'कामन्दकीय' नाम से प्रसिद्ध है। वास्तव में यह ग्रंथ [[कौटिल्य]] के [[अर्थशास्त्र ग्रन्थ|अर्थशास्त्र]] के सारभूत सिद्धांतों (मुख्यत: राजनीति विद्या) का प्रतिपादन करता है। यह श्लोकों में रूप में है। इसकी भाषा अत्यन्त सरल है।
 
कामन्दकीय में कुल मिलाकर २० सर्ग (अध्याय) तथा ३६ प्रकरण हैं।
 
==रचनाकाल==
 
कामंदक की प्राचीनता का एक और प्रमाण भी दृष्टिगोचर होता है। कामंदकीय नीतिसार की मुख्यत: पाँच टीकाएँ उपलब्ध होती हैं : उपाध्याय निरक्षेप, आत्मारामकृत, जयरामकृत, वरदराजकृत तथा शंकराचार्यकृत।
 
==संरचना==
कामन्दकीय में कुल मिलाकर २० सर्ग (अध्याय) तथा ३६ प्रकरण हैं।
*प्रथम सर्ग : राजा के इंन्द्रियनियंत्रण सम्बन्धी विचार
*द्वितीय सर्ग : शास्त्रविभाग, वर्णाश्रमव्यवस्था व दंडमाहात्म्य
*तृतीय सर्ग : राजा के सदाचार के नियम
*चौथा सर्ग : राज्य के सात अंगों का विवेचन
*पाँचवाँ सर्ग : राजा और राजसेवकों के परस्पर सम्बन्ध
*छठा सर्ग : राज्य द्वारा दुष्टों का नियन्त्रण, धर्म व अधर्म की व्याख्या
*सातवाँ सर्ग : राजपुत्र व अन्य के पास संकट से रक्षा करने की दक्षता का वर्णन
*आठवें से ग्यारहवाँ सर्ग : विदेश नीति; शत्रुराज्य, मित्रराज्य और उदासीन राज्य ; संधि, विग्रह, युद्ध ; साम, दान, दंड व भेद - चार उपायों का अवलंब कब और कैसे करना चाहिए
*बारहवाँ सर्ग : नीति के विविध प्रकार
*तेरहवाँ सर्ग : दूत की योजना ; गुप्तचरों के विविध प्रकार ; ; राजा के अनेक कर्तव्य
*चौदहवाँ सर्ग : उत्साह और आरम्भ (प्रयत्न) की प्रशंसा ; राज्य के विविध अवयव
*पन्द्रहवाँ सर्ग : सात प्रकार के राजदोष
*सोलहवाँ सर्ग : दूसरे देशों पर आक्रमण और आक्रमणपद्धति
* सत्रहवाँ सर्ग : शत्रु के राज्य में सैन्यसंचालन करना और शिबिर निर्माण ; निमित्तज्ञानप्रकरणम्
* अट्ठारहवाँ सर्ग : शत्रु के साथ साम, दान, इत्यादि चार या सात उपायों का प्रयोग करने की विधि
* उन्नीसवाँ सर्ग : सेना के बलाबल का विचार ; सेनापति के गुण
* बीसवाँ सर्ग : गजदल, अश्वदल, रथदल व पैदल की रचना व नियुक्ति
 
==बाहरी कड़ियाँ==