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वह अपने क्रांतिकारी विचार अपने समाचार-पत्र ‘वंदेमातरम्’ तथा ‘तलवार’ में प्रकट करती थीं। श्रीमती कामा की लड़ाई दुनिया-भर के साम्रज्यवाद के विरुद्ध थी। वह भारत के स्वाधीनता आंदोलन के महत्त्व को खूब समझती थीं, जिसका लक्ष्य संपूर्ण पृथ्वी से साम्राज्यवाद के प्रभुत्व को समाप्त करना था। उनके सहयोगी उन्हें ‘भारतीय क्रांति की माता’ मानते थे; जबकि अंग्रेज उन्हें कुख्यात् महिला, खतरनाक क्रांतिकारी, अराजकतावादी क्रांतिकारी, ब्रिटिश विरोधी तथा असंगत कहते थे। यूरोप के समाजवादी समुदाय में श्रीमती कामा का पर्याप्त प्रभाव था। यह उस समय स्पष्ट हुआ जब उन्होंने यूरोपीय पत्रकारों को अपने देश-भक्तों के बचाव के लिए आमंत्रित किया। वह ‘भारतीय राष्ट्रीयता की महान पुजारिन’ के नाम से विख्यात थीं। फ्रांसीसी अखबारों में उनका चित्र [[जोन ऑफ आर्क]] के साथ आया। यह इस तथ्य की भावपूर्ण अभिव्यक्ति थी कि श्रीमती कामा का यूरोप के राष्ट्रीय तथा लोकतांत्रिक समाज में विशिष्ट स्थान था।<ref>{{cite web |url= http://www.pustak.org/bs/home.php?bookid=1726|title= प्रतिष्ठित भारतीय|accessmonthday=[[12 दिसंबर]]|accessyear=[[2007]]|format= पीएचपी|publisher=भारतीय साहित्य संग्रह|language=}}</ref>
 
भीकाजी द्वारा लहराए गए झंडे में देश के विभिन्न धर्मों की भावनाओं और संस्कृति को समेटने की कोशिश की गई थी। उसमें इस्लाम, हिंदुत्व और बौद्ध मत को प्रदर्शित करने के लिए हरा, पीला और लाल रंग इस्तेमाल किया गया था। साथ ही उसमें बीच में [[देवनागरी लिपि]] में [[वंदे मातरम]] लिखा हुआ था। जर्मनी में फहराया गया वह झंडा वर्तमान में [[पुणे]] की मराठा एवं केसरी लाइब्रेरी में रखा हुआ है।
 
== संदर्भ ==
{{भारतीय स्वतंत्रता संग्राम}}
 
[[श्रेणी:जीवनी]]
[[श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम]]
[[श्रेणी:भारतीय ध्वज]]
9,937

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