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=== गीता और रामचरितमानस का ज्ञान ===
 
एकश्रुत प्रतिभा से युक्त बालक गिरिधर ने अपने पड़ोसी पण्डित मुरलीधर मिश्र की सहायता से पाँच वर्ष की आयु में मात्र पन्द्रह दिनों में श्लोक संख्या सहित सात सौ श्लोकों वाली सम्पूर्ण भगवद्गीता कण्ठस्थ कर ली। १९५५ ई में [[जन्माष्टमी]] के दिन उन्होंने सम्पूर्ण गीता का पाठ किया।<ref name="outlook"/><ref name="dinkarearlylife"/><ref name="parauha">{{cite book | last=परौहा | first=तुलसीदास | editor-first=स्वामी | editor-last=रामभद्राचार्य | title=गीतरामायणम् (गीतसीताभिरामं संस्कृतगीतमहाकाव्यम्) | chapter=महाकविजगद्गुरुस्वामिरामभद्राचार्याणां व्यक्तित्वं कृतित्वञ्च | publisher=जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय | date=जनवरी १४, २०११ | pages=५–९ | language=संस्कृत}}</ref> संयोगवश, गीता कण्ठस्थ करने के ५२ वर्ष बाद नवम्बर ३०, २००७ ई के दिन जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने संस्कृत मूलपाठ और हिन्दी टीका सहित भगवद्गीता के सर्वप्रथम ब्रेल लिपि में अंकित संस्करण का विमोचन किया।<ref>{{cite web | publisher=एस्ट्रो ज्योति | title = Vedic scriptures and stotras for the Blind people in Braille | language=अंग्रेज़ी | url = http://www.astrojyoti.info/helpfortheblind.htm | accessdate=जून २५, २०११}}</ref><ref>{{cite web | language=अंग्रेज़ी | publisher=एस्ट्रो ज्योति | title = Braille Bhagavad Gita inauguration | url = http://astrojyoti.info/blindgitainaguration.htm | accessdate=जून २५, २०११}}</ref><ref>{{cite web | last=ब्यूरो रिपोर्ट | language=अंग्रेज़ी | publisher=ज़ी न्यूज़ | title = Bhagavad Gita in Braille Language | url = http://www.zeenews.com/news411003.html | date = दिसम्बर ३, २००७ | accessdate=जून २५, २०११}}</ref><ref>{{cite web | last=एशियन न्यूज़ इंटरनेशनल | publisher=वेबदुनिया हिन्दी | title = अब ब्रेल लिपि में भगवद्गीता | url = http://hindi.webdunia.com/news/news/regional/0712/06/1071206064_1.htm | date = दिसम्बर ६, २००७ | accessdate = जुलाई २, २०११}}</ref> सात वर्ष की आयु में गिरिधर ने अपने पितामह की सहायता से छन्द संख्या सहित सम्पूर्ण [[श्रीरामचरितमानस]] साठ दिनों में कण्ठस्थ कर ली। १९५७ ई में [[रामनवमी]] के दिन व्रत के दौरान उन्होंने मानस का पूर्ण पाठ किया।<ref name="dinkarearlylife"/><ref name="parauha"/> कालान्तर में गिरिधर ने समस्त [[वेद|वैदिक वाङ्मय]], संस्कृत व्याकरण, [[भागवत]], प्रमुख उपनिषद्, संत तुलसीदास की सभी रचनाओं और अन्य अनेक संस्कृत और भारतीय साहित्य की रचनाओं को कण्ठस्थ कर लिया।<ref name="outlook"/><ref name="dinkarearlylife"/>
 
=== उपनयन और कथावाचन ===
=== संस्कृत में प्रथम काव्यरचना ===
 
आदर्श गौरीशंकर संस्कृत महाविद्यालय में गिरिधर ने छन्दःप्रभा के अध्ययन के समय आचार्य पिंगल प्रणीत [[:en:Sanskrit_prosodySanskrit prosody#Gaṇa|अष्टगण]] का ज्ञान प्राप्त किया। अगले ही दिन उन्होंने संस्कृत में अपना प्रथम पद भुजंगप्रयात छन्द में रचा।<ref name="dinkaredu"/>
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<center>
=== शास्त्री (स्नातक) तथा आचार्य (परास्नातक) ===
 
१९७१ में गिरिधर मिश्र [[वाराणसी]] स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में संस्कृत [[व्याकरण]] में शास्त्री ([[:en:Bachelor's degree|स्नातक उपाधि]]) के अध्ययन के लिए प्रविष्ट हुए।<ref name="dinkaredu"/> १९७४ में उन्होंने सर्वाधिक अंक अर्जित करते हुए शास्त्री (स्नातक उपाधि) की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् वे आचार्य ([[:en:Master's degree|परास्नातक]] उपाधि) के अध्ययन के लिए इसी विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए। परास्नातक अध्ययन के दौरान १९७४ में अखिल भारतीय संस्कृत अधिवेशन में भाग लेने गिरिधर मिश्र [[नयी दिल्ली]] आए। अधिवेशन में व्याकरण, [[सांख्य]], [[न्याय]], [[वेदान्त]] और [[अन्त्याक्षरी]] में उन्होंने पाँच स्वर्ण पदक जीते।<ref name="kbs-bio"/> भारत की तत्कालीन प्रधानमन्त्रिणी श्रीमती [[इन्दिरा गाँधी]] ने उन्हें पाँचों स्वर्णपदकों के साथ उत्तर प्रदेश के लिए चलवैजयन्ती पुरस्कार प्रदान किया।<ref name="parauha"/> उनकी योग्यताओं से प्रभावित होकर श्रीमती गाँधी ने उन्हें आँखों की चिकित्सा के लिए [[संयुक्त राज्य अमरीका]] भेजने का प्रस्ताव किया, परन्तु गिरिधर मिश्र ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।<ref name="aicb-bio"/> १९७६ में सात स्वर्णपदकों और कुलाधिपति स्वर्ण पदक के साथ उन्होंने आचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की।<ref name="parauha"/> उनकी एक विरल उपलब्धि भी रही – हालाँकि उन्होंने केवल व्याकरण में आचार्य उपाधि के लिए पंजीकरण किया था, उनके चतुर्मुखी ज्ञान के लिए विश्वविद्यालय ने उन्हें ३० अप्रैल, १९७६ के दिन विश्वविद्यालय में अध्यापित सभी विषयों का आचार्य घोषित किया।<ref name="aicb-bio"/><ref>{{cite web | date=सितम्बर १३, २००९ | url=http://jagadgururambhadracharya.org/videos/manasdharma?id=15 | title=श्रीराम कथा (मानस धर्म) | location=चित्रकूट, उत्तर प्रदेश, भारत | publisher=जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय | accessdate=जुलाई १, २०११ | quote=डीवीडी संख्या ८, भाग १, समय ००:५०:२०।}}</ref>
 
=== विद्यावारिधि (पी एच डी) एवं वाचस्पति (डी लिट्) ===
{{Cquote|केवल दूध और फलों का आहार लेते हुए छः महीने तक राम नाम जपो। तुलसीदास कहते हैं कि ऐसा करने से सारे सुन्दर मंगल और सिद्धियाँ करतलगत हो जाएँगी।}}
</blockquote>
१९८३ ई में उन्होंने चित्रकूट की [[:en:Chitrakuta#Sphatic_ShilaSphatic Shila|स्फटिक शिला]] के निकट अपना द्वितीय षाण्मासिक पयोव्रत अनुष्ठान सम्पन्न किया।<ref name="dinkarlaterlife"/> यह पयोव्रत स्वामी रामभद्राचार्य के जीवन का एक नियमित व्रत बन गया है। २००२ ई में अपने षष्ठ षाण्मासिक पयोव्रत अनुष्ठान में उन्होंने श्रीभार्गवराघवीयम् नामक संस्कृत महाकाव्य की रचना की। <ref>{{cite book | year=२००२ | language=संस्कृत | date=अक्टूबर ३०, २००२ | title = श्रीभार्गवराघवीयम् (संस्कृतमहाकाव्यम्) | first=स्वामी | last=रामभद्राचार्य | place=चित्रकूट, उत्तर प्रदेश, भारत | publisher=जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय | pages=५११}}</ref><ref>दिनकर २००८, पृष्ठ १२७।</ref> वे अब भी तक नियमित रूप से षाण्मासिक पयोव्रत का अनुष्ठान करते रहते हैं, २०१०-२०११ में उन्होंने अपने नवम पयोव्रत का अनुष्ठान किया।<ref>{{cite web | last=संवाददाता | first=चित्रकूट | publisher=जागरण याहू | title = भारतीय शिक्षा सिखाती है संस्कार | url = http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_7135505.html | date = जनवरी ५, २००७ | accessdate=जुलाई २, २०११}}</ref><ref>{{cite web | last=संवाददाता | first=चित्रकूट | publisher=जागरण याहू | title = तीर्थ में गूंजते रहे गुरु वंदना के स्वर | url = http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_6598239.html | date = जुलाई २५, २०१० | accessdate=जुलाई २, २०११}}</ref><ref>{{cite web | last=संवाददाता | first=चित्रकूट | publisher=अमर उजाला | title = जिले में अंतर्राष्ट्रीय स्तर का शोध संस्थान बनेगा | url=http://www.amarujala.com/city/Chitakut/Chitakut-16337-42.html | date = जनवरी ५, २०११ | accessdate=जुलाई २, २०११}}</ref>
[[चित्र:JagadguruRamabhadracharya002.jpg|thumb|right| अक्टूबर २५, २००९ के दिन जगद्गुरु रामभद्राचार्य चित्रकूट स्थित तुलसी पीठ में संत तुलसीदास की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हुए]]
 
 
[[:en:Jagadguru|जगद्गुरु]] [[सनातन धर्म]] में प्रयुक्त एक उपाधि है जो पारम्परिक रूप से वेदान्त दर्शन के उन [[आचार्य|आचार्यों]] को दी जाती है जिन्होंने प्रस्थानत्रयी (ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और मुख उपनिषद्) पर संस्कृत में भाष्य रचा है। मध्यकाल में भारत में कई प्रस्थानत्रयीभाष्यकार हुए थे यथा [[शंकराचार्य]], [[निम्बार्काचार्य]], [[रामानुजाचार्य]], [[मध्वाचार्य]], रामानन्दाचार्य और अंतिम थे
[[वल्लभाचार्य]] (१४७९ से १५३१ ई)। वल्लभाचार्य के भाष्य के पश्चात् पाँच सौ वर्षों तक संस्कृत में प्रस्थानत्रयी पर कोई भाष्य नहीं लिखा गया।<ref name="subedi">{{cite web | last=संवाददाता | first=चित्रकूट | publisher=जागरण याहू | title = श्री सीता राम विवाह के आनंदित क्षणों मे झूमे भक्त | url = http://in.jagran.yahoo.com/news/local/uttarpradesh/4_1_7168843.html | date = जनवरी १२, २०११| accessdate=जुलाई १२, २०११ | quote=हरिद्वार से आये आचार्य चंद्र दत्त सुवेदी ने कहा कि प्रस्थानत्रयी पर सबसे पहले भाष्य आचार्य शंकर ने लिखा और अब वल्लभाचार्य के छह सौ [sic] साल बाद जगद्गुरु स्वामी राम भद्राचार्य जी ने लिखा।}}</ref>
 
जून २४, १९८८ ई के दिन काशी विद्वत् परिषद् वाराणसी ने रामभद्रदास का तुलसीपीठस्थ जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के रूप में चयन किया।<ref name="dinkarjagadguru"/> ३ फ़रवरी १९८९ को [[प्रयाग]] में [[कुंभ मेला|महाकुंभ]] में रामानन्द सम्प्रदाय के तीन अखाड़ों के महन्तों, सभी सम्प्रदायों, खालसों और संतों द्वारा सर्वसम्मति से काशी विद्वत् परिषद् के निर्णय का समर्थन किया गया।<ref>अग्रवाल २०१०, पृष्ठ ७८१।</ref> इसके बाद १ अगस्त १९९५ को अयोध्या में दिगंबर अखाड़े ने रामभद्रदास का जगद्गुरु रामानन्दाचार्य के रूप में विधिवत अभिषेक किया।<ref name="kbs-bio"/> अब रामभद्रदास का नाम हुआ '''जगद्गुरु रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य'''। इसके बाद उन्होंने ब्रह्म सूत्र, भगवद्गीता, और ११ उपनिषदों (कठ, केन, माण्डूक्य, ईशावास्य, प्रश्न, तैत्तिरीय, ऐतरेय, श्वेताश्वतर, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और मुण्डक) पर संस्कृत में श्रीराघवकृपाभाष्य की रचना की। इन भाष्यों का प्रकाशन १९९८ में हुआ।<ref name="dinkarbiblio"/> वे पहले ही नारद भक्ति सूत्र और रामस्तवराजस्तोत्र पर संस्कृत में राघवकृपाभाष्य की रचना कर चुके थे। इस प्रकार स्वामी रामभद्राचार्य ने ५०० वर्षों में पहली बार संस्कृत में प्रस्थानत्रयीभाष्यकार बनकर लुप्त हुई जगद्गुरु परम्परा को पुनर्जीवित किया और रामानन्द सम्प्रदाय को स्वयं रामानन्दाचार्य द्वारा रचित ''आनन्दभाष्य'' के बाद प्रस्थानत्रयी पर दूसरा संस्कृत भाष्य दिया।<ref name="subedi"/><ref>{{cite book | title = हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ग्रन्थावली ४ | last=द्विवेदी | first=मुकुन्द | publisher=राजकमल प्रकाशन | year=२००७ | origyear=प्रथम संस्करण १९८१ | edition=संशोधित, परिवर्धित | location=नई दिल्ली, भारत | id=ISBN 972812671358-5 | pages=पृष्ठ २७३}}</ref>
== रामचरितमानस की प्रामाणिक प्रति ==
[[चित्र:JagadguruRamabhadracharya008.jpg|thumb|right|जगद्गुरु रामभद्राचार्य अपने द्वारा सम्पादित रामचरितमानस की प्रामाणिक प्रति (भावार्थबोधिनी टीका सहित) भारत की राष्ट्रपत्नी [[प्रतिभा पाटिल]] को अर्पित करते हुए]]
गोस्वामी तुलसीदास ने अयुताधिक पदों से युक्त रामचरितमानस की रचना १६वी शताब्दी ई में करी थी। ४०० वर्षों में उनकी यह कृति उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय बन गयी, और इसे पाश्चात्य [[भारतविद्या|भारतविद्]] बहुशः '''उत्तर भारत की बाईबिल''' कहते हैं।<ref>{{cite book | language=अंग्रेज़ी | last = लौख्टैफेल्ड | first = जेम्स जी | id=ISBN 978-0-8239-3180-4 | title = The Illustrated Encyclopedia of Hinduism: N-Z | language=अंग्रेज़ी | year = २००१ | publisher=रोज़ेन प्रकाशन ग्रुप | pages=पृष्ठ ५५९}}</ref><ref>{{cite book | location=व्हाईटफ़िश, मोंटाना, संयुक्त राज्य अमरीका | last = मैक्फ़ी | first = जे एम | id=ISBN 978-1-4179-1498-2 | title = The Ramayan of Tulsidas or the Bible of Northern India | date = मई २३, २००४ | publisher=केसिंजर पब्लिशिंग एल एल सी | pages=पृष्ठ vii | chapter=Preface | quote=The choice of the subtitle is no exaggeration. The book is indeed the Bible of Northern India | url=http://books.google.com/books?id=AbG4yfdE1b4C&printsec=frontcover&dq=isbn:9781417914982&hl=en&ei=4dADTtKeHqTV0QG9poS4Cw&sa=X&oi=book_result&ct=result&resnum=1&ved=0CCoQ6AEwAA#v=onepage&q&f=false | language=अंग्रेज़ी | <!-- accessdate=June 24, 2011 -->}}</ref> इस काव्य की अनेकों प्रतियाँ मुद्रित हुई हैं, जिनमें श्री वेंकटेश्वर प्रेस (खेमराज श्रीकृष्णदास) और रामेश्वर भट्ट आदि पुरानी प्रतियाँ, और [[गीता प्रेस]], [[मोतीलाल बनारसीदास]], कौदोराम, कपूरथला और पटना से मुद्रित नयी प्रतियाँ सम्मिलित हैं।<ref name="toi-fia">{{cite web | language=अंग्रेज़ी | title = Fury in Ayodhya over Ramcharitmanas | url = http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2009-11-01/india/28068936_1_seers-editions-disciples | date =नवम्बर १, २००९ | publisher=दि टाईम्स ऑफ इण्डिया | first=मंजरी; अरोड़ा, वी एन | last=मिश्र | first1=वी एन | last1=अरोड़ा | accessdate=जून २५, २०११}}</ref> मानस पर अनेक टीकाएँ लिखी जा चुकी हैं, जिनमें मानसपीयूष, मानसगूढार्थचन्द्रिका, मानसमयंक, विनायकी, विजया, बालबोधिनी इत्यादि सम्मिलित हैं।<ref name="rcmtp-prologue">रामभद्राचार्य २००६, पृष्ठ १-२७।</ref> बहुत स्थानों पर इन प्रतियों और टीकाओं में छन्दों की संख्या, मूलपाठ, प्रचलित वर्तनियों (यथा [[:en:Anusvara#Anunasika|अनुनासिक]] प्रयोग), और प्रचलित व्याकरण नियमों (यथा विभक्त्यन्त स्वर) में भेद हैं।<ref name="rcmtp-prologue"/> कुछ प्रतियों में एक आठवाँ [[काण्ड]] भी परिशिष्ट के रूप में मिलता है, जैसे कि मोतीलाल बनारसीदास और श्री वेंकटेश्वर प्रेस की प्रतियों में।<ref>प्रसाद १९९९, पृष्ठ ७९५–८५२</ref><ref>{{cite web | title = तुलसीकृत रामायण: पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा हिन्दी में अनूदित (विशिष्ट संस्करण) | url = http://www.khe-shri.com/details.asp?id=1858b&grpno=33&grpname=Ramayana | accessdate = जून ३०, २०११ | publisher=Shri Ventakeshwar Steam Press, Bombay | quote=लवकुशकाण्ड सहित}}</ref>
 
२०वी शताब्दी में वाल्मीकि रामायण और महाभारत का विभिन्न प्रतियाँ के आधार पर सम्पादन और प्रामाणिक प्रति ({{lang-en|critical edition}}) का मुद्रण क्रमशः बड़ौदा स्थित [[:en:Maharaja Sayajirao University of Baroda#Oriental_InstituteOriental Institute|महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय]] और पुणे स्थित [[:en:Bhandarkar Oriental Research Institute|भण्डारकर प्राच्य शोध संस्थान]] द्वारा किया गया था,<ref>{{cite web | language=अंग्रेज़ी | title = The Mahabharata | url = http://www.bori.ac.in/mahabharata.htm | publisher=भण्डारकर प्राच्य शोध संस्थान | accessdate = अप्रैल २५, २०११}}</ref><ref>{{cite book | pages=पृष्ठ xxv | chapter=Introduction | title = Critical Inventory of Ramayana Studies in the World: Indian Languages and English | first=के | last=कृष्णमूर्ति | year=१९९२ | publisher=साउथ एशिया बुक्स | id=ISBN 978-81-7201-100-0}}</ref> स्वामी रामभद्राचार्य बाल्यकाल से २००६ ई तक रामचरितमानस की ४००० आवृत्तियाँ कर चुके थे।<ref name="rcmtp-prologue"/> उन्होंने ५० प्रतियों के पाठों पर आठ वर्ष अनुसन्धान करके एक प्रामाणिक प्रति का सम्पादन किया।<ref name="toi-fia"/> इस प्रति को तुलसी पीठ संस्करण के नाम से मुद्रित किया गया।
आधुनिक प्रतियों की तुलना में तुलसी पीठ प्रति में मूलपाठ में कई स्थानों पर अंतर है - मूल पाठ के लिए स्वामी रामभद्राचार्य ने पुरानी प्रतियों को अधिक विश्वसनीय माना है।<ref name="toi-fia"/> इसके अतिरिक्त वर्तनी, व्याकरण और छन्द सम्बन्धी प्रचलन में आधुनिक प्रतियों से तुलसी पीठ प्रति निम्नलिखित प्रकार से भिन्न है।<ref name="rcmtp-prologue"/><ref>{{cite web | last=शुक्ल | first=राम सागर | publisher=वेबदुनिया | title = रामचरित मानस की भाषा और वर्तनी | url = http://hindi.webdunia.com/samayik/article/article/0911/11/1091111004_1.htm | date = नवम्बर ९, २००९ | accessdate=जून २५, २०११}}</ref>
# गीता प्रेस सहित कईं आधुनिक प्रतियाँ २ पंक्तियों में लिखित १६-१६ मात्राओं के चार चरणों की इकाई को एक चौपाई मानती हैं, जबकि कुछ विद्वान एक पंक्ति में लिखित ३२ मात्राओं की इकाई को एक चौपाई मानते हैं।<ref>{{cite book | title = तुलसी जन्म भूमि: शोध समीक्षा | first=राम गणेश | last=पाण्डेय | publisher=भारती भवन प्रकाशन | year=२००८ | edition=संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण | location=चित्रकूट, उत्तर प्रदेश, भारत | origyear=प्रथम संस्करण २००३ | quote=हनुमान चालीसा ... इसकी भाषा अवधी है। दोहा-चौपाई छन्द हैं। इसमें ४० चौपाइयाँ और २ दोहे हैं। | pages=पृष्ठ ५४}}</ref> रामभद्राचार्य ने ३२ मात्राओं की एक चौपाई मानी है, जिसके समर्थन में उन्होंने [[हनुमान चालीसा]] और [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]] द्वारा [[पद्मावत]] की समीक्षा के उदाहरण दिए हैं। उनके अनुसार इस व्याख्या में भी चौपाई के चार चरण निकलते हैं क्यूंकि हर १६ मात्राओं की अर्धाली में ८ मात्राओं के बाद यति है। परिणामतः तुलसी पीठ प्रति में चौपाइयों की गणना फ़िलिप लुट्गेनडॅार्फ़ की गणना जैसी है।<ref>{{cite book | year=१९९१ | title = The Life of a Text: Performing the 'Ramcaritmanas' of Tulsidas | last=लुट्गेनडॅार्फ़ | first=फ़िलिप | publisher=कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय प्रेस | place=बर्कली, कैलिफोर्निया, संयुक्त राज्य अमरीका | id=ISBN 978-0-520-06690-8 | chapter=The Text and the Research Context | pages=१४}}</ref>
* ''तुम पावक मँह करहु निवासा'' (२००४) – रामचरितमानस में माता सीता के अग्नि प्रवेश पर सितम्बर २००३ में दिए गए नवदिवसीय प्रवचनों का संग्रह। जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय, चित्रकूट द्वारा प्रकाशित।
* ''अहल्योद्धार'' (२००६) – रामचरितमानस में श्रीराम द्वारा [[अहल्या]] के उद्धार पर अप्रैल २००० में दिए गए नवदिवसीय प्रवचनों का संग्रह। जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय, चित्रकूट द्वारा प्रकाशित।
* ''हर ते भे हनुमान'' (२००८) – [[शिव]] के [[हनुमान]] रूप अवतार पर अप्रैल २००७ में दिए गए चतुर्दिवसीय प्रवचनों का संग्रह। जगद्गुरु रामभद्राचार्य विकलांग विश्वविद्यालय, चित्रकूट द्वारा प्रकाशित।
 
== पुरस्कार और सम्मान ==
 
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[[श्रेणी:उत्तर प्रदेश के लोग]]
 
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