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सोमदेव आर्य-समाज के सिद्धान्तों के अतिरिक्त [[रामकृष्ण परमहंस]], [[स्वामी विवेकानन्द]], [[स्वामी रामतीर्थ]] और महात्मा [[कबीरदास]] के उपदेशों के बारे में बिस्मिल को काफी कुछ बताया करते थे।
==अधूरी अभिलाष==
स्वामी सोमदेव के सदुपदेशों के परिणामस्वरूप ही बिस्मिल में ब्रह्मचर्य-पालन की उत्कण्ठा और धार्मिक तथा आत्मिक जीवन में दृढ़ता उत्पन्न हुई। उन्होंने बिस्मिल के भावी जीवन के बारे में जो-जो बातें कहीं वे एकदम सत्य सिद्ध हुईं। सोमदेव जी बिस्मिल से अक्सर कहा करते थे कि उन्हें इस बात का दुःख है कि उनका शरीर अब अधिक दिनों तक रहने वाला नहीं है जबकि रामप्रसाद का जीवन अभी काफी बरसों तक रहेगा। ऐसे में बहुत सम्भव है कि उसके जीवन में विचित्र-विचित्र समस्याएँ आयें। परन्तु उन्हें सुलझाने वाला कोई न होगा। हाँ एक बात निश्चित है कि यदि उनका शरीर नष्‍ट न हुआ हालांकि ऐसा हो पाना सम्भव नहीं, तो बिस्मिल का जीवन पूरी दुनिया में एक आदर्श जीवन होगा।
 
बिस्मिल ने आत्मकथा में इस बात का उल्लेख किया है कि यह उमका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा जब स्वामी सोमदेव के अन्त समय आया उन्होंने योगाभ्यास सम्बन्धी कुछ क्रियाएं बताने की इच्छा प्रकट की, किन्तु भयंकर दुर्बलता के कारण वे कभी इस योग्य न हो सके कि कुछ देर बैठ कर कुछ क्रियाऐँ उन्हें बता पाते। उन्होंने बिस्मिल से यह भी कहा था कि उनका योग भ्रष्‍ट हो गया फिर भी वे कोशिश करेंगे कि बता सकें वे अगला जन्म कहाँ लेंगे? उन्होंने मरते समय पास रहने की बात भी बिस्मिल से की थी, किन्तु वह भी सम्भव न हो सका!
 
स्वामी सोमदेव जितने अद्वितीय वक्‍ता थे उतने बेवाक लेखक भी थे। उनकेलिखे हुए कुछ लेख तथा पुस्तकें उनके एक भक्‍त के पास थीं जो यों ही नष्‍ट हो गयीं। लगभग 57 वर्ष की आयु में सोमदेव का प्राणान्त हो गया।
 
==बाहरी कड़ियाँ==
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