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वे धारासन सत्याग्रह के अहम इन्कलाबी (क्रांतिकारी) थे । वे 1940-45 के बीट भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे जिस दौरान भारत छोड़ो आन्दोलन हुआ था । कांग्रेस के अन्य प्रमुख नेताओं की तरह उन्हें भी तीन साल जेल में बिताने पड़े थे । स्वतंत्रता के बाद वे भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना में उनके सबसे अविस्मरणीय कार्यों मे से एक था ।
 
== जीवन ==
 
मौलाना आज़ाद [[अफग़ान]] [[उलेमा|उलेमाओं]] के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे जो [[बाबर]] के समय [[हेरात]] से भारत आए थे । उनकी माँ [[अरबी]] मूल की थीं और उनके पिता मोहम्मद खैरुद्दीन एक [[फारसी]] (ईरानी, नृजातीय रूप से) थे । मोहम्मद खैरुद्दीन और उनके परिवार ने भारतीय स्वतंत्रता के पहले आन्दोलन के समय 1857 में कलकत्ता छोड़ कर मक्का चले गए । वहाँ पर मोहम्मद खॅरूद्दीन की मुलाकात अपनी होने वाली पत्नी से हुई । मोहम्मद खैरूद्दीन 1890 में भारत लौट गए । मौहम्मद खैरूद्दीन को कलकत्ता में एक मुस्लिम विद्वान के रूप में ख्याति मिली । जब आज़ाद मात्र 11 साल के थे तब उनकी माता का देहांत हो गया । उनकी आरंभिक शिक्षा इस्लामी तौर तरीकों से हुई । घर पर या मस्ज़िद में उन्हें उनके पिता तथा बाद में अन्य विद्वानों ने पढ़ाया । इस्लामी शिक्षा के अलावा उन्हें [[दर्शनशास्त्र]], [[इतिहास]] तथा [[गणित]] की शिक्षा भी अन्य गुरुओं से मिली । आज़ाद ने [[उर्दू]], [[फ़ारसी]], [[हिन्दी]], [[अरबी]] तथा [[अंग्रेजी़]] भाषाओं में महारथ हासिल की । सोलह साल उन्हें वो सभी शिक्षा मिल गई थीं जो आमतौर पर 25 साल में मिला करती थी ।
तेरह साल की आयु में उनका विवाह ज़ुलैखा बेग़म से हो गया । वे देवबन्दी विचारधारा के करीब थे और उन्होंने क़ुरान के अन्य भावरूपों पर लेख भी लिखे । आज़ाद ने अंग्रेज़ी समर्पित स्वाध्याय से सीखी और पाश्चात्य दर्शन को बहुत पढ़ा । उन्हें मुस्लिम पारम्परिक शिक्षा को रास नहीं आई और वे आधुनिक शिक्षावादी [[सर सैय्यद अहमद खाँ]] के विचारों से सहमत थे ।
 
== क्रांतिकारी और पत्रकार के रूप में ==
मौलाना आज़ाद [[अफग़ान]] [[उलेमा|उलेमाओं]] के ख़ानदान से ताल्लुक रखते थे जो [[बाबर]] के समय [[हेरात]] से भारत आए थे । उनकी माँ [[अरबी]] मूल की थीं और उनके पिता मोहम्मद खैरुद्दीन एक [[फारसी]] (ईरानी, नृजातीय रूप से) थे । मोहम्मद खैरुद्दीन और उनके परिवार ने भारतीय स्वतंत्रता के पहले आन्दोलन के समय 1857 में कलकत्ता छोड़ कर मक्का चले गए । वहाँ पर मोहम्मद खॅरूद्दीन की मुलाकात अपनी होने वाली पत्नी से हुई । मोहम्मद खैरूद्दीन 1890 में भारत लौट गए । मौहम्मद खैरूद्दीन को कलकत्ता में एक मुस्लिम विद्वान के रूप में ख्याति मिली । जब आज़ाद मात्र 11 साल के थे तब उनकी माता का देहांत हो गया । उनकी आरंभिक शिक्षा इस्लामी तौर तरीकों से हुई । घर पर या मस्ज़िद में उन्हें उनके पिता तथा बाद में अन्य विद्वानों ने पढ़ाया । इस्लामी शिक्षा के अलावा उन्हें [[दर्शनशास्त्र]], [[इतिहास]] तथा [[गणित]] की शिक्षा भी अन्य गुरुओं से मिली । आज़ाद ने [[उर्दू]], [[फ़ारसी]], [[हिन्दी]], [[अरबी]] तथा [[अंग्रेजी़]] भाषाओं में महारथ हासिल की । सोलह साल उन्हें वो सभी शिक्षा मिल गई थीं जो आमतौर पर 25 साल में मिला करती थी ।
 
आजाद अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ़ थे । उन्हेंने अंग्रेजी सरकार को आम आदमी के शोषण के लिए जिम्मेवार ठहराया । उन्होंने अपने समय के मुस्लिम नेताओं की भी आलोचना की जो उनके अनुसार देश के हित के समक्ष साम्प्रदायिक हित को तरज़ीह दे रहे थे । अन्य मुस्लिम नेताओं से अलग उन्होने 1905 में बंगाल के विभाजन का विरोध किया और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के अलगाववादी विचारधारा को खारिज़ कर दिया । उन्होंने ईरान, इराक़ मिस्र तथा सीरिया की यात्राएं की । आजाद ने क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना आरंभ किया और उन्हें श्री अरबिन्दो और श्यामसुन्हर चक्रवर्ती जैसे क्रांतिकारियों से समर्थन मिला ।
तेरह साल की आयु में उनका विवाह ज़ुलैखा बेग़म से हो गया । वे देवबन्दी विचारधारा के करीब थे और उन्होंने क़ुरान के अन्य भावरूपों पर लेख भी लिखे । आज़ाद ने अंग्रेज़ी समर्पित स्वाध्याय से सीखी और पाश्चात्य दर्शन को बहुत पढ़ा । उन्हें मुस्लिम पारम्परिक शिक्षा को रास नहीं आई और वे आधुनिक शिक्षावादी [[सर सैय्यद अहमद खाँ]] के विचारों से सहमत थे ।
 
आज़ाद की शिक्षा उन्हे एक दफ़ातर (किरानी) बना सकती थी पर राजनीति के प्रति उनके झुकाव ने उन्हें पत्रकार बना दिया । उन्होने 1912 में एक उर्दू पत्रिका अल हिलाल का सूत्रपात किया । उनका उद्येश्य मुसलमान युवकों को क्रांतिकारी आन्दोलनों के प्रति उत्साहित करना और हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देना था । उन्होने तत्कालीन नेताओँ को यह दिखाकर अचंभित कर दिया कि वे मुस्लिम होते हुए भी क्रांतिकारी गतिविधियों का समर्थन कर रह हैं जो उस समय आम बात नहीं थी । उन्होने कांग्रेसी नेताओं का विश्वास बंगाल, बिहार तथा बंबई में क्रांतिकारी गतिविधियों के गुप्त आयोजनों द्वारा जीता । उन्हें 1920 में [[राँची]] में जेल की सजा भुगतनी पड़ी ।
 
== असहयोग आन्दोलन ==
[[श्रेणी:भारतीय मुस्लिम]]
[[श्रेणी:प्रथम लोक सभा सदस्य]]
अल-हिलाल और अल-बिलाल इनकी प्रमुख रचना है।