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विश्वविद्यालय ने 1480 के आसपास मुद्रण व्यापार में कदम रखा और बाइबल, प्रार्थना पुस्तकों और अध्ययनशील रचनाओं का प्रमुख मुद्रक बन गया.<ref> कार्टर पास्सिम</ref> इसकी प्रेस द्वारा शुरु की गयी एक परियोजना उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर में ''ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी'' बन गई और बढ़ती लागतों से निपटने के लिए इसने अपना विस्तार जारी रखा.<ref> पीटर सटक्लिफ, ''दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस: एन इन्फोर्मल हिस्ट्री'' (ऑक्सफोर्ड 1975; 2002 के सुधार के साथ पुनःप्रकाशित) पी. 53, 96-7, 156</ref> नतीजतन अपने शैक्षणिक और धार्मिक शीर्षकों से मेल स्थापित करने के लिए ऑक्सफोर्ड ने पिछले सौ सालों में बच्चों की पुस्तकों, स्कूल की पाठ्य पुस्तकों, संगीत, पत्रिकाओं, वर्ल्ड्स क्लासिक्स सीरीज और सबसे ज्यादा बिकने वाली अंग्रेजी भाषा शिक्षण पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन किया है. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कदम रखने के फलस्वरूप 1896 में [[नया यॉर्क|न्यूयॉर्क]] से शुरुआत करने वाली इस प्रेस ने [[संयुक्त राजशाही (ब्रिटेन)|यूनाइटेड किंगडम]] के बाहर भी अपना कार्यालय खोलना शुरू कर दिया.<ref> सटक्लिफ, पास्सिम</ref> कंप्यूटर प्रौद्योगिकी के आगमन और उत्तरोत्तर बढ़ती व्यापारिक दशाओं की वजह से 1989 में ऑक्सफोर्ड में स्थित प्रेस के छापेखाने को बंद कर दिया गया और वोल्वरकोट में स्थित उसकी पूर्व कागज़ की मिल को 2004 में ध्वस्त कर दिया गया. अपनी छपाई और जिल्दसाजी कार्य का ठेका देकर आधुनिक प्रेस हर साल दुनिया भर में लगभग 6000 नए शीर्षकों का प्रकाशन करता है और दुनिया भर में इसके कर्मचारियों की संख्या लगभग 4000 है. एक धर्मार्थ संगठन के हिस्से के रूप में ओयूपी अपने मूल विश्वविद्यालय को अधिक से अधिक वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए और इसके अलावा अपनी प्रकाशन गतिविधियों के माध्यम से छात्रवृत्ति, अनुसन्धान और शिक्षा में बेहतरीन प्रदर्शन करने में विश्वविद्यालय के लक्ष्यों को पूरा करने में उसकी सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध है.
 
ओयूपी को सबसे पहले 1972 में यूएस कॉर्पोरेशन टैक्स से और उसके बाद 1978 में यूके कॉर्पोरेशन टैक्स से मुक्त किया गया. एक धर्मार्थ संगठन का एक विभाग होने के नाते ओयूपी को अधिकांश देशों में आयकर और निगम कर से मुक्त कर दिया गया है लेकिन इसे अपने उत्पादों पर बिक्री और अन्य वाणिज्यिक करों का भुगतान करना पड़ता है. प्रति वर्ष कम से कम 12 मिलियन पाउंड का हस्तांतरण करने की वचनबद्धता के साथ यह प्रेस वर्तमान में विश्वविद्यालय के शेष हिस्सों को अपने वार्षिक अधिशेष का 30% हस्तांतरित करता है. प्रकाशन की संख्या की दृष्टि से ओयूपी दुनिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय प्रेस है जो हर साल 4500 से अधिक नई पुस्तकों का प्रकाशन करता है और जहां लगभग 4000 लोग काम करते हैं. ओयूपी ''ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी'' , ''कंसाइस ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी'' , ऑक्सफोर्ड वर्ल्ड्स क्लासिक्स, ''ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ऑफ नेशनल बायोग्राफी'' और ''कंसाइस डिक्शनरी ऑफ नेशनल बायोग्राफी'' सहित कई सन्दर्भ, पेशेवर और शैक्षणिक रचनाओं का प्रकाशन करता है. इसके कई सबसे महत्वपूर्ण शीर्षक अब "ऑक्सफोर्ड रेफरेंस ऑनलाइन" नामक एक पैकेज के रूप में इंटरनेट पर उपलब्ध है और इन्हें यूके की कई सार्वजनिक पुस्तकालयों के पाठक कार्ड धारकों को मुफ्त में प्रदान किया जाता है.
 
ऑक्सफोर्ड द्वारा प्रकाशित पुस्तकों में अंतर्राष्ट्रीय मानक पुस्तक संख्या होती है जो 0-19 से शुरू होती है जो प्रेस को आईएसबीएन सिस्टम में दो-अंकीय पहचान संख्या वाले कई छोटे-छोटे प्रकाशकों में से एक बनाती है. आतंरिक समझौते द्वारा व्यक्तिगत संस्करण संख्या का पहला अंक (0-19- के बाद) एक विशेष प्रभाग का संकेत दे सकता है, उदाहरण के लिए: संगीत के लिए 3 (आईएसएमएन को परिभाषित करने से पहले); न्यूयॉर्क कार्यालय के लिए 5; क्लेयरेंडन प्रेस प्रकाशनों के लिए 8.
आम तौर पर कहा जाता है कि अठारहवीं सदी के आरम्भ में प्रेस के विस्तार पर विराम लग गया था. इस समय फेल जैसी किसी हस्ती का अभाव था और यह आर्कीटाइपोग्राफस और पुराविद थॉमस हियार्न जैसे निष्प्रभावी या झगड़ालू व्यक्तियों और बास्केट के पहले बाइबल जैसी त्रुटिपूर्ण योजनाओं का समय था जो शानदार ढंग से तैयार किया गया लेकिन गलत छपाई से भरा हुआ खंड था और जिसे सेंट ल्यूक में टंकण त्रुटि देखे जाने के बाद वाइनगार बाइबल के नाम से जाना जाने लगा. इस समय के अन्य मुद्रण में रिचर्ड ऑलेस्ट्री के मननशील ग्रन्थ और थॉमस हैनमर के शेक्सपियर का छः खण्डों वाला संस्करण शामिल था.<ref> बार्कर पी. 32</ref> पीछे मुड़कर देखने पर यह सब अपेक्षाकृत मामूली जीत साबित हुई. वे सब एक विश्वविद्यालय प्रेस के उत्पाद थे जिनमें बढ़ती गड़बड़ी, क्षय और भ्रष्ट प्रथा का समावेश था और जो खुद को जीवित रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा अपनी बाइबल और प्रार्थना पुस्तक सम्बन्धी कार्यों को पट्टे पर देने पर निर्भर था.
 
इस व्यवसाय को केवल एक डेलीगेट विलियम ब्लैकस्टोन के हस्तक्षेप द्वारा बचाया गया. प्रेस की अराजक स्थिति से नाराज होकर और वाइस चांसलर जॉर्ज हडेसफोर्ड से दुश्मनी मोल लेकर ब्लैकस्टोन ने छापेखाने की बारीकी से जांच करवाई लेकिन इसके उलझनग्रस्त संगठन और धूर्त प्रक्रियाओं के निष्कर्ष के रूप में उन्हें अपने सहयोगियों के केवल "उदास और तिरस्कारपूर्ण चुप्पी" या "ज्यादा से ज्यादा निस्तेज उदासीनता" का सामना करना पड़ा. गुस्से में आकर ब्लैकस्टोन ने मई 1757 में हडेसफोर्ड के उत्तराधिकारी थॉमस रंडोल्फ को लिखे गए एक लंबे पत्र को प्रकाशित करके विश्वविद्यालय को अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए मजबूर किया. यहाँ, ब्लैकस्टोन ने प्रेस को एक जन्मजात संस्था के रूप में प्रस्तुत किया जिसने "एक आलस भरी गुमनामी... रोबदार यांत्रिकी के एक घोसले में समय बिताते हुए" छात्रवृत्ति की सेवा करने के सभी झूठे दिखावे को छोड़ दिया था. इन शर्मनाक मामलों से छुटकारा पाने के लिए ब्लैकस्टोन ने अंधाधुंध सुधार की मांग की जो डेलीगेटों की शक्तियों और दायित्वों को सख्ती से स्थापित करेगा, आधिकारिक रूप से उनके विचारों और कार्यप्रणाली को रिकॉर्ड करेगा और छापेखाने को एक कुशल आधार प्रदान करेगा.<ref> आई.जी. फिलिप, ''विलियम ब्लैकस्टोन एंड दी रिफोर्म ऑफ दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस'' , (ऑक्सफोर्ड, 1957) पीपी. 45-72</ref> बहरहाल, रंडोल्फ ने इस दस्तावेज को नज़रअंदाज कर दिया और तब तक परिवर्तन शुरू नहीं हुआ जब तक ब्लैकस्टोन ने कानूनी कार्रवाई करने की धमकी नहीं दी. विश्वविद्यालय ने 1760 तक ब्लैकस्टोन के सभी सुधारों को अपनाने की दिशा में कदम उठाया था.<ref> कार्टर, चैप्टर 21</ref>
 
18वीं शताब्दी के अंतिम दौर तक प्रेस ने और अधिक ध्यान आकर्षित कर लिया था. आरंभिक कॉपीराइट क़ानून ने स्टेशनर्स को कमजोर बनाना शुरू कर दिया था और विश्वविद्यालय को अनुभवी प्रिंटरों (मुद्रकों) को अपना बाइबल कार्य पट्टे पर देने में कष्ट होने लगा. जब अमेरिकी स्वाधीनता युद्ध ने ऑक्सफोर्ड को इसके बाइबल के महत्वपूर्ण बाजार से वंचित कर दिया तब यह पट्टा बहुत जोखिम भरा प्रस्ताव बन गया और डेलीगेटों को उन लोगों को प्रेस के शेयरों की पेशकश करने के लिए मजबूर किया गया जो "पारस्परिक लाभ के लिए व्यापार की देखभाल कर सके और परेशानियों को प्रबंधित" कर सके. अड़तालीस शेयरों को जारी किया गया जिसके साथ विश्वविद्यालय के पास एक नियंत्रक हिस्सा था.<ref> सटक्लिफ पी. XXV</ref> उसी समय जेरेमियाह मार्कलैंड और पीटर एल्म्सले की रचनाओं के साथ-साथ उन्नीसवीं सदी के आरंभिक दौर में मुख्यभूमि [[यूरोप]] के कई शिक्षाविदों द्वारा सम्पादित ग्रंथों से पारंपरिक छात्रवृत्ति में नई जान आई - जिनमें शायद अगस्त इमानुएल बेकर और कार्ल विल्हेल्म डिंडोर्फ़ सबसे प्रमुख थे. दोनों ने 50 सालों तक एक डेलीगेट के रूप में काम करने वाले [[यूनानी भाषा|यूनानी]] विद्वान थॉमस गैस्फोर्ड के आमंत्रण पर संस्करणों को तैयार किया. उनके समय में विकासशील प्रेस ने [[लंदन|लन्दन]] में वितरकों की स्थापना की और ऑक्सफोर्ड में इसी उद्देश्य से टुर्ल स्ट्रीट में पुस्तकविक्रेता जोसेफ पार्कर को नियुक्त किया. पार्कर ने भी प्रेस में अपने शेयर खरीद लिए.<ref> बार्कर पीपी. 36-9, 41. सटक्लिफ पी. 16</ref>
==== पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया ====
 
इस क्षेत्र के साथ ओयूपी की पारस्परिक क्रिया भारत में अपने मिशन का हिस्सा थी क्योंकि उनके कई यात्रियों ने भारत जाने या वहां से आने के रास्ते पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया में प्रवेश किया था. 1907 में अपनी पहली यात्रा में ग्रेडन ने 'स्ट्रेट्स सेटलमेंट्स' (काफी हद तक फेडरेटेड मलय राज्य और सिंगापुर), चीन, और जापान की यात्रा की थी लेकिन बहुत ज्यादा यात्रा करने में समर्थ नहीं थे. 1909 में ए. एच. कोब ने शंघाई में शिक्षाओं और पुस्तक विक्रेताओं से भेंट की और देखा कि वहां अक्सर सीधी-सादी छपाई वाली ब्रिटिश पुस्तकों के साथ खास तौर पर अमेरिका से आने वाली सस्ती पुस्तकों से प्रतिस्पर्धा चल रही थी.<ref> देखें रिमी बी. चटर्जी, 'पायरेट्स एंड फिलैन्थ्रपिस्ट: ब्रिटिश पब्लिशर्स और कॉपीराइट इन इंडिया, 1880-1935 स्वप्न कुमार चक्रवर्ती और अभिजीत गुप्ता द्वारा संपादित ''प्रिंट एरियाज़ 2: बुक हिस्ट्री इन इंडिया'' में, (न्यू डेल्ही: परमानेंट ब्लैक, आगामी 2007 में)</ref> 1891 के चेस अधिनियम के बाद उस समय की कॉपीराइट परिस्थिति ऐसी थी कि अमेरिकी प्रकाशक दंड मुक्त होने के लिए ऐसी किताबों को प्रकाशित कर सकते थे हालांकि उन्हें सभी ब्रिटिश प्रदेशों में वर्जित माना जाता था. दोनों प्रदेशों में कॉपीराइट को सुरक्षित करने के लिए प्रकाशकों को एक साथ प्रकाशन करने का इंतजाम करना पड़ा जो इस युग के वाष्प चालित जलयानों के लिए एक अंतहीन प्रचालन सिरदर्द था. किसी भी एक प्रदेश में पूर्व प्रकाशन के लिए दूसरे प्रदेश में कॉपीराइट संरक्षण के लिए कीमत चुकानी पड़ती थी.<ref> देखें साइमन नोवेल स्मिथ, ''इंटरनेशनल कॉपीराइट लॉ एंड दी पब्लिशर इन दी रीजन ऑफ क्वीन विक्टोरिया: दी ल्येल लेक्चर्स, यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड, 1965-66'' , (ऑक्सफोर्ड: क्लेयरेंडन प्रेस, 1968).</ref>
 
कोब ने शंघाई के हेन्जेल एण्ड कंपनी (जिसका संचालन संभवतः किसी प्रोफ़ेसर द्वारा किया जाता था) को उस शहर में ओयूपी का प्रतिनिधित्व करने का काम सौंपा.{{citation needed|date=December 2010}} प्रेस को हेन्जेल से तकलीफ थी जो अनियमित रूप से पत्राचार करते थे. वे एडवर्ड इवांस के साथ भी व्यापार करते थे जो एक अन्य शंघाई पुस्तक विक्रेता था. मिलफोर्ड ने कहा कि 'हमलोग चीन में अब तक जो कुछ कर रहे हैं हमें उससे अधिक करना चाहिए' और 1910 में उन्होंने कोब को शैक्षिक प्राधिकारियों के प्रतिनिधि के रूप में हेन्जेल की जगह किसी और रखने के लिए सुयोग्य प्रतिनिधि की तलाश करने का अधिकार प्रदान किया.{{citation needed|date=December 2010}} उनकी जगह मिस एम. वेर्ने मैक्नीली नामक एक दुर्जेय महिला को रखा गया जो ईसाई ज्ञान प्रचार सोसाइटी की एक सदस्या थीं और एक किताब की दुकान भी चलाती थीं. उन्होंने काफी कुशलतापूर्वक प्रेस के मामलों पर ध्यान दिया और कभी-कभी वह मिलफोर्ड को सम्मानार्थ भेंट स्वरुप सिगारों से भरे डिब्बे भी भेजती थीं. ओयूपी के साथ उनका सहयोग लगभग 1910 से शुरू हुआ था हालांकि उनके पास ओयूपी पुस्तकों के लिए कोई विशेष एजेंसी नहीं थी. सस्ते अमेरिकी किताबों की तुलना में ऑक्सफोर्ड द्वारा आराम से उत्पन्न और महंगे बाइबिल संस्करणों के बहुत ज्यादा प्रतिस्पर्धी न होने के बावजूद चीन में व्यापार की प्रमुख वस्तु बाइबल की किताबें थीं जबकि भारत में शैक्षिक किताबों को सबसे ऊंचा स्थान प्राप्त था.
 
== संदर्भग्रन्थ ==
* हैरी कार्टर, ''ए हिस्ट्री ऑफ दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस'' , (ऑक्सफोर्ड: क्लेयरेंडन प्रेस, 1975).
* रिमी बी. चटर्जी, ''एम्पायर्स ऑफ दी माइंड: ए हिस्ट्री ऑफ दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस इन इंडिया ड्यूरिंग दी राज'' (न्यू डेल्ही: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2006).
* डंकन हिनेल्स, ''एन एक्स्ट्राऑर्डिनरी परफोरमेंस: ह्यूबर्ट फॉस एंड दी अर्ली इयर्स ऑफ म्यूज़िक पब्लिशिंग एट दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस,'' (ऑक्सफोर्ड: ओयूपी [आईएसबीएन 978-0-19-323200-6], 1998).
* ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस म्यूज़िक डिपार्टमेंट, ''ऑक्सफोर्ड म्यूज़िक: दी फस्ट फिफ्टी इयर्स '23-'73,'' (लंदन: ओयूपी, 1973).
* पीटर सटक्लिफ, ''दी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस: एन इन्फोर्मल हिस्ट्री'' , (ऑक्सफोर्ड: क्लेयरेंडन प्रेस [आईएसबीएन 0-19-951084-9], 1978).
* पीटर सटक्लिफ, ''एन इन्फोर्मल हिस्ट्री ऑफ दी ओयूपी'' (ऑक्सफोर्ड: ओयूपी, 1972).