"मोइनुद्दीन चिश्ती" के अवतरणों में अंतर

छो
कोष्टक से पहले खाली स्थान छोड़ा।
छो (श्रेणी)
छो (कोष्टक से पहले खाली स्थान छोड़ा।)
 
अल्लह के इच्छा के अनुसार हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़् के पिताजी स्वर्ग सीधार गये,वे अनाथ हो गये।उन्होनें अपने पिता से एक उपवन और मिल्ल प्राप्त हुआ। उनके पिता कि म्रुत्य के कुछ् मासों के बाद उनकी माँ का देहाँत् हो गया।ख्वाजा सहिब(र.अ) अपनी छोटी आयु से भी हमेशा फकिर और द्र्वेशीयों के साथ पाये जाते थे।उनके मन में गरीबों और फकिरों के लिये बहुत सम्मान् और आदर था।
एक दिन जब वे पेडों को पानी दे रहे थे, तब एक म्ज़्जुब आए थे।वह म्ज़्जुब "शेक इब्रहिम कुन्दोज़ि (र.अ)"हैं,जब हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ ने एक बुढे,व्रुध आदमी को देखा,वे अपना कार्य को छोद कर ,उनका स्वागत करते हैं।वे उनके हाथ को चुम्ते हैं और उन से अनुरोध करते हैं कि वे पेड की छाया में बेंटे।तब हज़्रत के पास उन्हें देने के लिये कुछ नहीं था।वह अँगुर का मौस्म था,और पेड पर अँगुर लगे हुए थे,तौ उन्होंने उसे तोडा ,साफ करके उन रसिले ,मिटे अँगुर उन्हें देते हैं,और अदर से उनके सामने बैट्ते हैं।वह म्ज़्जुब को ख्वाजा क स्वभाव् बहुत पसंद आता हैं,और वे कुछ अँगुर खाते हैं।अल्लह के प्रेम से प्रबुध्द होकर वह म्ज़्जुब तुरंत पेह्नचान् लेते हैं कि वह् बालक सत्य की खोज मैं हैं।वह मज़जुब ने एक मिटाई का टुक्डा निकाला और थोडा स चबाया और ख्वाजा साहेब् के मुहँ में डाल दिय,ख्वाजा सहेब् ने उसे खालिया क्युँकि उनके मन में गरीबों और फकिरों के लिये बहुत प्रेम ,आदर और सम्मान था। जब वे उसे खा लेते है तब उन्हें अचानक् सारा संसार उनके लिये बेकार हो जाता हैं ,एसा लगता है जेसे उन के और अल्लह के बीच कोइ बाधा नहीं हैं।जब वे अपनी स्म्र्तियों से वापस आते हैं, तब वे अपने आप को अकेला पाते हैं,शेक इब्रहिम (र.अ) ने ख्वाजा साहेब को अकेला छोद दिया, लेकिन ख्वाजा साहेब् उन स्म्रुथियाँ भुल नहीं पाये थे ,और वो उस आभास को बार-बार अनुभव् करना चाहते थे। उन्होंने अपने उपर बहुत नियत्रंन् रखने का प्रयास करते हैं,लेकिन नहीं रख पाते।वे अल्लाह के प्रति प्रेम और जुनुन् अपनी सीमा पार कर गया तब उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ती और धन गरीबों मैं बाट्ँ दिया और सत्य की खोज मैं लग गये।शेख इब्रहिम कुन्डोज़ी (र्.अ) के दैविय प्रकश के बाद ख्वाजा साहेब ग्यान पाने के लिये और भी उत्सुक हो गए थे,य्ह उपभ्धी की प्यास ने उन्हें और प्रोत्साहन देति हैं,और वे सामरख्ंड छोड दिया ।अल्लाह के स्म्र्ण में वे पश्चिम की ओर मुर्शिद-ए-कमील कि खोज में चले गये और "हारून" नामक एक गाव्ँ मे पहुँचे जो निशापुर से दुर् हैं।
===अल्लाह का वरदान===
ख्वाजा साहेब (र अ)मेक्का पहुँचे और एक दिन जब वे नमाज़ पढ् रहे थे ,तब उन्हे आवाज़ सुनाइ दि,"मुइनुद्दिन मैं आपसे बहुत प्रभावित हूँ और तुम्हें वरदान देता हूँ ,पुछों जो तुम्हें चाहिए ताकी हम उसे पुरा कर सके।"उन्होंने आदर से कहा "ए महान अल्लाह ,मुइनुद्दीन के प्रश्ंस्कों को मोक्ष प्राधान् करें" जवाब आया "ए मुइनुद्दीन,आपकी इच्छा पुरी हो गई हैं।मैं मुइन्नुद्दीन के हर प्रशंसक को क्यामत तक मोक्ष प्रधान करुँगा"।जब् वे काबे में थे और हज पुरा कर चुके थे और् तब वे मदिने के खुबा मसाजीद में प्रार्थना कर र्हें थे, उन्हें पैह्मबर मुहम्म्द(स.अ.व्) क संदेश मिला ,उसमें उन्हें आदेश मिला की"मुइन्नुद्दीन,आप हमारे ध्रम के सहायक हैं;मैं आप पर विश्वास कर के आपकों हिंदुस्थान जाने के लिये कह रहा हुँ,जहाँ अंधकार हैं ,जाईये भारत और सत्य का उपदेश दिजीए"।इस संदेश को सुनकर वे बहुत उत्सुक और प्रभावित थे ,लेकिन ख्वाजा साहेब् सोच् रहे थे कि अजमेर् कहाँ हैं,तब ख्वाजा साहेब को मुह्म्म्द(स अ व्) स्वपन में आते है और् उन्हें वह शहर ,किला दिखाते हैं और अजमेर जाने का मार्गद्र्ष्ण देते हैं।
===अज्मेर मैं उनका प्रवेश ===
ज्ब वे अजमेर् मैं एक वृक्ष की छाया मैं बेटे थे,तब राजा के सैनिक अपने ऊँटों के साथ आए और क्रुरता के साथ उन्हें वहाँ से उट ने के लिये कहा,जब हज़्र्त ने उन्हें कई ओर बांद् ने के लिये कहा तो उन सैनिकों ने उनकी बात् नहीं सुनी और खडे रहे, तो हज़्रत ख्वाजा गरीब नवाज़ ने सुशिष्टता से कहा कि"लो ,हम यहाँ से चले जाते हैं और तुम्हारे ऊँट यहाँ बैटे हि रहेंगे"।यह बोलकर वे और उनके प्रश्ंसकों के साथ् अन्ना सागर तालाब के पास चले गये।दुसरे दिन सैनिकों ने ऊँटू को उटाने का बहुत प्रयास किया लेकिन नहीं उटा पए ,एसा लग रहा था जैसे वे पृथ्वी से चिपक गये हों।फिर वे जाकर राजा को पुरी घटना बतात्ते हैं,तू राजा आश्च्र्यच्कित हो जाता हैं,और गर्व् करते हैं,और अपने सैनिकों से जाकर क्षमा माँग ने के लिये कहते हैं,तो सैनीक् जकर गारीब नवाज़ से क्षमा मांगते हैं,तो हज़्रत उन्हें कहते हैं " वापस जाओ ,अल्लाह के करम से ऊँट अपने पैरुं पर खडे हो जाएँगा"।वापस जाकर देखते हैं तो ऊँट खडे रेहते हैं।वे प्रसन्न हो जाते हैं।यह हज़्रत का पहला चम्तकार हैं।
हज़्रत और उनके प्रश्ंसक अन्ना सागर रोज़ स्न्नान करने जाते हैं,लेकिन एक दिन राजा के सैनिकों ने हज़्रत के प्रशंसकों को रोक दिया तब उनके एक् प्रशंसक वपस आकर उन्हें सारी घट्ना बताते हैं,तब् ख्वाजा सहेब(र अ)ने उनके प्रश्ंसक को एक कुज़ा (मट्का)दिया,और उसमें पानी भर कर् लाने के लिये दिया और जब उन्होंने उसमें पानी भरा तो सारा तालाब का पानी उस मटके मैं आगया।जब यह बात सब को मालुम हुई तो सब आश्च्रय चकित हो गये।सारा तालाब सुख गया,ख्वाजा साहेब् बहुत दयालु थे, उसके बाद कुछ लोगों ने ख्वाजा सहेब से क्षमा माँगी तो उन होनें पानी वापस तालाब में दाल दिया।इस घट्ना के बाद बहुत लोगों ने इस्लाम अपना लिया ।हज़्रत ख्वाजा गरिब नवाज़ के पास अल्लाह का वरदान हैं,जो भी उनके पास जाते हैं उन की बातों से इतने प्रभावित होते हैं कि उनसे दुर नहीं होना चाहते।बहुत लोगों ने इस्लाम अपना लिया।कुछ उद्दाह्र्ण हैं:शादि दिओ,अजए पाल जोगी ।
"शाद दोई" उस समय का पदा लिखा मनुष्य ,जो हज़्रत को देख कर उनके पैरुँ पर पडा और इस्लाम क़ुब्बुल कर लिया,और उस्का नाम हज़्रत ने साढ् रख दिया। दुसरा था "अजय पाल" बहुत बडा जादुगर् था ,जो हज़्रत के ऊपर पत्तर दाल दिया,लेकिन ख्वाजा सहेब को कुछ नहीं हुआ।तो वो उनकी शृण मैं आजाते हए और इस्लाम क़ुब्बुल कर लेता हैं ,और उसका नाम ख्वाजा साहेब ने अब्द्दुल्लाह रख दिय हैं।
शाद दोई उस समय का शिक्षित आद्मी था,जो ख्वाजा साहेब से सामना करने आया था ,लेकिन उन्हें देखथे हि उसका मन परिवर्तित हो गया और हज़्रत के पैरों पर गीर पडा और इसलाम को अपना लिया।ख्वाजा साहेब ने उस का नाम "साढ्"दिया।
 
==उनके अखरी पल==
६३३ हिज़री के आते ही उन्हें पता था कि यह उनका अखरी वृष हैं इसलिए जब वे अजमेर के जुम्मा मसाजीद में अपने प्रशंसको के साथ बैटे थे,तो उनहोंने शेख अली संगल(र अ)से केहते हैं की वे हज़्रत ब्खतीयार काकी (र अ)को पत्र लिखकर आने के लिये कहें हैं।ख्वाजा साहेब के बाद क़ुरान-ए-पाक, उनका गालिचा और उनके चप्पल काकी (र अ)को दिया गया और कहा"यह विशवास मुहम्म्द(स अ व्) का हैं,जो मुझे मेरे पीर-ओ-मुर्शीद से मिला हैं,मैं आप पर विशवास करके आप को दे रहा हुँ और उसके बाद उनका हाथ लिया और नभ की ओर देखा और कहा "मैंने तुम्हें अल्लाह पर न्यास्त किया हैं और तुम्हें यह मौका दिया हैं उस आदर और सम्मान प्राप्त करने के लिए।"
उस के बाद ५ और६ रजब को ख्वाजा साहेब अपने कमरे के अंदर गए और क़ुरान-ए-पाक पडने लगे,रात भर उनकी आवाज़ सुनाई दि लेकिन सुबाह को आवाज़ सुनाई नहीं दि।जब कमरे को खोल कर देखा गया,तब वे स्वर्ग चले गये थे ,उनके माथे पर सीर्फ यह पंक्ति चमक रही थी "वे अल्लाह के मित्र थे और इस संसार को अल्लाह का प्रेम पाने के लिए छोड दिया।"उसी रात को काकी (र अ) को मुहम्म्द(स अ व्) स्वपन में आए थे और कहा "ख्वाजा साहेब अल्लाह के मित्र हैं और मैं उनहें लेने के लिये आया हुँ।
उनकी जनाज़े की नमाज़ उन के बडे पुत्र ख्वाजा फाकरुद्दिन (र अ) ने पदा।वहाँ उनके बहुत सारे प्रशंसक आए थे,और आते रहेंगे।
हर साल हज़्रत के यहाँ उनका उर्स होता हैं बहुत बडे पैमाने प्र हो